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संस्मरण: ‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 1

अनिल पंत, नैनीताल -
सोशियल मीडिया में डाली गई जानकारी के अनुसार बाबा नीब करौरी महाराज के चरणानुरागी श्री अनुराग कृष्ण पाठक जी पर महाराज की असीम अनुकम्पा है। बाबा महाराज ने श्री अनुराग कृष्ण पाठक जी को दिव्य देह के साथ भागवत रस का दिव्य ज्ञान भी दिया है। आपकी वाणी से निसृत भागवत ‘सर’ में सामान्य भक्तजन के साथ-साथ द्वैत-अद्वैत के विद्वज्जन भी गोते लगाकर स्वयं को धन्य पाते हैं। ऐसे श्री अनुराग कृष्ण पाठक जी ने बाबा नीब करौरी महाराज की लीलाओं का संकलन किया है... और उस ग्रंथ को नाम दिया है, ‘‘रहस्यदर्शी श्री नीब करौरी बाबा’’।
महाराज जी के परम भक्त राजीव शर्मा जी आगे लिखते हैं कि अनुराग जी से मेरी भेंट, महाराज जी के जैविक पुत्र-उत्तराधिकारी समाननीय धर्म नारायण जी और बाबा चन्द्रशंकर जी की महति कृपा से संभव हुई...
श्री अनुराग कृष्ण पाठक जी के इसी ग्रंथ के कुछ अंश यहां पर...
1- भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू असम जाते वक्त कुछ देर के लिए कलकत्ता हवाई अड्डे पर ठहरे। वहां एक पत्रकार वार्ता आयोजित की गयी थी। नेहरू जी के साथ कई उच्चाधिकारी भी थे। पत्रकार वार्ता चल ही रही थी कि हवाई अड्डे पर एक दूसरा विमान उतरा। इस विमान के उतरते ही कई पत्रकार नेहरू जी की वार्ता बीच में ही छोड़कर हवाई पट्टी की तरफ भाग पड़े। नेहरू जी ने अपने अधिकारियों पूछा कि ये पत्रकार उनकी वार्ता खत्म हुए बिना हवाई पट्टी की तरफ क्यों भाग गये? नेहरू जी के अधिकारियों में से एक बाबा महाराज के भक्त ने बताया कि अभी-अभी उतरे जहाज से बाबा नीब करौरी महाराज पधारे हैं...सभी लोग उनके दर्शन के लिए दौड़ रहे हैं। इस दृश्य को देखकर नेहरू जी आश्चर्यचकित थे। नेहरू जी के मुंह से निकला, ‘‘हमारा भारत निश्चित ही भाग्यशाली है, यहां इतने बड़े-बड़े संत हैं जिनके दर्शन मात्र के लिए लोग प्रधानमंत्री को भी छोड़ जाते हैं....’’
2- विश्व विख्यात स्वामी शिवानंद जी ने अपने विभिन्न पुस्तक, लेख, वक्तव्य और प्रवचनों में बाबा नीब करौरी महाराज को ‘ईश्वर तुल्य’ बताया है। शिवानंद जी का भव्य आश्रम ऋषिकेश में गंगा के पश्चिमी तट पर है. एक प्रसंग स्वामी शिवानंद के संबंध में...
कैंची धाम में एक बार शिवानंद आश्रम से आये हुए एक सन्यांसी को महाराज जी ने पूडि़यां खिलायीं और उसको मंदिर के पीछे गुफा में बैठ जाने को कहा। परंतु वह सन्यासी महाराज के प्रति इतना आकर्षित था कि वह गुफा से लौट कर तुरंत उनके पास आ गया। फिर महाराज जी ने उसे एक ऐसे पेड़ के नीचे बैठने का आदेश दिया जहां से वह महाराज जी को देख सकता था। उस सन्यासी की आंखों के आगे कैंचीधाम शिवानंद आश्रम में बदल गया, महाराज जी उसको शिवानंद जी जैसे दिखने लगे। फिर महाराज जी स्वयं उसके पास चलकर पहुंचे और बोले, ‘क्या तू यह सोचता है कि हमारे बीच (शिवानंदजी और महाराज जी) कोई अंतर है... क्या हम एक ही नहीं हैं...’ वह सन्यासी महाराज जी की लीला देख कर अवाक रह गया। उसके मुंह से निकला... आप वहां उस रूप में हैं...आप सचमुच एक मात्र हैं... आप मुझे इस रूप में भ्रमित कर रहे हैं। महाराज जी अपने स्वरूप में लौटे...कुछ बोले नहीं... सिर्फ मुस्कुरा भर दिए..!
महाराज जी ऐसे कौतुकी हैं वो एक ही समय पर कई-कई स्थानों पर एक साथ प्रकट हो जाते हैं तो कभी एक ही स्थान पर कई अलग-अलग रूप धारण कर लेते हैं।
3- दिल्ली के ग्रेटर कैलाश क्षेत्र में प्रेक्टिसरत डाॅक्टर आर के करोली से संबंधित एक घटना-
‘‘... महाराज जी दिल्ली आये हुए थे। डाॅक्टर करोली अस्पताल जाने से पहले महाराज जी के दर्शन के लिए उस कोठी में पहुंचे जहां महाराज जी विराजमान थे। डाॅक्टर करोली ने बाबा के भोग के लिए रास्ते में केले खरीदने की सोची लेकिन नहीं ले पाये। कोठी पर पहुंचने पर देखा कि वहां तो बाबा के दर्शनों के लिए भक्तों की भारी भीड़ लगी हुई है। डाॅक्टर करोली भी भीड़ में खड़े हो गये। इतने ही में एक उद्योग पति आये और धड़धड़ाते हुए भीतर चले गये। डाॅक्टर करोली को यह देखकर क्षोभ हुआ कि साधु-महात्माओं के यहां भी पैसे वालों की पूछ होती है। इस कारण से उन्होंने महाराज के दर्शन छोड़ वापस अस्पताल जाने का इरादा कर लिया। डाॅक्टर करोली वहां से लौटने लगे तो एक व्यक्ति ने उनसे आकर पूछा- क्या आप ही डाॅक्टर करोली हैं?’’
डाॅक्टर करोली ने कहा - हां
आपको महाराज जी भीतर बुला रहे हैं- उस व्यक्ति ने डाॅक्टर करोली से कहा-
डाॅक्टर करोली इस घटना से हतप्रभ रह गये। जब वे महाराज जी के सामने पहुंचे तो महाराज जी ने कहा- तू केले नहीं लाया, ले केले का प्रसाद ले। फिर महाराज जी बोले- ‘‘तू वापस जा रहा था न...! सुन, हमारे पास बड़े-छोटे के भेद का सवाल नहीं है...’’।