संपादकीय

संपादकीय भाग 2

संपादकीय
2017 के आगामी चुनाव से राजनीति की गलियों में चहल पहल तेज हो गयी है। दावेदार टिकट की दावेदारी, तो पार्टियां अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए जुट गई हैं। नेताओं के ताबड़तोड़ दौरों का दौर शुरू हो चुका है। सत्ता जनता पक्ष हो या विपक्ष या सन्ता की गलियों से होते हुए विधानसभा में अपने लिये जगह तलाश रही पार्टियां सभी ने अपनी बैटरियां चार्ज करने के लिये लगा दी हैं। घोषणाओं का सावन आने से सपनों की फसल उत्तराखण्ड की जनता के दिमाग में बोनी शुरू कर दी गई है। कौन सबसे शानदार सपनों से जनता को सहानुभूति देकर सत्ता हासिल कर सकेगा, यह 2017 में स्पष्ट हो जायेगा। वैसे तो यहाँ पर राजनीति में भविष्य तलाशने वालों की कमी नहीं है। आमजन की संख्या को टक्कर देती हुई नेताओं की अच्छी खासी संख्या यहां उपलब्ध है। मुद्दों की यदि बात करें तो उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के समय से भी पुराने मुद्दे हैं। मुद्दों की चमक उतनी ही जितनी कि पहले थी। पता नहीं कि कौन सा लेप लगा रखा है इन मुद्दों पर कि उगते हुए सूरज की तरह चुनाव में उम्मीद जगा जाते हैं। इस बार भी विकास, चिकित्सा, पलायन, रोजगार, सड़क और भी ना जाने कितने सपनों को चमकाकर बेचने की तैयारी शुरू हो चुकी है। हालत ये हो चुकी है कि चुनाव किसी भी महीने में आये, जनता बस बनती अप्रैल फूल ही है। उपेक्षा के इतने गहरे दंशों के बाद भी जनता प्रदेश को अभी तक प्रयोगशाला बनाने को बाध्य है। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा क्षेत्रीय दल तो उगते ही अपने ताप से जलकर समाप्त से हो गये और अभी तक उनके प्रभाव में आने की संभावना भी कम ही है। प्रदेश की हालत ऐसी हो गयी है जैसे कि तुलसीदास जी का यह दोहा-
तुलसी स्वार्थ मित सब
परमारथ रघुनाथ!!
अपने लोग जिन्हें प्रदेश के विकास के लिये जनता ने समर्थ बनाया वह अपने-अपने स्वार्थो में इतने व्यस्त प्रतीत होते हैं कि ऐसा लगता है कि वाकई यह देव भूमि जितना भी चल रही है वह ईश्वरीय अनुकम्पा ही है। प्रदेश विकास की एक प्रयोगशाला बनकर रह गया है। राज्य निर्माण के इतने समय बाद भी, ऊर्जा प्रदेश, पर्यटन प्रदेश, हर्बल प्रदेश ना जाने किन-किन प्रदेशों के निर्माण की प्रयोगशाला बन गया है।यथार्थ से कोसों दूर राजनीति की होती गहरी पैठ के बीच प्रदेश का जनमानस राजनीति का शिकार तो नहीं हो गया है। फिलहाल 2017 नजदीक है। सपनों के व्यापारियों ने दुकानें सजानी शुरू कर दी हैं। तैयार हो जाओ सपने खरीदने के लिये, अपने वोटों से। यह समय है सपनों को गंभीरता से हकीकत तक पहुँचाने का। चुनाव कोई भी हो, जनता का सही समय होता है वोट के हिसाब-किताब का। तय जनता को करना है प्रतिनिधियों से कि आखिर कब तक वोट के बदले गाल हाथों में रखकर वहीं दसियों वर्ष पुराने सपनों को पूरा होने की राह देखते रहेंगे इस लोकतंत्र के जन-गण-मन।