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सन्त भक्तों के अनुभव भाग 2

सन्त भक्तों के अनुभव
हरिश्चन्द्र मिश्र-
रामगढ़ नैनीताल के ठा॰ प्रताप सिंह नानतिन बाबाजी के अनन्य भक्त थे। वह 1945 से बाबाजी के सम्पर्क में आये। अब उनका परिवार कुसुमखेड़ा हल्द्वानी में निवास करता है। उनकी पत्नी से बाबाजी ने कहा था जप निरन्तर करना चाहिये। मासिक धर्म के समय कंच की माला से जप करना चाहिये। बाबाजी ने श्री प्रताप सिंह जी से कहा था कि नये हैड़ाखान के बाबा पुराने हैड़ाखान बाबा के अवतार थे। वह दो वर्ष के लिये प्रकट हुए थे लेकिन भक्तों के प्रेमवश 12 वर्ष तक इस कूर्मांचल में रहे। श्री प्रताप सिंह के आवास में बाबाजी की उपस्थिति का प्रत्युत्तर घण्टा बजाकर दिया जाता था। घण्टे का जवाब घण्टे से देना आवश्यक था अन्यथा बाबाजी स्थान छोड़कर चले जाया करते थे। पूज्य हैड़ाखान बाबा की समाधि से पूर्व नानतिन बाबा ने भक्त प्रताप सिंह को अपने पास बुलाया और उनके साथ तीन दिन रहे। उन्होंने उनसे कहा कि बाबाजी की समाधि वहीं बनाना जहाँ तुम्हें मैंने इंगित किया है। ठा. प्रताप सिंह बिष्ट के आवास की जगह गहन अरण्य में थी। सम्पूर्ण भूमि जलयुक्त थी। उसी गहन अरण्य में एक गहरे गढ्ढे में पूज्य नानतिन बाबा साधना किया करते थे।
डा॰ प्रताप सिंह द्वारा कुसुमखेड़ा में निर्मित नानतिन बाबा के मन्दिर में दो कुटिया हैं। एक कुटिया में नानतिन बाबा रहते थे, दूसरी कुटिया में ठा॰ प्रताप सिंह जी स्वयं रहा करते थे। एक अवसर पर डा॰ प्रताप सिंह की कुटिया में बाबा हैड़ाखान आये थे। उस समय नानतिन बाबा अन्य भक्त के यहाँ विराजमान थे। एक वृद्ध  अपने पुत्र के उपचार हेतु उनके पास गई थी। बाबाजी ने उसके पुत्र के लिये कोई औषधि नहीं बतलाई। केवल इतना कहा कि भक्त प्रताप सिंह के यहाँ हैड़ाखान के बाबा आये हैं। वही तुम्हें औषधि बतलाकर बालक को स्वस्थ कर देंगे। आठ दिन तक औषधि सेवन करना। भक्त हैड़ाखान बाबा के पास गया। बाबा की औषधि से बालक तीन दिन में ही स्वस्थ हो गया। नानतिन बाबा ने भक्त प्रताप सिंह को अपने दिल्ली के मकान को बेचने का आदेश दिया। दिल्ली की अदालत में उनका मुकदमा चल रहा था। उनके जीवन को खतरा था। बाबाजी उन्हें अभय कवच प्रदान कर रहे थे। बाबाजी उनसे कहते थे कि अमुक मार्ग से अमुक दिशा से कोर्ट को जाना। इस सिलसिले में वकील विशेष को रखने का आदेश भी वकील का नाम बताकर देते थे। बाबाजी की कृपा  से भक्त प्रताप सिंह ने बिना कष्ट इस शरीर को त्याग दिया। वह अपनी शैय्या में लेटे ही मिले। उनकी पत्नी रामायण प्रेमी व अतिथि सत्कारक हैं। ठा॰ प्रताप सिंह जी द्वारा निर्मित कुटिया में पूज्य नानतिन बाबा द्वारा निर्मित एक कई फुट गहरा गढ्ढा है जिसमें वह साधना किया करते थे।
डा॰ प्रताप सिंह के परिवारजन बाबा हैड़ाखान के भी अनन्य भक्त रहे। ठा॰ प्रताप सिंह की पुत्री को बाल्यकाल में नानतिन बाबा की दाढ़ी और जटाओं से जुओं को मारने का अहोभाग्य भी प्राप्त हुआ।
एक अवसर पर भक्त प्रताप सिंह के आवास में पूज्य नानतिन बाबा विराजमान थे। उसी समय बाबा हैड़ाखान भी पधार गये। पूज्य नानतिन बाबा ने उन्हें दण्डवत् किया। इस पर भक्त प्रताप सिंह की पत्नी ने उनसे कहा कि आप इतने वृद्ध  होकर युवा साधु हैड़ाखान को दण्डवत् कर रहे हैं, बड़े आश्चर्य की बात है। बाबाजी ने मुस्कुराकर कहा ये युवा सन्त प्राचीन मुनीन्द्र महाराज के अवतार हैं, आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यद्यपि पूज्य नानतिन बाबा और पूज्य हैड़ाखान बाबा का आपस में किसी प्रकार का वार्तालाप नहीं हुआ था। भक्त प्रताप सिंह द्वारा नानतिन बाबा के मन्दिर में पूज्य नानतिन बाबा और हैड़ाखान बाबा की संगमरमर की मूर्तियाँ शोभित हैं। इस मन्दिर में पुजारी नियमित रूप से प्रातः तथा सायं आरती व पूजा किया करते हैं। श्री के.के. खेड़ा के अनुसार लोग मदिरापान कर समझते हैं कि अब हम राजा हो गये हैं। उन्हें धन, पद, मान, मर्यादा का अभियान रहता है। थलकेदार में अलौकिक शक्ति से उन्हें एकान्त में आरती व शंख स्वतः प्राप्त हो गये थे। हवनकुण्ड में देवगणों का उनसे साक्षात्कार हुआ। कुकडामाई में श्री के.के. खेड़ा के सहयोग से धर्मशाला का निर्माण भी हुआ। श्री के.के. खेड़ा के अनुसार योगी और राजा किसी का मित्र नहीं होता है। कुकडामाई में उन्होंने एक क्विंटल लकड़ी का हवन किया। लकड़ियाँ भीगी थीं परन्तु दैवीय ड्डपा से हवन कुण्ड में तीव्रता से प्रज्वलित हुई। हवनकुण्ड में साक्षात् कुकडामाई ने उन्हें दर्शन दिये। श्री के.के. खेड़ा को थलकेदार में ऐसी अनुभूति हुई कि जो ब्रह्म ने अव्यक्त रूप से व्यक्त रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन देकर ड्डतार्थ किया। श्री के.के. खेड़ा के अनुसार गीता ही जीवन का आधार है। गौरी उड्यार में उन्हें ब्रह्म के दर्शन हुए। उनके अनुसार मैं पूज्य नानतिन बाबा का भक्त नहीं वरन् गण हूँ। बाबाजी की कृपा  से उन्हें हौलेण्ड में खिलने वाले फूल की सुगन्ध की प्राप्ति ध्यान करते वक्त सुलभ हो गई थी। यह सुगन्ध उन्हें एक पत्ते को रगड़कर प्राप्त हुई।