अवर्गिकृत

शिखर के पार...

शिखर के पार...

राजशेखर पंत, नैनीताल

शिखर के पार, अधखुले द्वार, अचीन्हा, अनबूझा विस्तार
थक चुके पाँव, विमुख सी छांव, हुई अभिलाषाएँ निःसार।
अरे! कैसा जीवन संघर्ष, तृषित मृग सी भटकन उद्भ्रांत,
सरकती रेत, कट चुके खेत, शिथिल-स्मृति, आशाएँ-क्लांत।
समेटा बस आँखों को मूंद, कभी था जो नीला आकाश,
चुने थे इन्द्रधनुष-अनजान, क्षितिज पर वाष्पित वो निःश्वास।
खो गए कहाँ उनीदे-स्वप्न, कभी रहते थे इतने पास,
कहाँ एकाकी संध्या-गीत, तुम्हारे होने का आभास।
ढुलकते तुहिन-कणों से दिवस, कभी थे जो अनंत-अम्लान,
धूसरित होते सारे रंग, संकुचित ठहरा सा है ज्ञान।
रीतता वह अदम्य उत्साह, कभी था जो सशक्त पाथेय,
विजन स्मृतियों का, या स्वप्न, निरंतर अब इसमें संदेह।
वही कलरव है, वही निनाद, वही सरिता का सतत प्रवाह,
वही शिखरों पर पसरा मौन, निरंतन जीवन का निर्वाह।
वही चिर-परिचित सा परिवेश, भावना और बुद्धि  का द्वंद,
मधुर किसलय सी वो मुस्कान, टूट कर कभी बिखरते छंद।
बदलता नहीं कभी संसार, विपथ बस होते रहते अर्थ,
बंद मुट्ठी से झरती रेत, सभी इच्छाएँ लगती व्यर्थ।
चपल-छलना सी सारी सृष्टि, खोलती इधर-उधर के द्वार,
बताते शेष बचे पदचाप, अरे! कितना निःसार.संसार।