संस्कृति

श्रीकृष्ण लीला में गौ का स्थान

- के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
उस दिन नन्दभवन सजाया गया। मंगलदान हुए। मंगल वाद्य बजे। व्रजराज ने ब्राह्मणों को दान दिया।
अब तो यशोदानन्दन इस कला में कुशल हो गए। जो गाऐं कठिनता से दुहने देती थीं। वे श्यामसुन्दर का दर्शन करते ही शान्त होकर अधिक दूध देतीं। इसी बहाने गोपियाँ अपनी गायें दुहाने के लिए अपने प्राणधन को अपने-अपने घर ले जाने लगीें। यह छवि अद्भुत होती। ब्रज युवतियाँ बछड़ों के पास खड़ी होकर छवि निहारती और श्रीकृष्ण उनकी गायें दुहते।
जा दिन ते गैया दुहि दीनी।
ता दिन ते आप को आपुहिं मानहुँ चितै ठगोरी लीनी।
मृदु मुसकाय चितै कछु बोले, ग्वालिनि निरखि प्रेम रस भीनी।।
श्यामसुन्दर विशेषतः गाय व बछड़ों के साथ ही क्रीड़ा करते थे। कभी दो, चार, छः बछड़ों/गायों को नचाते और स्वयं भी नाचते। कभी उनके सींगों का पकड़कर खेलते।माता व्याकुल होकर ढूँढ़ने जाती तो दोनों भाई बछड़ों के साथ खेलते मिलते।
मैया री! मैं गाय चरावन जैहांे।
तू कहि महरि नन्दबाबा सों बड़ो भयो न डरैहौं।।
अब लाला गाय चराने हेतु हठ करने लगे। माता समझाने लगीं। मेरे लाल!अभी तो तेरे दूध के दाँत भी नहीं उतरे हैं, कुछ दिनों बाद गाय चराने भेजुंगी। नन्दराय भी समझाते पर चंचल श्यामसुन्दर भाग ही जाते। अन्त में रास्ता निकाला गया यदि गायों के संग के बिना ये दोनों नहीं रह सकते तो ये नजदीक मेें रहकर ये छोटे बछड़ों को चराया करें। ज्योतिषयों से पुण्यतिथि मुहूर्त निश्चय किया गया। ब्रज के सभी लोगों ने अपने-अपने बालकों को उसी दिन से बछड़े चराने का निश्चय किया। निश्चत दिवस सुप्रभात हुआ। माताओं ने अपने-अपने बालकांे को तरह-तरह के वस्त्राभूषणों से सजाया। नजर से बचने के लिये माथे पर काजल का टीका लगा दिया। इष्टदेव नारायण को मनाया। स्वर्णदान किया और श्यामसुन्दर के लिये आशीर्वाद लिये। चलते समय माता के मन में शंकायें उठने लगीं। कहीं वन में कोई वन्यपशु उसे हानि न पहुँचा दे। दाऊ को बुलाकर कहा-
वत्स चरावन जाय कन्हैया।
कर पकराय नयन भरि अँसुवन सकल सँभार दाउए दीन्हीं।
बेटा! तुम बड़े हो। यह कन्हैया बड़ा चंचल है, अपने इस छोटे भाई की संभाल करना।
आज व्रज छायो अति आनंद।
वत्स चरावन जात प्रथम दिन नंदसुवन सुखकंद।।
नन्दराय ने पुत्र के हाथ में छोटी सी लाल छड़ी पकड़ा दी। उनकी आज्ञा से आज बछड़ों का भी सुन्दर श्रंगार किया गया है। सजे हुये बछड़े सिर उठाये खड़े हैं। मानो नन्दनन्दन की प्रतीक्षा कर रहे हों और उनके आते ही आनन्द में कूदने लगे। फिर यशोदानन्दन ने गुरूजनों को प्रणाम कर बछड़ों को चराने के लिये प्रस्थान किया।
चले हरि वत्स चरावन आज।
मुदित जसोमति करत आरती साजे सब सुभ साज।।
ब्रज युवतियाँ गोवत्सों, ग्वालसखाओं व नन्दनन्दन पर पुष्प वर्षा कर रही हैं-
गोविंद चलत देखियत नीके।
मध्य गुपाल मंडली मोहन काँधन धरि लिये छींके।।
बछरा बृंद घेरि आगें है ब्रजजन संृग बजाए।
मानहुँ कमल सरोवर तजिकै मधुप उनींदे आए।।
परस्पर हँसते खेलते बछड़ों को उछालते कुदाते वन में प्रवेश हुआ। हरी घास से शोभित वनभूमि पर बछड़े चरने लगे। श्यामसुन्दर अपने कोमल हाथों से हरी-हरी घास तोड़कर बछड़ों के मुँह में देते। बछड़ा अपना मुख श्यामसुन्दर के हाथोें में रख देता। अब सभी बछड़े भगवान के हाथों से घास खाने के लिये उन्हें घेर लेते। श्यामसुन्दर भी अतिशय प्यार से सबके मँुह में हरी-हरी घास देते। सखाओं की मण्डली घास श्यामसुन्दर के हाथों में देती और वे खिलाते जाते। बछड़ों का पेट भर गया तो जलाशय में उन्हें जल पिलाया। एक बछडे़ के पानी न पीने पर श्यामसुन्दर ने हाथों की अंजली बनाई, पानी भरा, पर बछड़े के मुँह तक पहुँचते खाली हो गयी। दो चार बार में भी जब सफल नहीं हुए तो अपना पीताम्बर भिगोया। श्यामसुन्दर अंजलि बछड़े के सामने किये रहे। दाऊजी ऊपर से पीताम्बर निचोड़ने लगे, पानी के छींटे पड़ते ही बछड़ा चिहुँक कर अलग कूद गया। सभी सखा हँसने लगे। फिर एक बछड़े के पास गए उसके अंगों को सहलाया। उसके गले में अपनी दोनों भुजायें डाल दी। फिर कान के पास मुँह लगाकर बोले क्यों रे वत्स! माता से मिलना चाहता है? अच्छा मिला दूँगा। देर तक बातें करते रहे। बछड़ा श्रीकृष्ण के योगीन्द्र मुनीन्द्र दुर्लभ आनन्द पाकर निहाल है और वे भी सुखसागर में निमग्न हैं।
मातरं मिलितुमिच्छसि? मेलयिष्यामीति।
तत्कर्णे मिथः कपोलमेलनपूर्वक वृथावर्णनेन च।।
तमुपचच्र्य सुखमुपलब्धवान।। श्री गोपाल चम्पू।
दिन ढल गया था। यशोदानन्द सखाओं सहित बछड़ों को एकत्र कर ब्रज लौटे। माता पिता एकटक वन की ओर नेत्र लगाए प्रतीक्षा में थे। हृदयधन को आते देखकर दोनों दौड़े। यशोदा ने हृदय से लगाया, गोद में लेकर घर पहुँची। बछड़ों को नन्दरायजी स्वयं उनकी माताओं के पास पहुँचा आए। राम, श्याम व सखा वन के दृश्यों एवं प्राप्त आनन्द का वर्णन करने लगे। व्रजराज, व्रजरानी व सभी गोपियाँ चाव से सुनने लगीं।
क्रमशः