संपादकीय

संपादकीय भाग 3

संपादकीय
वन्य जीवों और मनुष्य के बीच संघर्ष वैसे तो कोई नई बात नहीं और मनुष्य और मानवीय स्तर पर जानवरों द्वारा क्षति की भरपाई करने के लिये मुआवजे की भी व्यवस्था है। कई बार तो इसका परिणाम मौतों पर भी संवेदना जुटा लेता है, पर पशु-पक्षी ऐसी संवेदना नहीं जुटा पाते। अब इस संघर्ष के गम्भीर परिणाम हलीपार गाँव में हई जानवरों की मौत बयां कर रही है। इस बार यह संकट काफी विकट रहने की संभावना है। जल स्रोतों में पानी की कमी, वर्षा के ना होने के कारण आगामी गर्मी में गम्भीर रूख लेने की ओर है। जमीन में नमी ना होने के कारण जंगलों में आग लगने के खतरे भी गर्मी के दिनों के साथ बढ़ रहे हैं। सीमित साधनों के कारण भोजन, पानी के लिये निर्भरता बचे हुए संसाधनों पर पड़ने की पूरी संभावना है और यह मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को काफी बढ़ा दे, यह भी हो सकता है। पानी और जवानी दोनों को संरक्षित करने में नाकामी के कारण इनकी कमी हमेशा से ही खलती रही है। वैसे तो मौसम की मेहरबानियों के कारण बेहद गम्भीर नहीं हुई है पर इस वर्ष इसके भी आसार बन रहे हैं। भोजन और पानी की जदोजहद में कई गम्भीर परिणामों का खतरा भी सामने आ रहा है। जंगलों में भोजन की कमी के चलते जानवर खेतों का रूख कर रहे हैं और मौसम की मार झेल रहे किसानों की मेहनत बेकार कर रहे हैं और हलीपार गाँव में हुई घटना जिन अंदेशों की ओर इशारा कर रही है वह बेहद ही चिंतापूर्ण है। जानवरों को जहर देकर हत्या ना तो आज तक इस संघर्ष को कम करने के लिए कारगर सिद्ध  हुई है और ना ही परिणाम उत्साहवर्धक प्राप्त हो सके हैं। लेकिन यह स्थिति भविष्य में पुनरावृत्ति कर सकने वाली जिन घटनाओं की ओर इशारा कर रही है उस ओर शासन और प्रशासन तथा लोगों को बेहद गम्भीरता के साथ कार्य करने और इससे बचने के लिये रूप रेखा तैयार करने की आवश्यकता है। लोगों को जागरूक करने और विशेष सतर्कता रखने की भी आवश्यकता है कि कोई भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। जंगली जानवरों को जंगलों में ही जल और भोजन कैसे उपलब्ध हो कि इस संघर्ष को रोका जा सके, इस ओर भी विशेष ध्यान देने और कार्य करने की आवश्यकता है। इन घटनाओं को और हल्के में लेने और नीरसतापूर्ण व्यवहार करने से स्थिति बेहद गम्भीर रूप ले सकती है। इस वर्ष वर्षा कम होने के कारण यह बेहद सतर्कता का वर्ष है। सभी इस कठिन समय को बिना किसी संघर्ष के बिता दें ऐसे प्रयासों की बेहद आवश्यकता है। यदि कारगर उपाय नहीं हुए तो वन्य जीवों की हत्या और संघर्ष के मामले सामने आते रहेंगे। संघर्षाें को कम करने के लिये इस क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं और लोगों को भी सामने आना चाहिए और प्रयास करने चाहिए तथा जिम्मेदार विभागों और इन संस्थाओं के बीच सामंजस्य यदि बेहतर होगा तो लोगों को जागरूक करने में जहाँ सहायता मिलेगी वहीं इस समस्या का रूख इतना गम्भीर नहीं होगा कि किसी को अपने जीवन से धोना पड़े।