संपादकीय

संपादकीय भाग 1

कोढ़ में खाज - खनन और नशा
प्राकृतिक संसाधनों की लूट और युवा पीढ़ी की नशे पर बढ़ती निर्भरता आज उत्तराखण्ड में विकास के पैरों पर पड़ी वह बेडि़यां हैं जिसने इसे खोखला और बेचैन कर दिया है । किसी ने भी नहीं सोचा था कि खनन, नशा उत्तराखण्ड में तरक्की करने का ऐसा माध्यम बन जायेगा कि इसकी चपेट में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से आबादी का एक बढ़ा हिस्सा त्रस्त रहेगा। भू -माफिया हो या खनन माफिया - यहां इस कदर सक्रिय हो जायेंगे कि जिससे उत्तराखण्ड राज्य बनाने की मूल भावना दम तोड़ने लग जायेगी, जिस तेजी से प्राकृतिक  संसाधनों की लूट खसोट हो रही है । वह एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है और लोग इससे कितना भी प्रभावित क्यों न हो, उनका सामाजिक एवं आर्थिक नुकसान क्यों न हो रहा हो, स्वास्थ्य का स्तर कितना ही क्यों न गिरता जा रहा हो, परवाह किसे है । जिसको परवाह है व उसने चिंता विरोध प्रकट किया तो रामनगर जैसे कांड उदाहरण बनने में देर नहीं लगाते हैं । राज्य आंदोलनकारी प्रभात ध्यानी व मुनीश कुमार जैसे उदाहरणों से हमारा 15 वर्षों का इतिहास भरा पड़ा है । खनन व नशा - इन दोनों के प्रभाव से राज्य में गुंडागर्दी, लूटपाट, असामाजिक घटनाओं व मानसिक व शारिरिक रोगों में अंधाधुंध वृद्धि हो गयी है । जब -जब विरोध के स्वर उठते हैं चाहे वह रामनगर से हों या गरुड़ सेे , तब-तब उन्हें कुचलने की हर संभव कोशिश माफियाओं द्वारा की जाती है । यह राज्य में इस समय एक बड़ा मुद्दा हैं -जहां राज्य आपदा का दंश अभी तक झेल रहा है । पर्यटन विकास, रोजगार, सामाजिक विकास व मूलभूत सुविधाओं के लिए राज्य संघर्ष कर रहा है लेकिन इस तरह की घटनाऐं उस संघर्ष का दम तोड़ रही हैं। खेत-खलिहान फसल उगाने के स्थान पर खनन सामग्री एकत्र करने के स्थान बनते जा रहे हैं । सड़कों को जैसे चेचक की गंभीर बीमारी लग गयी हो, जो सुधरने का नाम ही न ले। अगर अभी भी न चेते तो परिणाम गंभीर होंगे । ऐसा लगता है जैसे जहां पहले ही विकास की उम्मीद को कोढ़ हो गया हो, उसमें खनन और नशा जैसे खाज से लोग बुरी तरह बेचैन हो रहे हैं।