संपादकीय

शिक्षा की दशा और उसकी दुर्दशा जिम्मेदार कौन?

बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं और शिक्षा उस भविष्य का पोषण। लेकिन जिस तरीके से शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया गया हो और एक प्रयोगशाला में तबदील कर दिया गया हो और जिसका निष्कर्ष हमेशा ही सिफर रहा हो। सत्र का बड़ा भाग निकल चुका हो और शिक्षा किताबों के लिये तरस रही हो यानि प्रयोगशाला के सभी सेम्पल फेल। किसी समय शिक्षा का अर्थ स्वावलम्बन होता था। नारायण और दरिद्र नारायण में शिक्षा के क्षेत्र में कोई तिरस्कार या भेद-भाव नहीं था, पर आज है। शिकायतों के बोझ में शिक्षा का दम निकल रहा है और दम निकालने वाले कौन हैं? माता-पिता, शिक्षक, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद या नौकरशाह आखिर कौन? प्राईवेट हो या सरकारी विद्यालय हर जगह विद्या की अर्थी निकालने की तत्परता, माता-पिता में समय का अभाव, पैसे दे दिये जिम्मेदारी खत्म। प्राईवेट स्कूल अधिक पैसे लेने व शिक्षा के बाजारीकरण के लिये विवाद में रहते हैं। वहीं सरकारी स्कूल में शिक्षकों का न होना, है तो उनके ज्ञान का स्तर, बच्चों की शिक्षा का स्तर, शिक्षकों के गायब रहने, राजनीतिकरण के कारण विवादों मंे रहती है। प्राईवेट स्कूल अपनी खामियों को अधिकतर रूपहले पर्दाें पर छुपाने में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन इस बदहाल शिक्षा देश और भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। हमारे राजनेता, शासकगण और बाजारवाद के द्रोण पर कोई बात नहीं करेगा। क्या शिक्षा के लिये इनकी भूमिका नहीं होनी चाहिये? सरकारी स्कूल का बच्चा पेट की भूख तो मध्याह्म भोजन के माध्यम से शान्त कर सकता है लेकिन शिक्षा की कमी से होने वाला कुपोषण उसे आजीवन विकलांग बनाये रखेगा, पर इसकी चिंता किसे है। अतः इसे लोगतंत्र में त्रासदी ही कहेंगे। यह प्रतिभाओं की हत्या, बच्चों और शिक्षा के संग मजाक नहीं तो और क्या है। शिक्षा का महत्व तभी है जब सबको समान रूप से शिक्षा की प्राप्ति हो। जहाँ कृष्ण और सुदामा शिक्षा के लिये पढ़े, न कि असमानता की खाई बढ़ाने के लिये। सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार जैसे शब्दों का अर्थ भी तभी सार्थक होगा। इसके लिये समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। स्कूल-स्कूल ही रहे, आलिशान होटल नहीं, यही शिक्षा के लिये बेहतर है। क्योंकि यह व्यवस्था सामान्य वर्ग और गरीब वर्ग के बच्चों में कुंठा, अवसाद, घृणा आदि भावों को न भर दे या फिर दिशा भ्रमित न कर दे। नहीं तो भविष्य दिशा भ्रमित हो जायेगा। शारीरिक व मानसिक पोषण के द्वारा ही शिक्षा को उच्च स्तर तक पहुँचाया जा सकता है। शिक्षा लेने की नहीं संवारने की चीज है। यह समाज को, राष्ट्र को हर प्रकार से सुशोभित करती है। अच्छी शिक्षा के लिये बाल मनोविज्ञान को समझना जरूरी है और जिम्मेदार को भी। शिक्षा की दिशा और दशा तय करनी ही होगी नहीं तो दुर्दशा होगी और जिम्मेदारी सभी की होगी कोई मुँह चोरे मुँह मोड़े। आज शिक्षा के क्षेत्र में जो देखने, सुनने और पढ़ने को मिल रहा है वह सभी की ओर इशारे कर रहा है। कमीज की सफेदी की चिंता से ज्यादा भविष्य की सफेदी की चिंता हर किसी को अपने स्तर पर जिम्मेदारी से करनी ही होगी। ये वो सूरते हाल है जो हमें अभिव्यक्ति के अलग-अलग आईनों में दिखाई देते हैं। या तो हमें इस हाल को बदलने का प्रयास पूरी जिम्मेदारी के साथ करने होंगे अन्यथा इनके आईनों के सामने से हठ जाना होगा। निश्चय तो करना ही होगा कि हम किस विरासत के साथ आगे बढें़गे। समस्याऐं समाधान से ही खत्म होती हैं। नहीं तो ढूंढते रहिये जिम्मेदार कौन और चार गालियाँ दीजिए आईने को।