संपादकीय

संपादकीय भाग 5

संपादकीय
राजनीति में सकारात्मक पहलों की बेहद आवश्यकता रहती है। सत्ता पक्ष की छवि भ्रष्टाचारियों की और विपक्ष की भूमिका ऐसे प्रश्नों से भरे प्रश्न पत्र की तरह रहती है जिसके उत्तर वह स्वयं भी नहीं देना चाहते। विकास के पथ पर कैसे आगे बढ़ा जाय इस विषय से ज्यादा विपक्ष की रूचि ऐसे प्रश्नों को खड़ा करने में होती है जो नकारात्मकता का माहौल बना सके। यदि समस्याओं पर बात हो रही हो तो समाधान सुझाना क्या विपक्ष का कार्य नहीं है। लेकिन भय भी तो है कि कहीं सत्ता का सुख एक सकारात्मक ऊर्जा से भरे विपक्ष की तरह व्यवहार करने से छूट न जाय और सत्ता पक्ष भी तो रूचि नहीं लेता विकास के लिए। विपक्ष का मार्ग दर्शन लेने में ये बातें इसलिये उठ रही हैं क्योंकि जो गुमराह करने का सिलसिला चला वह बदस्तूर जारी है। चुनावी महौल की गरमाहट आते ही जख्मों को कुरेदकर हरा करने की जो प्रवृत्ति देखने को मिलती है वह चुनाव के साथ थम क्यों जाती है। कुछ पंक्तियों का भावार्थ यदि चुनावी भाषा में समझे तो तुलसी स्वारथ मीत सब। जितने भी हितों की बात करने वाले मिलते हैं चुनावी माहौल में वह सभी स्वार्थों के वसीभूत होकर हितों और विकास की बात करते हैं और चुनाव समाप्त हुए नहीं कि राज योग वाले राजयोग में बाकि सब जोग में निकल जाते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि अपने ही मितों के द्वारा ठगा जाना क्या होता है और कितना कष्टप्रद होता है। इसे हम नजदीक से महसूस करते हैं। हमेशा समस्याऐं उगलने वाली पोटलियाँ यदि समाधान उगलने लगें, विकास में सहयोग करने लगें तो लोगों के पास शायद उम्मीदों का वह विश्वास अपने प्रतिनिधियों के लिये होगा कि इस पार्टी के पास विकास के लिये नये विचार हैं जो कि आगे बढ़ने के लिये ज्यादा कारगर हैं। इन्हें चुनते हैं, ना कि यह विकल्प कि वह विकल्प जो हम चुनते हैं कि पिछले में बहुत घोटाले हुए अब इनको चुनते हैं। सकारात्मक राजनीति प्रदेश की दिशा बदलने के लिये बेहद आवश्यक है। राजनीति का प्रयोग यदि प्रयोगशाला की तरह ना होकर उत्ड्डष्ट राजनीतिक उत्पादों के लिये हो तो जन जीवन निरसता और नकारात्मकता से निकलकर उत्साह के क्षेत्र में प्रवेश कर सकेगा। समस्या का पता होना जितना जरूरी है उतना ही उनका कारण और निवारण। कैसे समस्याओं से बाहर निकला जाय यह महत्वपूर्ण है। सत्ता के लिये जिस प्रकार की राजनीति का प्रयोग हो रहा है वह जनता का मनोबल गिराने के लिए काफी है। जिस दिन समस्याओं के पिटारे से समाधान की रोशनी निकलने लगेगी उस दिन विकास निश्चित तौर पर सही दिशा में आगे बढ़ निकलेगा।