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सन्त भक्तों के अनुभव भाग 3

सन्त भक्तों के अनुभव
हरिश्चन्द्र मिश्र-
पूज्य तपेश्वरी महाराज ने दो वर्ष मानसरोवर में साधना की थी। पूज्य नानतिन बाबा के अनन्य भक्त श्री के के खेड़ा गाजियाबाद के अनुसार पूज्य तपेश्वरी महाराज ने 18 साल तक पूज्य नानतिन बाबा के आदेश से अन्न त्याग कर साधना की थी। पूज्य तपेश्वरी महाराज ने गुरूपूर्णिमा 2004 के पावन दिन बेरीनाग पिथौरागड़ में महासमाधि ली थी एक अवसर पर श्री के के खेड़ा के मस्तिष्क में दो प्रश्न उठे। पहला प्रश्न था एकान्त में क्या होता है। इस प्रश्न का समाधान थलकेदार पिथौरागढ़ में हुआ। थलकेदार में उन्हें नागमणि के दर्शन हुए। एकान्त में उसकी चमक से इन्हें ईश्वरत्व की अनुभूति हुई। थल केदार में उन्हें नाग के दर्शन हुए जो छड़ी के रूप मे  था। रात्रि का अवसर था। एकान्त में वह ध्यान कर रहे थे। बाबाजी की ड्डपा से नागराज सुप्त अवस्था में थे और नागमणि की चमक दैवीय अनुभूति प्रदत्त कर गई। इस एकान्त में उन्हें अलौकिक आनन्द और शान्ति प्राप्त हुई। बागेश्वर कुकडामाई में श्री के के खेड़ा जी को साक्षात् देवी ने सिंह में सवार होकर दर्शन देकर कृतार्थ  किया। उनका दूसरा प्रश्न था कि जब कोई न था तब सृष्टि में क्या था। तब मैं भी नहीं था। ईश्वर की सत्ता का अनुभव उन्हें हुआ। पिथौरागढ़ के थलकेदार में उन्हें स्थितप्रज्ञ की अवस्था प्राप्त हुई।
साईंधाम अल्मोड़ा की महिमा अपार है। एक अवसर पर भक्त हरिश्चन्द्र जोशी अधिवक्ता के हृदय में  विचार उत्पन्न हुआ कि बाबा के दरबार में एक ढोलकी कीर्तन हेतु अर्पित की जाय। उसका मूल्य 800 रू. था। वह अल्मोड़ा में  सुलभ थी। कतिपय कारणों से यह संकल्प पूरा न हो सका। कालान्तर में उन्होंने देखा कि वह ढोलकी दरबार में स्वतः आ गई है। पूछने पर उन्हें विदित हुआ कि उक्त ढोलकी रानीखेत से कोई महिला मन्दिर में अर्पित कर गई थी। उस महिला को स्वप्न में बाबा ने दरबार में ढोलकी अर्पित करने का आदेश दिया था। ऐसे ही अभी मार्कण्डेय पुराण के अवसर पर उन्हें पण्डितजी ने प्रसाद हेतु दूध लेने के लिये बाजार भेजा। उनके लौटने से पूर्व ही वैसे ही दूध के दो पैकेट कोई सज्जन भेंट कर गये थे। श्री जोशी के साथ एक चमत्कारिक घटना इस प्रकार घटित हुई। अधिवक्ता अश्विनी कुमार तिवारी, डुबकिया, अल्मोड़ा के क्ण्ळण्ब्ण् बनने के बाद उनका भिकियासैंण जाने कार्यक्रम था। श्री हरिश्चन्द्र जोशी भी उनके साथ गये। एक मार्शल गाड़ी में दोनों अधिवक्ता रवाना हुए। गाड़ी नौसिखिये के हाथ में थी। कोसी के समीप उसने गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त कर दी। अधिवक्ता जोशी जी ने उसे रोकते हुए कहा क्या नये चालक हो? उसने झूठ बोलते हुए कहा कि,‘‘नहीं श्रीमान मैं तो पुराना चालक हूँ।’’ जोशी जी ने उससे कहा ‘‘अब मैं अगली सीट में बैठूँगा और अधिवक्ता तिवाड़ी जी को पीछे बैठने का आग्रह किया।’’ जोशी जी ने कहा,‘‘मैं गाड़ी चलाना सीखना चाहता हूँ।’’ चालक ने कहा,‘‘आप आगे बैठ जाइये मैं हफ्ते भर मेें आपको सिखा दूँगा।’’ कोसी से आगे चालक ने गाड़ी फिर दुर्घटनाग्रस्त कर दी। अब जोशी जी किसी अप्रत्याशित घटना के होने की प्रतीक्षा करने लगे। श्री बुबुधाम मजखाली रानीखेत पहुँचने पर गाड़ी 200 फुट नीचे चली गई। दोनों अधिवक्ता रक्तरंजित हो गये। ग्रामीणों की सहायता से उन्हें निकाला गया। चालक गाड़ी के नीचे दब गया। गाड़ी के परखचे उड़ गये थे। दोनों अधिवक्ता जोर-जोर से एक दूसरे की कुशल पूछने लगे। अधिवक्ता जोशी जी ने तिवारी जी की कुुशल पूछी। उन्हें उसी अवस्था में खाई में खोजने गये। साईं ड्डपा से दोनों का उपचार किया गया। चालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई परन्तु उसके गिड़गिड़ाने पर तथा माफी माँगने पर उसे छोड़कर एफआईआर रदद कर दी गयी। इस अवधि में दोनों अधिवक्ताओं ने विचार किया कि अब साईंधाम के निर्माण का संकल्प हम कैसे पूरा कर पायेंगे। शिरडी के साईं समर्थ ने दोनों अधिवक्ताओं के जीवन को सुरक्षा प्रदान कर दी। पूर्व में साईंधाम का श्री रघुवर दत्त पन्त, श्री अश्विनी कुमार तिवाड़ी तथा श्री हरिश्चन्द्र जोशी अधिवक्ता के द्वारा अस्थाई ट्रस्ट का निर्माण करवाया गया था। पूर्व में साईंधाम की भूमि के पास माइयों का मठ था। इस दुर्घटना से विदित होता है कि जो भक्त मेरी ओर श्रद्धा  और विश्वास से एक पग भी उठायेगा मैं उसकी रक्षा हेतु 100 पग उठाकर कभी भी कहीं भी उसे अभय कवच प्रदान करूँगा।