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सन्त भक्तों के अनुभव भाग 1

सन्त भक्तों के अनुभव
हरिश्चन्द्र मिश्र-
परम सन्त सिख सन्त के भक्तों में अध्यापक श्री मोतीराम वैष्ण्व के पुत्र श्री गोपाल दत्त वैष्णव तथा श्री देवी प्रसाद खत्री कपूर ;उद्यान विभागद्ध के पुत्र श्री पप्पू खत्री ने अपने को कृतार्थ  किया। एक अवसर पर सिख सन्त मुरली मनोहर मन्दिर के प्रांगण में बैठे थे। वर्षा हो रही थी। उन्होंने कम्बल ओढ़ा था। उनका हाथ पीछे की ओर घुटने की तरफ मुड़ा था। भक्त गोपाल दत्त वैष्णव, पप्पू कपूर तथा अधिवक्ता श्री हरीश चन्द्र जोशी आपस में विचार कर रहे थे। सिख सन्त की ओर देखकर अधिवक्ता जी ने कहा, ‘‘यह तो पूज्य साईं बाबा हैं।’’ उनकी आकृति साईं बाबा से साम्यता रखती थी। इस रहस्य का उद्घाटन कालान्तर में भक्त हरिश्चन्द्र जोशी अधिवकता को शिरडी में हुआ। सिख सन्त की सेवा में श्री ओम साह, श्री विशन दत्त जोशी का प्रमुख स्थान था। खजांची मुहल्ले के भक्तों के सहयोग से इस महान सन्त की अन्त्येष्टि श्री विश्वनाथ धाम में हुई। अन्त्येष्टि के समय वर्षा होने लगी परन्तु संस्कार के बाद चटक धूप खिल गई। आश्चर्य की बात है कि अन्त्येष्टि के समय एक साधु प्रकट हुए। भक्तों ने इस साधू का सिख सन्त की षोडसी तक सत्कार किया। असहायों को कम्बल वितरित किये गए। उस साधु के पास एक कमण्डल और चिमटा था। षोडसी के बाद उक्त साधु अन्तध्र्यान हो गये। अधिवक्ता श्री हरिश्चन्द्र जोशी के शिरडी जाने पर भक्त ने उक्त कमण्डल और चिमटा शिरडी में देखा था। भक्तों का कथन है पूज्य साईं बाबा इस रूप में अल्मोड़ा विश्वनाथ धाम पधारे थे। अल्मोड़ा साईंधाम इसी महान सिख सन्त की दया का फल है।
महाकवि तुलसीदास ने ठीक ही कहा है-
‘‘करहु कुवेसु साधु सन्मानू
जिमि जग जामवंत हनुमानु’’
आज साईंधाम पवित्र तीर्थ बन गया है। बसन्त पंचमी को विशाल भण्डारे का आयोजन कर मानवसेवा के व्रत का पालन किया जा रहा है। इस वर्ष 4/2/2008 से स्वामी अनन्ताचार्य की भक्ति लहरी श्री मार्कण्डेय पुराण के कथा श्रवण के रूप में प्रस्फुटित हुई।
देवभूमि उत्तराखण्ड के खजांची मुहल्ले के परमसन्त सिख सन्त सिर में पगड़ी धारण किया करते थे। हाथ में रोटी का टुकड़ा रहता था। जिस भक्त से प्राप्त होने की आशा रहती उसी भक्त से भिक्षा लिया करते थे। सत् श्री अकाल का अनवरत जाप किया करते थे। वाणी में क्रोध और अपशब्द भी रहा करते थे। रूप रंग से औघड़ प्रतीत होते थे। उनके शरीर में कम्पन होता था। के.एम.ओ.यू. लिमिटेड अल्मोड़ा के महासन्त पूज्य ब्रह्मानन्द सरस्वती उनकी यौगिक शक्ति से परिचित थे। एक अवसर पर उन्होंने अपने भक्त पुत्तनलाल जी के हाथ एक पका आम उनके पास भिजवाया परन्तु उन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया। महासन्त ब्रह्मानन्द जी ने लाला बाजार में जब उक्त आम स्वयं उन्हें दिया तब सत् श्री अकाल कहकर काँपते हाथों से पूज्य ब्रह्मानन्द जी को प्रणाम कर उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया।
सिख सन्त के हाथ में टमरैल तथा कपड़ों में पैबन्द लगे रहते थे। भिक्षा प्रत्येक के गृह से नहीं लिया करते थे। सोनी रेस्टोरेण्ट के श्री सतपाल सिंह, श्री जसविन्दर सिंह के द्वार से रोटी ग्रहण किया करते थे। परम सन्त के भक्तों में श्री बिन्दु भाई का प्रमुख स्थान था। परम सन्त की अन्त्येष्टि में खजांची मुहल्ले के भक्तों के सहयोग से यथेष्ट धनराशि प्राप्त हो गई थी। श्रद्धा तथा धूमधाम से उनकी षोडसी सम्पन्न हुई। उनकी दया से सांईंधाम के 11 वर्ष पूर्ण होने पर सन् 2004 में श्री विष्णु पुराण का आयोजन करवाया गया था। श्री गायत्री परिवार के गायत्री जाप का धाम में आयोजन किया था। ऐसे महान सन्त को उत्तराखण्ड नमन करता है।
साई भक्तों को साईंधाम की स्थापना की प्रेरणा देकर मानव सेवा, भक्ति, प्रेम तथा भाई-चारे का अमूल्य उपदेश देकर पूज्य सिख सन्त ब्रह्मलीन हो गये। साईंधाम के निर्माण कार्य में धर्मपरायण सन्त भक्त श्री गौरीबल्लभ पन्त (सुन पण्डित जीद) के पुत्र भक्त देवीदत्त पन्त का बहुमूल्य योगदान रहा था। मन्दिर निर्माण तक प्रतिदिन वह दिशा निर्देशन किया करते थे। तम मन धन से उनका बहुमूल्य सहयोग रहा। कैंची धाम के श्री साईं सेवक महाराज का साईंधाम निर्माण में अविस्मरणीय योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। साईं सेवक महाराज साईंधाम स्थापना के बाद धनतेरस के पावन पर्व के दिन साईं भक्तों को एकता के सूत्र में पिरोकर ब्रह्मलीन हो गये। प्रति बृहस्पतिवार को अखण्ड कीर्तन से यहाँ का वातावरण धर्ममय हो जाता है। बसन्त पंचमी स्थापना दिवस पर होने वाले भण्डारे में असंख्य लोग तृप्त हो जाते हैं। साईं भक्तों में मैसर्स तुलसीराम अनोखे लाल के परिवारजनों का उल्लेखनीय स्थान है। पप्पू नज्जौन मन्दिर की सेवा में लगे रहते हैं।
कहा जाता है कि वर्तमान साईंधाम के पास प्राचीन काल में एक मन्दिर और साधुओं की कुटिया थी। लोगों के द्वारा अतिक्रमण कर दिया गया था। झाडि़याँ उग गयी थीं। इस स्थान को देखकर अधिवक्ता श्री हरिश्चन्द्र जोशी के हृदय में साईंधाम की स्थापना का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने इस विचार को भक्त देवीदत्त पन्त के सामने प्रकट किया था। दोनों भक्तों ने अन्य भक्तों के सहयोग से इस भूमि को क्रय कर इस प्रकार मन्दिर निर्माण के संकल्प को पूरा किया। यह सब शिरडी के समर्थ साईंनाथ महाराज का आशीर्वाद था। इस स्थान में अब अनेकों साधु आकर सत्संग लाभ लिया करते हैं। इनमें शौकियाथल के परमसन्त श्री सीताराम बाबाजी, बेतालेश्वर के पूज्य नेपाली बाबा महाराज जी का स्थान प्रमुख है।
हाथ मेें टमरैल लिये हुए सिख सन्त परम सन्त साईं के निज स्वरूप थे। वर्ष 1904 में परम सन्त पूज्य सीताराम बाबाजी के क्षरा साईंधाम में प्रत्येक मंगलवार को 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ करवाने का आदेश दिया गया। उनकी ड्डपा से तब से प्रति मंगलवार को अनवरत रूप से हनुमान चालीसा का पाठ कर वहाँ भक्ति गंगा प्रवाहित हो रही है।
सन्तों की इस भूमि में द्योलीडाना अल्मोड़ा में पूज्य पूर्णानन्द ब्रह्मचारी का प्रादुर्भाव हुआ था। परम सन्त गढ़वाल के थे। इस भूमि को उन्होंने देवतुल्य समझकर अपनी साधना का केन्द्र बनाया।
परम सन्त के भक्तों में अल्मोड़ा लाल मूलचन्द, उनके अनुज श्री पुत्तनलाल तथा आश्रम की माईजी प्रमुख थीं। एक अवसर पर बाबाजी ने पुत्तनलाल जी से कहा द्योलीडाना की गुफा में एक साधु पधारे हैं। कल वह बागेश्वर प्रस्थान करेंग अतः आप उनका टिकट देकर बागेश्वर की गाड़ी में बैठा दिया। बाद में बाबाजी ने उनसे कहा,‘‘आपका अहोभाग्य है आपको पूज्य नानतिन बाबा के दर्शन का सौभग्य प्राप्त हो गया।’’ एक अवसर पर स्वामी पूर्णानन्द जी से मन्दिर की माता जी ने पूछा-आज भोग में क्या बनेगा? महाराज ने उनसे कहा लाई की सब्जी निर्मित करो। यह लाई का मौसम नहीं था। माई विस्मित हो गईं कि अब क्या होगा। बाबा का आदेश अडिग था। बाबा जी के भक्त के.एम.ओ.यू. स्टेशन के खजांची श्री शिवलाल साह के पुत्र श्री बसन्त लाल साह नार्मल स्कूल में कार्यरत थे। अवकाश के बाद वह घर जा रहे थे। स्कूल के गेट में उन्हें एक टोकरी में लाई बेचती हुई एक महिला मिली। उन्होंने मोल-भाव कर लाई ले ली। महिला ने सभी लाई उन्हें दे दी। श्री बसन्त लाल जी उस दिन घर न जाकर लाई स्वामी पूर्णानन्द जी के दर्शन हेतु चले गये। रात में उन्हें हिंसक जानवरों से डर लगता था परन्तु महाराज की कृपा से वह द्योलीडाना पहुँच गये। उन्होंने लाई माई को दे दी। स्वामी पूर्णानन्द जी की योग शक्ति से असयम में लाई की सब्जी आश्रम हेतु स्वयं उपलब्ध हो गई।
देवभूमि अल्मोड़ा में स्वामी पूर्णानन्द ब्रह्मचारी के दर्शन हेतु तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री भक्त दर्शन यदाकदा आया करते थे। महाराज की ड्डपा से वह सांसद तथा फिर शिक्षा मंत्री भारत सरकार बने थे। आश्रम की माई के पुत्रों को रोजगार हेतु स्वामी जी ने उनके पास भेजा परन्तु वह उनके आदेश का पालन नहीं कर सके। फलतः अगले वर्ष से सेवा से वंचित हो गये थे। भाई के पुत्रों को उन्होंने पढ़ाई, लिखाई तथा भोजन, आवास की सुविधा का वचन दिया था। स्वामी पूर्णानन्द ब्रह्मचारी अखण्ड तपोबली थे। उनके चेहरे से अद्भुद ओजपुंज प्रस्फुटित होता था। द्योलीडाना में उन्होंने देवी मन्दिर तथा आश्रम का निर्माण किया था। नवरात्रियों में वहाँ भण्डारे का आयोजन किया जाता है। भाई के भक्तों में प्रख्यात शल्य चिकित्सक डाॅ. कुनियाल के परिवार का विशेष स्थान है।
देवभूमि उत्तराखण्ड में ब्रह्मविद्या में पूर्णनिष्ठ श्री श्यामसुन्दर जी का विशेष स्थान है। वह रा.इ.काॅ. अल्मोड़ा में व्याख्याता थे। भगवान कृष्ण  ही उनके आराध्य थे। वह मुरादाबाद उत्तर प्रदेश के मूल निवासी थे। अल्मोड़ा में प्रसिद्ध व्यवसायी श्री मूलचन्द जी के यहाँ उनका आगमन होता था। मथुरा में भी उनका आवास था। उनके सत्संग में भक्तों की समस्याओं का निराकरण होता था। भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने पर भगवान ड्डष्ण को भोग ;फलद्ध अर्पित करने का आदेश दिया जाता था। स्वभाव से वह निर्मल और शान्त थे। ध्यान में वह समाधि अवस्था प्राप्त कर लिया करते थे। पूज्यच श्याम सुन्दर जी की भविष्यवाणी सत्यसिद्ध होती थी।
उत्तराखण्ड पूज्य मणीराम बाबाजी की कर्मस्थली रहा था। तिलकपुर डाॅ. बिन्दु के यहाँ उनका आवागमन होता थां एक अवसर पर उन्होंने भक्त श्री पूरनचन्द्र पाण्डेय से कहा था कि आज तुम इस गाड़ी से नैनीताल मत जाना। भक्त को वन विभाग के कार्य से पहली गाड़ी से जल्दी जाना था परन्तु महाराज ने उनसे मना कर दिया। वह कुछ विलम्ब के बाद दूसरी गाड़ी से गये। कालान्तर में उन्हें ज्ञात हुआ कि पहली गाड़ी आगे दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। इस प्रकार पूज्य महाराज ने भक्त के भावी संकट को टाल दिया था। श्री पूरन चन्द्र पाण्डेय अल्मोड़ा के विशिष्ट होली गायक थे।
देवभूमि उत्तराखण्ड में के.एम.ओ.यू. स्टेशन के पूज्य ब्रह्मानन्द सरस्वती अलौकिक योगी थे। उनके भक्तों में श्री बिहारीलाल साह की रघुनाथ मन्दिर के समीप दुकान थी। वह फल व सब्जी का व्यापार किया करते थें पूज्य महाराज उनकी दुकान में यदा कदा बैठा करते थे उस दिन उनकी बिक्री दुगुनी हो जाया करती थी। महाराज को वह गेठी, अरबी (गडेरी) की सब्जी तथा घी भेजा करते थे। अरबी पूज्य महाराज को बहुत प्रिय थी। आज उनकी देया दृष्टि से भक्त बिहारी लाल साह का परिवार सन्त भक्ति की ओर अग्रसर है।
देवभूमि अल्मोड़ा में पूज्य नानतिन बाबा के सन्यासी शिष्य तपेश्वरी महाराज का विशेष स्थान था। भक्तों के प्रति उनका आत्मिक प्रेम था। आँवलाघाट में गुरूपूर्णिमा के दिन वर्ष 2004 में उनकी अन्त्येष्टि की गई थी। अन्त्येष्टि के समय उनके पास 100 और 500 रूपये के लगभग 18-20 हजार रूपये थे। भक्तों पर किसी प्रकार का बोझ नहीं छोड़ गये। प्रति सोमवार को वह भण्डारा करवाया करते थे। इस अवसर पर उन्होंने अपने गुरूदेव की आरती को संक्षिप्त करने का आदेश दिया था। राजस्थान की भक्त मण्डली ने भक्ति और निष्ठा से उनकी सेवा की थी। पूज्य महाराज ने भक्तों को अतिथि सत्कार का पाठ सिखाया था।
इंजीनियर पाठक उन्हें किसी काम हेतु जब कुछ पैसे देने लगे थे तब इंजीनियर पाठक ने उनसे कहा था, ‘‘आपका आशीवार्द हमें प्राप्त होता रहे।’’ तब महाराज ने उनसे कहा,‘‘यह भी कोई कहने की बात है।’’ भक्तों को आशीष दैव कृपा से सर्वत्र सुलभ हो जाता है। भक्तगणों ने उनकी समाधि बेरीनाग पिथौरागढ़ में निर्मित की है। स्वामी जी बहुत अच्छे चित्रकार थे। उनके स्वभाव में मृदुता थी। वह पंजाब के रहने वाले थे। पूज्य नानतिन बाबा से उन्हें सन्यास की दीक्षा मिली थी। इंजीनियर पाठक हल्द्वानी के हल्दूचैड़ निवासी हैं। वर्तमान में सुभाषनगर हल्द्वानी में कार्यरत हैं। पूज्य तपेश्वरी महाराज ने दो वर्ष मानसरोवर में साधना की थी। अल्मोड़ा में मैसर्स प्रकाश स्टूडियो में भी उनका आगमन होता था। हल्द्वानी के श्री अवध कुमार जी उनके अनन्य शिष्य थे।
पूज्य नानतिन बाबा के अनन्य भक्त श्री जागनाथ उप्रेती (सा.नि.वि.) इन्दिरा नगर के आवास में पूज्य नानतिन बाबा का आगमन होता था। एक अवसर पर एडद्यो मन्दिर में पाण्डेखोला निवासी श्री गणेश दत्त पाण्डे के.एम.ओ.यू.लि॰ की पत्नी पूज्य नानतिन बाबा के भजन कीर्तन में भाविभोर हो गईं। लगभग 2 घण्टे तक चले भजन कीर्तन में ‘‘वृन्दावन धाम अपार ................’’ से सभी भक्त परमसत्ता का आभास कर रहे थे। इस अवसर पर पूज्य नानतिन बाबा अद्भुत ओज से पूर्ण थे। भक्त जगदीश लाल रेन्जर के अनुज की पत्नी को पूज्य नानतिन बाबा ने बागेश्वर कुकडामाई अपने चोगे को उठाकर साक्षात देदीप्यमान शिवलिंग के दर्शन कराये थे। वह इस छटा को देखकर विस्मित हो गईं। बाबाजी ने उनकी तरफ एक सेब का फल फेंक दिया तब वह अलौकिक छटा अदृश्य हो गई।
जाखनदेवी अल्मोड़ा के भक्त धनी लाल साह के पुत्र श्री जगदीश लाल साह स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया सन्तों के अनन्य भक्त हैं। उनके अनुसार सन्तों की कृपा से उनका आवासीय मकान कई मुकदमों के बाद रैंट कन्ट्रोल से स्वतः मुक्त हुआ। अल्मोड़ा से उनके रामनगर स्थानान्तरण में उनके वृद्ध पिता अश्रुविह्न हो गये परन्तु परमसन्त टाटम्बरी महाराज के आशीर्वाद से वह तीन साल के बाद पुनः अल्मोड़ा आकर माता पिता की सेवा में लग गये। पूज्य टाटम्बरी महाराज उनके आवास में भी आया करते थे। सन्त आशीष से उनकी धर्मपरायण पुत्री का अच्छी जगह विवाह हुआ। विदेश में वह कार्यरत है। दीन दुखियों की सेवा करना व धर्मपरायणता उनकी वृद्ध माता के गुण हैं। वह अभी भी धर्म साहित्य की रचनायें किया करती हैं।
श्री जगदीश लाल साह जी के आवास में एक बार एक साँप प्रवेश कर गया। दुमंजिले से उसे हटाकर सड़क में मार दिया गया। बाद में पूज्य टाटम्बरी महाराज ने कहा,‘‘यह सर्प मोक्ष प्राप्ति हेतु आपके निवास में आया था।’’ पूज्य महाराज ने काशीपुर (नैनीताल) तथा रामनगर सीतावनी में साधना की थी। रैंट कन्ट्रोल से उनके आवास को छुड़ाने के लिये स्वयं पेशकार उपस्थित हुए और एक माह का समय देकर मकान खाली करवा दिया गया। बम्बई से उनके पुत्र का स्थानान्तरण लखनऊ सन्त कृपा से सुलभ हो गया था। धन सम्पत्ति से पूर्ण होने पर उनकी पुत्री में परोपकार के गुण भरे हैं। कहा जाता है कि उनके आवास में जो सर्प आया था वह कोई औघड़ साधु का रूप था जो अपनी मुक्ति के लिये वहाँ पधारे थे। पूज्य नानतिन बाबा और पूज्य नीमकरौली महाराज के साथ भी उनका सम्पर्क रहा है।