विचार विमर्श

संकीर्ण शानधारी शिवाजी

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
कुछ धर्म धुरन्धर और संकीर्ण शानधारी शिवाजी को हिन्दुओं का नायक बनाकर पेश करने में गर्व महसूस करते हैं और वास्तविकताआंे को दरकिनार करके यह आभास देते हैं कि शिवाजी की वजह से ही भारत में आज हिन्दू धर्म सुरक्षित है वरना न जाने क्या होता? इस तरह की अधकचरी और गुमराकुन बातें हमारी नस्लों को मानसिक रूप से बर्बाद कर रही हैं। वास्तविक यह है कि शिवाजी हिन्दुओं के ही नायक नहीं, सम्पूर्ण भारत के ‘महानायक’ थे।
हमें याद रखना चाहिए कि भारतीय सभ्यता विश्व की पांच प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। हिन्दू धर्म (वास्तविक अर्थ में वैदिक धर्म) भी प्राचीन धर्मों में से एक है। भारत में ‘नीग्राइडों’, प्रोआस्टेªलाइड, आस्ट्रिक, द्रविड़, आर्य और मंगोलों के आगमन के दौरान संघर्षों का पूरा इतिहास है। आर्य जाति के लोग ईसा से 1000 वर्ष पूर्व व्यवस्थित थे। न जाने ‘कितने आये और कितने गये’ परन्तु वैदिक धर्म कई हजार वर्षाें का संघर्ष झेलने के पश्चात आज भी उतना ही सुरक्षित है। दुर्भाग्य से हमने शुð राजनैतिक संघर्षाें को धर्म से जोड़कर भारतीय मानवीय संवेदनाओं को उधेड़कर रख दिया है। कोई माई का लाल यह साबित नहीं कर सकता कि महानायक वीर शिवाजी ने कुरआन का अपमान किया हो या मुस्लिम औरतों का कत्ल किया हो या किसी मस्जिद को नेस्तोनाबूद किया हो या किसी दरगाह को क्षति पहुँचायी हो। उनका पूरा जीवन स्वतन्त्रता के मापदण्डों और राजनैतिक संघर्षाें से भरा-पूरा है। सिद्धान्तों के संघर्ष को धर्म विशेष से जोड़ना घातक है।
शिवाजी के दादा का नाम मालो जी भोंसले था। मालोजी के छोटे भाई के आठ बेटे थे, परन्तु मालोजी के कोई औलाद नहीं थी। पारिवारिक मित्रों की सलाह पर अहमद नगर के सूफी संत ‘शाहशरफ़’ के मजार पर जाकर उन्होंने मन्नत मांगी। मालोजी की मुराद पूरी हो गयी और उनके दो पुत्र हुए। मालोजी ने अपने दोनों पुत्रों का नाम  श्रद्धापूर्वक सूफी संत के नाम पर रखा। एक बेटे का नाम शाहजी और दूसरे बेटे का नाम शरफ़ जी रखा। शिवाजी शाहजी के बेटे थे।
शिवाजी ने अपने व्यक्तित्व की स्वयं रचना की और अशिक्षित होने के पश्चात भी अपनी शक्ति, सामथ्र्य और विद्वता का इतिहास रचा। वह स्वयं केलसी के सूफी बाबा याकूब सुहरवर्दी के मुरीद थे। बाबा याकूब सुहरवर्दी सिन्ध से आकर केलसी में बस गये थे। शिवाजी ने उनके भक्तों की सेवा के लिए 653 एकड़ जमीन बतौर जागीर याकूत सुहरवर्दी को पेश की थी और उनकी दरहगाह का निर्माण कराया। इसी से सम्बन्धित शिवाजी ने अपने फरमान में बाबा के लिए ‘‘हजरत बाबा याकूत बहवत थोरूव’’ (अर्थात हजरत बाबा याकूब बहुत बड़े संत और सूफी हैं।) का वाक्य लिखा है। शिवाजी जंग से पहले बाबा का आशीर्वाद जरूर प्राप्त करते थे। 25 वर्ष तक मानव अधिकारों तथा स्वतंत्रता संघर्ष के पश्चात 1680 में शिवाजी का स्वर्गवास हुआ। एक वर्ष पश्चात अर्थात 1681 ई॰ में बाबा याकूब सुहरवर्दी का इन्तेकाल हुआ। एक अन्य मुस्लिम संत ‘मौनी बुका’ से भी शिवाजी श्रद्धा रखते थे।
शिवाजी की फौज (सेना) बहुत व्यवस्थित थी। उसमें पैदल, घुड़सवार, जलसेना (समुद्री बेड़ा) और तोपखाना सम्मलित था। उनकी सेना में 35 प्रतिशत मुसलमान थे। सेनानायक का नाम ‘नौबत नूर खाँ बेग’ था। एक लाख पांच हजार घुड़सवार सेना में 60 हजार मुसलमान थे। उनके समुद्री बेड़े के दो बड़े अफसर थे। एक मुसलमान था, दूसरा दलित था। उनके समुद्री किलों के समस्त किलेदार मुसलमान थे। दुर्भाग्य से अफजल खां और शायस्ताखां से संघर्ष के आधार पर शिवाजी को मुसलमानों का दुश्मन बनाकर पेश किया गया है।
अलीआदिल शाह (द्वितीय) का शासनकाल 1652 ई॰ से 1672 तक था। उसके तीन सिपहसालारों में रिन्दइलाह खां, अफजल खां और शाह जी भोंसले (शिवाजी के पिता) थे। रिन्दइलाह खां और शाहजी भोंसले में गहरी दोस्ती थी। रिन्दइलाह खां के पुत्र रूस्तम खां और शाह जी भोंसले के पुत्र शिवाजी में भी गहरी दोस्ती थी। परन्तु अफजल खां को यह दोस्ती नागवार गुजरती थी। रिन्दइलाह खां के इन्तेकाल के पश्चात अफजल खां ने आदिल शाह के कान भरकर रिन्दइलाह खां की जागीर ज़ब्त कर ली थी। ‘पूना महजर’ ;गजेटियरद्ध में शिवाजी के दरबार की कार्यवाहियां दर्ज हैं। उसमें 1657 ई॰ में शिवाजी के अफसरों और जजों का विवरण है। मुस्लिम प्रजा के मुकदमों का फैसला शिवाजी द्वारा नियुक्त किये गये मुस्लिम काजी इस्लामी उसूलों के आधार पर किया करते थे। धर्म निरपेक्षता की यह अदभुत मिसाल है। शिवाजी की सेना का कोई मुसलमान सैनिक या अफसर गद्दार नहीं निकला, यह सच है।
दुश्मन फौज ने शिवाजी के ‘पदम दुर्ग’ को घेर लिया। शिवाजी ने अपने सूबेदार जीवाजी विनायक को तत्काल दुर्ग में रसद और धनराशि पहुंचाने का आदेश दिया परन्तु जीवाजी विनायक दुश्मनों से मिल गया और रिश्वत लेकर समय पर रसद और धनराशि नहीं पहुंचायी। शिवाजी ने उसे बर्खास्त करके कैद कर लिया। उन्होंने अपने आदेश में लिखा-
‘‘तुम समझते हो कि तुम ब्राह्मण हो इसलिए तुम्हें तुम्हारी दगाबाजी के लिए माफ कर दूंगा। तुम ब्राह्मण होते हुए भी दगाबाज निकले लेकिन मेरे मुसलमान नेवल कमाण्डर कितने वफादार निकले जिन्होंने मुसलमान सुल्तान के खिलाफ जंग में लड़कर मेरे लिए बहादुराना लड़ाई लड़ी।’’
एक बार शिवाजी का एक कमाण्डर कल्याण शहर को लूटकर वहां के सूबेदार मुल्ला मुहम्मद की बहू को कैद कर लाया और शिवाजी के दरबार में पेश करते हुए कहा कि, ‘महाराज मैं आपके लिए एक नायाब तोहफा लाया हूँ।’ इतना सुनकर शिवाजी क्रोध में तमतमा उठे। उन्होंने कहा कि ‘तुमने न सिर्फ अपने मजहब की तौहीन की है बल्कि अपने महाराज के माथे पर कलंक का टीका लगाया है।’ फिर शहजादी की तरफ मुखातिब होकर कहा कि ‘बेटी! तुम कितनी खूबसूरत हो। काश! मेरी माँ भी तुम्हारी तरह खूबसूरत होती।’ फिर शिवाजी ने उसे तोहफे देकर फौजी टुकड़ी की निगरानी में ससम्मान वापस भेज दिया और सूबेदार से अपने कमाण्डर की गलती के लिए माफी मांगी।
आइए! किसी पुराने जख्म को कुरेदने के बजाय मुहब्बतों का मरहम लगाकर देश और समाज को बचा लें।