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संस्मरण: ‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 2

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज प्रतिदिन एक पुस्तक में राम नाम लिखा करते। वे कहते राम नाम से सब काम पूरे हो जाते हैं। जब कभी यात्रा में इधर-उधर जाते माँ उनके लिये इस डायरी को साथ ले जाया करतीं। महाराज ने 9 सितम्बर का दिनांक लिख कर डायरी का पृष्ट भरा। इसके बाद 10 सितम्बर का पृष्ठ भी भरा। 11 सितम्बर का दिनांक लिखकर छोड़ दिया और पुस्तक माँ को देते हुए बोले,‘‘अम्मा अब यह कापी तेरी है। तू ही इसमें आगे लिखेगी।’’ डायरी माँ को देकर आपने परोक्ष रूप से अपना कार्यभार उन्हीं को सौंप दिया। दिन के समय एक बजे महाराज जी बोले, ‘‘अब जाते हैं।’’ और श्री के0सी0 तिवाड़ी जी से कहा कि इन्दर (श्री सर्वदयन रघुवंशी) से गाड़ी प्रवेश द्वार पर लगाने को कहा। इस बीच आपने राधा कुटी में श्री माँ से विदाई ली। आप अनेक बार बातों के सिलसिले में कह चुके थे। ‘‘अम्मा तूने जैसी हमारी सेवा की, ऐसी काहू से किसी की न बन पायी और न आगे किसी से होगी। जब मैं अन्त में जाऊँगा तो तेरे आगे रोता हुआ जाऊँगा और दुनिया के आगे हँसता हुआ।’’ आज वह दिन आ गया। बाबा ने माँ को अभय वरदान देते हुए कहा कि जहाँ भी तू रहेगी वहाँ मंगल हो जायेगा। आप सिसक-सिकस कर रो रहे थे। जब माँ ने आपके साथ चलने का आग्रह किया तो आप बोले,‘‘हम अपने एक भक्त डाॅक्टर के पास आगरा जा रहे हैं। वह हमारी सेवा करेगा और अमेरिका से आई हुई नई मशीन से हमारी जाँच भी करेगा। हम उसे दिखाकर दूसरे दिन वापस आ जायेंगे। जरूरत पड़ी तो तार कर देंगे। तुम रमेश (अपने पुत्र) के साथ चली आना।’’ महाराज की प्रत्येक बात अंत में सत्य घटित हुई।
माँ से विदा लेकर जब आप राधा कुटी से बाहर आये तो आपको दो व्यक्तियों ने प्रणाम किया और उन्हीं का हाथ थामे हनुमान मंदिर को चल दिये। वहाँ उपस्थित जन समुदाय आपके चरणों में नतमस्तक होता गया। आप कहते जा रहे थे, ‘‘आज हम सेन्ट्रल जेल से रिहा हो रहे हैं।’’ जब आप हनुमान मंदिर में हाथ जोड़े खड़े थे तो आपका कम्बल वहाँ गिर गया जिसे लोगों ने तुरंत उठा कर आप को ओढ़ा दिया। कम्बल का इस प्रकार गिरना एक आश्चर्य जनक घटना थी। इसके बाद महाराज लक्ष्मीनारायण मंदिर और शिव मंदिर दर्शन हेतु गये फिर प्रवेश द्वार की ओर चल दिये। वहाँ पर एक भक्त ने आप की फोटो खींची (अंतिम बार)। वहीं पर आपका कम्बल बदन से फिर गिर गया। भक्तों ने उसे उठाकर फिर से ओढ़ाना चाहा पर वो इसके लिए राजी नहीं हुए। वह कम्बल लहराकर उनकी गाड़ी में रख दिया।
अनेक भक्त उनके साथ जाने की अनुमति माँग रहे थे पर महाराज ने अपने एक भक्त रवि खन्ना जो कुछ ही समय से सेवा करने आया था उसे ही अपने साथ कार में बैठने को कहा और इन्दर बाबू ने महाराज की अनुमति पाकर कार चलायी। महाराज के जाने के बाद कैंची आश्रम में उदासी सी छा गयी। लोग अपने-अपने घरों को जाने लगे और यज्ञशाला के निर्माण का कार्य, जो महाराज शुरू करा गये थे, चल रहा था। काठगोदाम पहुँचने पर इन्दर बाबू ने जब उनके साथ चलने की अनुमति चाही तो वे बोले, ‘‘तूने आज यज्ञशाला की छत तैयार करावानी है। हम तुझे जल्द बुलायेंगे।’’ उस रात ट्रेन में वे रवि खन्ना से बातें करते रहे और बोले, ‘‘हम धर्म प्रचार और प्रसार के लिये आये हैं।’’ अंतिम यात्रा में रवि खन्ना ने जो भी आपकी सेवा की उससे उसका भाग्य चमक उठा। महाराज की कृपा से उनके विदेशी भक्तों मेें खन्ना जी को अमेरीका ले जा कर वहीं सुव्यवस्थित कर वहीं का नागरिक बना दिया।