संपादकीय

संपादकीय भाग 4

संपादकीय
उत्तराखण्ड में महिलाएं हमेशा ही महिला सशक्तिकरण की मिसाल रही हैं। संस्कृति, पर्यावरण हो या फिर आर्थिक क्षेत्र सभी जगह महिलाओं की अहम भूमिका रही है। संस्कृति  एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महिलाएं जो निरन्तर कार्य करती है उनके संरक्षण व हस्तांतरण का वह परम्पराओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। पहाड़ों में आधार स्तम्भ की तरह महिलाओं ने कार्य किया है और कर रही हैं। यह सब कुछ इस तरीके से रचा बसा है कि इसे आसानी से महसूस किया जा सकता है कि कितनी सशक्त है। पहाड़ की महिलाएं जो विस्फोटक ऊर्जा के साथ सामान्य से दिखने वाली दिनचर्या को बेहद सामान्य बना देती है । आज के समय में महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में जबरदस्त सफलता हासिल की है और अपनी पहचान बनाई है लेकिन इस बात से भी मना नहीं किया जा सकता कि पलायन के विरुद्ध  जो कि प्रदेश की एक बड़ी समस्या है अन्तिम क्षण तक  महिलएं ही खड़ी रहती हैं। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अभी काफी कुछ जमीनी क्षेत्र में किया जाना बाकी है। ताकि उस विस्फोटक ऊर्जा का उपयोग किया जा सके जो उचित मार्गदर्शन के अभाव में कुंद पड़ी है। आर्थिक विकास की सम्भावनाओं के आधार पर यदि महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाये, नई तकनीकों से रूबरू कराया जाय। व्यक्तिगत स्तर पर या फिर सामूहिक स्तर पर किस प्रकार से कार्य किये जा सकते हैं, किस प्रकार के उत्पाद जो कि आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, कैसे उनका उत्पादन हो और कैसे उन उत्पादों को बाजार तक पहुँचाया जाय कुछ ऐसे कई कार्य हैं जिसके द्वारा महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़े रखने की आवश्यकता है। इसके लिए स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ सरकार को भी युद्ध पर कार्य करने की आवश्यकता है। जानकारी का अभाव चाहे किसी भी क्षेत्र में हो चाहे वह आर्थिक हो या फिर सामाजिक, समस्याओं का कारण बनता है। इस अभाव को समाप्त करने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है। नई-नई संभावनाओं को तलाश करने और उन पर कैसे कार्य किया जाय यह समझने और समझाने की आवयकता है। ऐसी कार्यशालाऐं व गोष्ठियों का आयोजन हो जो कि सम्भावनाओं को तलाशने में इनको आत्मनिर्भर बना सके। शहर में तो महिलाओं के लिये काफी संभावनाऐं हैं लेकिन गांव में रहते हुए कैसे कार्य किया जाय इसके लिए सूचना प्रौद्योगिक का इस्तेमाल भी कारगर हो सकता है, कैसे इसे जीवन में सम्मलित करें। प्रोत्साहन भी इस क्षेत्र में काफी अहम भूमिका निभा सकता है। ऐसे कई कार्याें को एक जन आन्दोलन के रूप में समाहित कर यदि जागृत किया जाय तो परिस्थितियाँ बेहद खुशगवार होंगी। महिला दिवस पर महिलाओं का सम्मान अच्छी परम्परा है लेकिन साल भर इसके लिये कार्य होते रहने चाहिए। इसके लिये सामथ्र्यवान और सफल महिलाओं को आगे आना चाहिए और प्रेरित करना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि इस दिशा में सकारात्मक प्रयास होेंगे। नारी दिवस की शुभकामनाऐं उज्जवल भविष्य के संकल्पों के साथ।