संपादकीय

संपादकीय भाग 7

संपादकीय
उत्तराखण्ड में गर्मियों का मौसम आते ही जंगलों की आग किसी आपदा से कम नहीं होती है। बीते वर्ष समूचा प्रदेश इससे बुरी तरह प्रभावित रहा। वनों को आग से बचाना और आग लग जाने पर इसे नियंत्रित करना विभाग के लिये एक बड़ी चुनौती होती है। इस चुनौती से निपटने के लिये वन विभाग ने तैयारी शुरू कर दी है। पिछले वर्ष वनाग्नि की भयावह स्थिति को देखते हुए वायु सेना के हेलीकाॅप्टरों को भी इसे नियंत्रित करने के लिये लगाना पड़ा। वैसी स्थिति फिर न हो इसलिये बेहद चैकस रहने की आवश्यकता है।
उत्तराखण्ड का लगभग 71 फीसदी भू-भाग वन क्षेत्र है जिसकी निगरानी करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। पिछले कुछ दिनों में तापमान में वृद्धि होने के कारण जंगलों में आग लगने का सिलसिला शुरू हो चुका है। इसे नियंत्रित करना पर्यावरण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। वनों में आग के कारण जहाँ बहुमूल्य वन सम्पदा नष्ट होती है, वहीं बड़ी संख्या में वन्य जीव हताहत होते हंै। वनाग्नि की स्थिति पिछले वर्ष की तरह गम्भीर ना हो इस समस्या के समाधान के लिये वन विभाग को गम्भीर होना पड़ेगा। सबसे महत्वपूर्ण है जन-संवाद और जन-सहभागिता। बजट और संसाधनों की कमी के बहाने के बावजूद जन भागीदारी का होना जरूरी है पर यह विभाग की कार्यशैली और संबन्धों पर ज्यादा निर्भर करता है। आॅफिस कलचर और फील्ड वर्क की कमी के कारण विभाग इस स्थिति में स्वयं को अकेला महसूस करता है। छोटा फील्ड स्टाफ बड़ी परेशानियों से जूझता है। इस कार्यशैली में सुधार लाने की जरूरत है ताकि लोगों के साथ मिलकर इस समस्या का सामना किया जा सके। साथ ही एक ऐसी कार्य योजना का होना भी बेहद जरूरी है जो वनाग्नि के लिये जिम्मेदार कारणों का निस्तारण कर सके। जन जागरूकता भी इसके लिये बेहद जरूरी है क्योंकि जब तक लोग इस मुहिम से नहीं जुडं़ेगे, उनका सहयोग नहीं मिलेगा। तब तक ना तो विभाग को राहत मिलेगी ना वन और वन्य जीवों को। सभी गर्मी आते ही त्राहिमाम करते हुए विचलित रहेंगे। पंचायत के माध्यम से लोगों को अग्नि से सुरक्षा और आग लगने की स्थिति में प्राथमिक उपायों का प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है।
वनाग्नि से निपटने के लिये निश्चित तौर पर चिंता के साथ चिंतन की भी आवश्यकता है। सहयोगी विभागों में आपसी तालमेल भी आवश्यक है लेकिन यह सब शासन-प्रशासन और वन विभाग की इच्छा-शक्ति पर निर्भर करता है। उत्तराखण्ड में प्रकृति से जनमानस का आत्मीय सम्बन्ध रहा है। इसे पुनस्र्थापित करने, लोगों की समस्याओं को समझने और उसके यथा सम्भव निवारण की आवश्यकता है। लोगों को जंगल से वंचित करने नहीं बल्कि जोड़ने के प्रयास होने चाहिए ताकि प्राकृतिक संपदा को संरक्षण प्राप्त हो सके। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में वनाग्नि से बचने के लिये जागरूकता अभियान नहीं चलाये जातेे लेकिन जन भागीदारी तभी बढ़ेगी जब तक उनको यह नहीं लगता कि जंगल उनके हैं और उनको बचाना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। कई कार्यक्रम तो केवल खानापूर्ति के लिए आयोजित किये जाते हैं। इसलिये परिणाम भी वैसे ही प्राप्त होते हैं।
एक बड़ी समस्या जंगलों में आग लगाने वालों की है जिन पर अति कठोर कार्यवाही की आवश्यकता है क्योंकि उनकी इस हरकत से जंगल ही नष्ट नहीं होते बल्कि बड़ी तादाद में वन्य जीव, नाना वनस्पतियाँ और कई बार कर्मचारी और नागरिक भी इसके शिकार हो अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते हंै। सरकार को यदि वनों की स्थिति सुदृढ़ रखनी है और उसे आग से बचना है तो कर्मचारियों की कमी से भी विभाग को मुक्ति दिलाने के प्रयास करने होेंगे। फिलहाल तो अगले तीन चार माह वन विभाग के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। यह दीगर बात है कि दो-तीन दिन की हल्की बारिश से तमाम वनों में लगी आग बुझ जाने से वन विभाग को राहत अवश्य मिल गई है पर इसका मतलब यह नहीं कि अब आग नहीं लगेगी। इसलिए अग्नि सुरक्षा के लिए चाक-चैकस रहने के साथ ही इस चुनौती का सामना करने के लिए हर संसाधनों के साथ तत्पर भी रहना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जंगल का महत्व समझने और समझाने की जरूरत है। जंगल सिर्फ आय का स्रोत ही नहीं होते यह जीवन-यापन के लिए भी जरूरी हैं।