अपना शहर

सपनों का नगर-हल्द्वानी

हेमंत बिष्ट, खुर्पाताल -

हल्द्वानी को जब भी देखा, हल्द्वानी के विषय मंे जब भी सुना मुझे तो हल्द्वानी सपनों का ही नगर लगा। लोगों के सपनों का नगर भले ही दिल्ली, मुम्बई या बैंगलुरू होगा...... या फिर अमेरिका, इंग्लैण्ड, अरब के कोई नगर होंगे लेकिन मेरे सपनों का नगर तो हल्द्वानी ही रहा......... हमेशा, हमेशा ही।
बचपन में गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय, जाड़ों की छुट्टियों से पहले जब मास्साब कहते, ‘‘बच्चों! जाड़ों की छुट्टियों में कौन कहाँ जा रहा है?’’ कुछ ही भाग्यशाली बच्चों का उत्तर होता, ‘‘हल्द्वानी।’’ मास्साब पूछते, ‘‘किसके वहाँ?’’ तरह-तरह के उत्तर होते ‘‘जी बुआ के वहाँ’’, ‘‘जी मालाकोट’’, ‘‘जी दीदी के वहाँ’’ मन में आता कितने भाग्यशाली लोग हैं, यह लोग, जिनके रिश्तेदार हल्द्वानी में रहते हैं।
तब हल्द्वानी जाने का सबसे बड़ा मकसद होता, रेलगाड़ी देखना, क्योंकि शनिवार के दिन की हर बाल सभा में कोई न कोई बच्चा, यह गीत गाता ही गाता था।
हल्द्वानी का माला टुका, घूमि गेछ रेला
छाती का खपिर है गई, कलेजी को तेला।
गीत में छाती, खपिर, कलेजी, तेल से कुछ लेना देना नहीें था, ना मतलब ही समझ में आता था। मेरे काम की तो बस एक ही बात थी और वह थी रेलगाड़ी में घूमना और घूमती हुई रेलगाड़ी देखना, सबसे बड़ा सपना था।
बड़े हुए, हल्द्वानी भी देखी, रेल भी देखी, रेल का घूमना भी देखा, पर हाय रे हल्द्वानी! सपने दिखाती ही रही। कहीं मित्र के घर गए, रिश्तेदारी में गये, ससुराल गए, हर जगह एक ही सवाल होता ‘‘हल्द्वानी में प्लाट खरीदा या नहीं?’’ सौ मित्रों में से निरानबे का, चार-पाँच साले-सालियों में शत प्रतिशत का हल्द्वानी में प्लाट है ही है तो फिर मेरी नाकामयाबी पर सवाल उठेंगे ही और प्लाट खरीदने का सपना मुझे रूलाता ही रहा है। हर पहाड़ी का बड़ा सपना होता है, नौकरी पाना, शादी करना ............ उधार-पुधार करके या फिर जी0 पी0 एफ0 से लोन लेकर, हल्द्वानी में जमीन खरीदकर समाज में अपना एक स्थान बना लेना, हर पहाड़ी का सपना है तो फिर मेरा क्यों नहीं ..............।
हल्द्वानी, हल्द्वानी ही ठहरा हो, तभी तो भोटिया पड़ाव में भोटियों ने पड़ाव डाला, जिया रानी ने तपस्या की, जिया रानी के स्नान करते समय बहे हुए बाल को देखकर, गौला-गौला ही रूहेलों ने रानीबाग को दौड़ लगायी और पराजित हुए। (जनश्रुति).............. यहीं कुमाऊँ परिषद की बैठक हुई बेगार आन्दोलन से पहले और भी.............. तभी तो हल्द्वानी, हल्द्वानी ही ठैरा हो।
अहारे! कभी तो कुमाऊँनी कवि गौर्दा के सपनों में आता रहा होगा हल्द्वानी नगर .......... तभी तो कितना सुन्दर वर्णन किया है हल्द्वानी का उन्होंने, अपने सुन्दर आँखरों में
‘‘चार मैहणा हयूना दिनन में
क्ये भल मानी छ हो गुस्याणी
शौका का बाकरा देखणा में ऊनी
और देखीनी लामा लम्याणी।’’
और इन्ही पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए जन कवि गिर्दा ने लिखा-
‘‘भोटिया पड़ौ पन छोलदारी टांकि गे
गुन्जार है रै छ हो हल्द्वाणी।’’
तभी तो बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी, कलम कार, रचनाकार ......... पहाड़ों से उतर-उतर कर हल्द्वानी के हो गए। ........... ईजा-बाबू-आमा के किस्से कहानियों में हर साल पहाड़वासियों का माल भावर जाना, ............. चना, गट्टा, गुड़ लेकर लौटना ......... तब से अब तक हल्द्वानी का सपनों के नगर के रूप में होना बताता है।
सच पूछो तो आज भी हल्द्वानी मेरे लिए सपनों का ही नगर बन कर रह गया है। अचानक जमीनों के दाम चार-पाँच सालों में ही बीस-पच्चीस गुना बढ़ जाना विस्मयकारी सपना है ................ उच्च स्तरीय विद्यालयों का खुलना, कोचिंग संस्थानों का खुलना .......... सुखद सपना है ............. चेन स्नेचिंग ............... डम्परांे-गाडि़यों से दुर्घटनाएं, डरावना सपना है।................. वाह री हल्द्वानी। कितने- कितने, कैसे-कैसे सपने दिखाती रहेगी .....................।
ओ मेरे सपनों की नगरी हल्द्वानी!!
और अब सपनों की महानगरी हल्द्वानी !!!