विचार विमर्श

शिष्ट भ्रष्टाचार स्कूलों में प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर अनूठा नवाचार

शिष्ट भ्रष्टाचार
स्कूलों में प्रयोगात्मक परीक्षा के नाम पर अनूठा नवाचार
दिनेश महतोलिया
(क्षमता विकास विशेषज्ञ एवं प्रशिक्षक)
आजकल समाचार पत्रों में विभिन्न माध्यमिक विद्यालयों में प्रयोगात्मक परीक्षाओं की सूचनाओं से सम्बन्धित काॅलमों को देखकर यकायक मन में उथल-पुथल सी हुई, एक विचार कौधा और दिमाग सोचने लगा कि आज तक इस विषय पर कोई चिन्तन का स्वर क्यों नहीं उठा होगा।
दरअसल मुद्दा ये है कि सरकारी स्कूलों में दसवीं और बारहवीं कक्षाओं में प्रयोगात्मक परीक्षा वाले जो विषय होते हैं, उनकी वार्षिक (बोर्ड) परीक्षा के दौरान प्रयोगात्मक परीक्षा, भले ही वह विज्ञान की हो, जीव विज्ञान की, भौतिकी, रसायन, भूगोल या फिर गृह विज्ञान की, इसके लिए जो वाह्य परीक्षक बोर्ड द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, उनकी आवभगत के निमित्त विद्यार्थियों से पैसा जमा करवाया जाना कितना जायज है और इसे क्या कहा जाय। मैं अपनी स्कूली शिक्षा से वर्ष 1986 में ही फारिग हो लिया था और सही-गलत जितना मुझे याद है, तब भी ‘‘प्रैक्टिकल के एक्स्टर्नल एक्जामनर’’ के नाम पर 5 से 10 रुपये प्रति प्रायोगिक विषय प्रति विद्यार्थी जमा करवाये जाते थे। ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। हाँ, धनराशि अब विद्यार्थियों की संख्या के अनुसार 50 से 100 रुपये या फिर इससे अधिक, या यूँ कह लीजिए कि ‘‘एक्स्टर्नल एक्जामनर महोदय’’ के हिसाब से तय होती है। वैसे ये प्रथा यहीं तक सीमित हो, ऐसा भी नहीं है। उच्च शिक्षा में भी सिलसिला आम है और कुछ दिन पहले एक महाविद्यालय की घटना खूब चर्चा में रही।
मेरी चिन्ता तो सिर्फ इतनी सी है कि, सरकारी स्कूलों में एक विद्यार्थी की कुल वार्षिक फीस भी कदाचित इतनी नहीं होती, जितना कि उसे प्रायोगिक परीक्षाओं में अंक प्राप्ति के लिए जमा करना पड़ता है। आगे चर्चा करूँ, इससे पूर्व यह स्पष्टता भी आवश्यक है कि विद्यार्थियों से जमा करवायी जाने वाली इस धनराशि को प्रायोगिक परीक्षा लेने हेतु पधारने वाले ‘‘एक्स्टर्नल एक्जामनर महोदय’’ की सेवा-सुश्रूसा, अन्य विशिष्ट खातिरदारियों एवं सम्मानजनक विदाई टीका (मानदेय) पर खर्च किया जाता है। स्वाभाविक है, कि कोई बेचारा आन्तरिक विषय अध्यापक अपनी जेब से इतना खर्च वहन नहीं कर सकता और करे भी क्यों। अस्तु यह सारा भार विद्यार्थियों/अभिभावकों के सर ही मढ़ा जाता है। यह परम्परा मेरी स्मृति से आज तक चली आ रही है और आगे भी जारी रहेगी। जितना मेरा अल्पज्ञान कहता है, उसके अनुसार परीक्षाओं के दौरान बोर्ड द्वारा प्रायोगिक विषयों हेतु नामित किये जाने वाले वाह्य परीक्षक को इस अतिरिक्त (मेरी राय में तो सेवा का ही हिस्सा होना चाहिए) उत्तरदायित्व के लिए नियमानुसार यात्रा एवं दैनिक भत्ता आदि अनुमन्य होता ही होगा, तो फिर ये विशेष सेवा या परम्परा आखिर क्यों ?
अब जहाँ तक इसके विरोध या फिर इस पर चिन्तन का सवाल है, तो मुझे लगता है कि अभिभावक तो इसे परम्परा और बच्चे के भविष्य का प्रश्न मानकर चुप हो लेते हैं और रही बात शिक्षकों की, तो फिर वो भला क्यों विरोध करेंगे। अरे भई, कभी उनका नम्बर भी तो आएगा, वाह्य परीक्षक बनकर इस आतिथ्य सुख को प्राप्त करने का। मैं ये भी मानता हूँ कि कई परीक्षक इसका अपवाद भी निश्चित रूप से होंगे, परन्तु दूसरी ओर यह भी सुनने में आता है कि कुछ वाह्य परीक्षक तो अपने साथ पत्नी को भी ले जाते हैं और उनकी सेवा अलग से की जाती है और कुछों की तो दरें निर्धारित हैं।
इसके लिए कारणों की चर्चा करें तो लैब न होना, उपकरण न होना या फिर विषय का शिक्षक ही न होना जैसी तमाम वजहें बच्चों की मजबूरियों के नाम पर गिना दी जाएंगी। परन्तु यह विडम्बना ही है कि शिक्षा और इसकी गुणवत्ता के नाम पर होने वाली चर्चाओं, चिन्तनों अथवा शिक्षक गोष्ठियों में किसी भी शिक्षा/विद्यार्थी हितैषी ने इस प्रश्न को उठाया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। काश, कि अपने अधिकारों की बातें निरन्तर करने वाले गुरुजन या अधिकारी कभी कर्तव्यों पर भी बात करें और पैसे के बदले नम्बर की इस परम्परा को रोकने के लिए विद्यालयों में बेहतर प्रयोगशालाओं, उपकरणों एवं व्यवस्थाओं के लिए सार्थक आवाज उठायें और विद्यार्थियों में वास्तविक कौशल विकास के सृजन की पहल करें।
सम्भव है कि मेरी जानकारी अधूरी अथवा पूर्ण सही न हो परन्तु प्रायोगिक परीक्षाओं में विद्यार्थियों को अच्छे अंक मिलें, भले ही उनका प्रदर्शन कैसा भी क्यों न हो, इस उद्देश्य से ‘‘एक्स्टर्नल एक्जामनर महोदय’’ के सेवा सत्कार की यह परम्परा किसी भी नजरिये से उचित नहीे कही जा सकती। समझ नहीं आता कि शिक्षा जैसे पवित्र कार्य में सृजित इस अनोखे नवाचार को मैं क्या नाम दूँ। इसे ‘‘शिष्टाचार’’ कहूँ, ‘‘भ्रष्टाचार’’ कहूँ, या फिर ‘‘शिष्ट भ्रष्टाचार’’....., आप ही तय कीजिये।