विचार विमर्श

सरकारी स्कूलों के बच्चे-सरकारी योजनाओं के ब्राण्ड एम्बेस्डर

सरकारी स्कूलों के बच्चे-सरकारी योजनाओं के ब्राण्ड एम्बेस्डर
सुविधाओं का आंकलन करा जाए तो सरकारी स्कूलों में सिर्फ मिड-डे-मील और शौचालय ही केवल उपलब्ध हैं। पढ़ाई का पाठ्यक्रम आज भी वही चल रहा है जो 50 साल पहले था। शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। पढ़ाई के नाम पर बच्चों को जाड़ों में धूप सिकाई जा रही है और एक घंटे खेलने का समय दिया जा रहा है। शिक्षक भी अपने मुँह मेें रूमाल डालकर धूप सेकते हैं। तो अगर कहें कि उनका भविष्य अंधकारमय है तो कोई संकोच न होगा। नई सरकारी योजनाएं हर किसी के लिए होती हैं परन्तु सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए उनमें बहुत कम सोचा जाता है। परन्तु हर सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार छोटे-छोटे बच्चों द्वारा ही करवाया जाता है या यह कहे कि उन्हें हर योजना का ब्राण्ड एम्बेस्डर बना दिया जाता है। मीलों पैदल चलकर और जोर-जोर से नारे बुलवाकर पूरा दिन बच्चों को घुमाया जाता है और अंत में उसके एवज में उन्हें चाय और बन मक्खन का शानदार नाश्ता करवाया जाता है। क्या सरकारी स्कूलों के बच्चों का कोई भविष्य नहीं है? क्या उन्हें अच्छी पढ़ाई करने का कोई हक नहीं है? कम्प्यूटर विज्ञान और अंग्रेजी की विद्या प्राप्त करना उनकी किस्मत में नहीं है। क्यों उनके साथ ऐसा भेद भाव किया जाता है। अगर हम तुलना करें तो प्राइवेट स्कूल का कक्षा 4 का बच्चा वह सब जानता होगा जो सरकारी स्कूल का कक्षा 8 का बच्चा नहीं जानता होगा। बाँकी सब छोडि़ये जिन योजनाओं का प्रचार करने के लिए उन्हें मीलों पैदल चलाया जाता है उन्हें उस योजना के बारे में ही मालूम हो यह भी एक सोचने वाला प्रश्न है। आखिर ऐसा क्या गुनाह किया है सरकारी स्कूलों के बच्चों ने जो उन्हें इतनी हीन भावना से देखा जाता है। सरकार वैसे तो रोज दावे करती है कि हमारा आज आने वाला कल है। परन्तु ऐसी परिस्थतियों में आने वाला कल कैसा होगा कौन जाने। कभी पल्स पोलियो अभियान, कभी कुपोषण हेतु जागरूकता, कभी वोट देना सबका अधिकार और अन्य कई विज्ञापन। क्या सरकारी स्कूलों के बच्चों ने यही बीड़ा उठाने के लिए स्कूल में प्रवेश लिया है या उनके माता-पिता का ऐसा कोई सपना नहीं होगा कि उनका बच्चा भी बड़ा आदमी बने। ऐसे तो वह कुछ नहीं कर पाएगा और सरकारी स्कूल का बच्चा सदैव पिछड़ा ही रह जाएगा।