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विश्व संगीत दिवस और कुमाऊँ की मौखिक परम्पराए

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
‘‘फैटे डी ला म्यूजिक’’ विश्व संगीत दिवस का प्रादुर्भाव एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में 1982 में फ्रांस में हुआ। यह दिवस प्रतिवर्ष इक्कीस जून को मनाया जाता है। सम्पूर्ण दिवस संगीत समारोह मनाने की विचारधारा का श्रेय अमेरिकी संगीतज्ञ जौनकोहन को जाता है। जिन्होंने संगीत निर्देशक के रुप में फ्रांसीसी आकाशवाणी ”फ्रांस म्यूजिक“ के लिए आकाशवाणी के संगीत उत्सवों के लिए दो सत्र व्यतीत किए। उनकी इस विचारधारा को बाद में फ्रंास में राष्ट्रीय महोत्सव के रूप में अपना लिया गया और इसे फ्रांस के संस्कृति मन्त्री नैनलैंग के द्वारा राष्ट्रीय और सरकारी समारोह घोषित किया गया। आज विश्व संगीत समारोह अन्तर्राष्ट्रीय घटना हो गई है। कुमाऊँ में भी संगीत की मौखिक परम्पराएं, संगीत के विशिष्ट रूप हैं। यह प्रकृति के लोक गीतों के रूप में प्रचलित हैं और इन गीतों का मानव पर अद्भुत चमत्कारी ईश्वरीय प्रभाव है। कुमाऊँ की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के कारण देश के अन्य भागों से अलग-थलग पड़ जाने के कारण यहाँ स्थानीय धार्मिक विश्वासों का उत्कर्ष हुआ। ये धार्मिक विश्वास अभी भी हिन्दुत्व की मुख्य धारा के साथ इस क्षेत्र में प्रबल हैं। मौखिक गायन परम्पराएं कुमाऊँनी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं और कृषि तथा देहातों में अन्य कार्यक्रमों में सामूहिक भागीदारी का ज्वलन्त प्रमाण हैं। इन मौखिक गायन परम्पराओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है- शकुन आखर, हुडियानौल और जागर। प्रथम श्रेणी के गीतों को पवित्र अवसरों पर गाया जाता है। इन गीतों के द्वारा आंशिक देवता, देवियों और स्थानीय लोक देवताओं को जागृत किया जाता है और इन पवित्र अवसरों में इन्हें पधारने के लिए आमंत्रित किया जाता है। और जिस परिवार में उपर्युक्त देवताओं का आवाहन किया जाता है उन परिवारांे को अपने आशीर्वाद से फलीभूत करने की प्रार्थना की जाती है। उस अखन्ड सर्वोच्च, चैतन्य के आशीर्वाद के लिए जब प्रार्थना की जाती है, तब दिव्य शक्तियों का भी आह्नान सार्वभौम शांति और सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना तथा प्रकृति के संरक्षण की भी कामना की जाती है। कुमाऊँ के ये लोकगीत नवजात के जन्मोत्सव, नामकरण, संस्कार, यज्ञोपवीत और विवाह संस्कारों में गाए जाते हैं। कुमाऊँ में इस संगीत की मौखिक गायन परम्परा सर्वशक्तिमान ईश्वर की मानव ज्ञान से परे अखण्ड आध्यात्मिक प्रकाश का अनुभव करना है जिसमें मानव ज्ञान से परे मानव अस्तित्व सदा अक्षुण्य रह सके। इन गीतों की पवित्र और दैवीय लय और सुर, मानव जीवन का एक मात्र लक्ष्य और प्रकृति की पूर्णता का द्योतक होता है। खुर्पाताल गांव के श्री वीरेन्द्र खनी का मानना है कि इन गीतों का उद्देश्य और गायन मनुष्य के हृदय में विद्यमान ईश्वरीय प्रेम की अखण्ड धारा को प्रवाहित करना है क्योंकि यही प्रेम की धारा इस संघर्षशील और अशान्त विश्व के चिर शांति के उपवन में शान्ति के पुष्पों को खिला सकती है। कुमाऊँनी संस्कृति के ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ पूरन सिंह अधिकारी के अनुसार कुमांऊ में कृषि को समाज का एक अभिन्न अंक माना जाता है। लेकिन में क्षेत्र की विकट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण और इस कार्य को करनेे के लिए कृषि मजदूरों के अभाव के कारण कृषि का व्यवसाय कुमाऊँ में बहुत जटिल हो गया है। यह व्यवसाय सामुहिक भागीदारी का है और इस व्यवसाय में लगे लोग मैदानों में हरे भरे चरागाहों के लिए पलायन कर गए हंै कृषि का सम्पूर्ण बोझ देहात की महिलाओं के कन्धे पर आ गया है। खेतों में अनाजों का बोना बहुत श्रम साध्य और समय व्यर्थ करने का व्यवसाय हो गया है। अतः कृषि के इस श्रमसाध्य और थका देने वाले व्यवसाय से मुक्ति पाने के लिए हुड़किया बौल का आयोजन किया जाता हैं। हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाओं और पृथ्वी माँ को जागृत करना हुडकिया बौल आयोजन का प्रमुख अंग है, यह एक विशिष्ट कला है जो दो शब्द ‘हुड़का’ (एक लोक वाद्य) जो एक छोटे ढोलक के समान होता है और दूसरा शब्द है बौल जिसका अर्थ शारीरिक श्रम है, मूल रूप सेे श्रम गीत के नाम से प्रचिलत है। जिसे कठोर श्रम करने के बाद गाया जाता है। हुडकिया बौल का प्रमुख गायक हुडकिया कहा जाता है जो हुड़के में ताल देता है और लोक गीत गाता है तथा पौध-रोपण करने वाली महिलाएं उसी के गीत की पंक्तियों की पुनरावृत्ति करती हैं। इन देहात की महिलाओं को छायोआर कहते हैं। प्रत्येक परिवार के लिए पौंध-रोपण के लिए हुडिकिया बौल का दिन निश्चित रहता है। कुमाऊँनी संस्कृति में इसे ‘पलटना’ नाम से संबोधित किया जाता है। इस सामुदायिक कार्य के लिए प्रत्येक परिवार से एक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य है। कुमाऊँ में जब मोटे अनाज मडुवा या रागी के लिए हुडकिया बौल का आयोजन किया जाता है तब इसे गुरोले कहते हैं। जब हुडकिया बौल का आयोजन पशुओं के लिए चारा काटने और घास एकत्र करने के लिए किया जाता है तब इसे बौल नाम से संबोधित किया जाता है। चारे की कटाई और घास का लूटा लगाने का कार्य कुमाऊँ में सितम्बर मध्य से मध्य अक्टूबर तक असोज के महीने में किया जाता है।
कुमाऊँ और गढ़वाल का जटिल जीवन और प्रकृति के बदलते रूप का सामना करने की शक्ति प्राप्त करने हेतु जागर जैसी पराशक्ति और प्राकृतिक शक्तियों के प्रति यहाँ दृढ़ विश्वास का प्रार्दुभाव हुआ। जागर भी कुमाऊँनी लोक संगीत की गायन परम्परा मौखिक चित्र है और लोगों का इस परम्परा में दृढ़ विश्वास है। श्री बृजमोहन जोशी (इस कला के प्रमुख परखी और इतिहासकार) के अनुसार जागर का शाब्दिक अर्थ जागरण है अर्थात् इस शैली में लोक गायक लोक देवों का आवाह्न कथात्मक शैली में करता है। कथात्मक शैली में उनकी प्रशंसा की जाती है। हुड़का, थाली, धातु की प्लेट और बड़े ढोल को बजाकर लोक देवता की प्रशंसा में कथात्मक गीत गाए जाते हैं। वाद्यों की ध्वनि गीत गायन की आत्मा, मस्तिष्क, अन्तर्रात्मा को उत्तेजित करने की गाथा, लय, सुर और तान एक दिव्य वातावरण का निर्माण करता है। इस दिव्य वातावरण के प्रभाव से जागर में उपस्थित कुछ व्यक्ति और कभी-कभी कुछ स्त्रियां ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव में आकर नृत्य करने लगती हैं, ऐसा विश्वास किया जाता है कि ईश्वरीय प्रेम की इस स्थिति में व्यक्ति में लोक देवताओं की शक्ति संचारित हो जाती है और जागर में उपस्थित लोगों के प्रश्नों का उत्तर देने की अभूतपूर्व शक्ति उनमें आ जाती है। ये प्रश्न मानव दुःखों के निराकरण और मानव मात्र के कल्याण के लिए पूछे जाते हैं। श्री बृजमोहन जोशी के अनुसार गाँव वासियों के कल्याण के लिए बाईस दिन के लिए भी जागर का आयोजन किया जाता है, जिसे ”बैसी“ कहते हंै। बाइसवें दिन ‘‘किलोर मारना’’ मनाया जाता है। जिसमें नसूट की लकड़ी से निर्मित खूंटों को गाँव की चारों दिशाओं में गाड़ दिया जाता है, इससे प्राकृतिक आपदाओं से तथा सम्पूर्ण बुराइयों से गाँव की रक्षा होती है। नसूट हल की लकड़ी का वह भाग है जिससें पृथ्वी को जोतने के लिए धातु का टुकड़ा लगा रहता है। बैसी भविष्य में होने वाले जागरियों का प्रशिक्षण केन्द्र भी है। बाइस दिन के इस प्रशिक्षण में भविष्य में होने वाले जगरियों को ”गुरू-मुन्डा“ नाम से सम्बोधित किया जाता है।
लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित‘