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सर्दियों के फलों का राजा ‘माल्टा’

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
सर्दियों के दौरान उत्तराखण्ड में बहुत ठंडा होता है, खासकर हिमालय क्षेत्र के ऊपरी इलाकों में जो बर्फ की चादर से ढके रहते हैं। जनवरी के महीने में हिमालय क्षेत्र के निचले इलाके जिसमें राज्य की भौगोलिक क्षेत्र का 51 प्रतिशत शामिल है, उनको भी मौसम की अनियमितता का सामना करना पड़ता है। लेकिन प्रति बहुत दयावान है। जलवायु की चरम सीमाओं का सामना करने के लिए प्रति ने इस क्षेत्र के लोगों को ‘सर्दियों के फल. माल्टा’ से नवाजा है। यह विटामिन-सी का एक बहुत अच्छा स्रोत है और आजकल गांव और स्थानीय बाजारों में भारी मात्रा में उपलब्ध है।
उत्तराखण्ड के चिकित्सा सेवा के पूर्व निदेशक, डाॅ अनिल शाह कहते हैं, माल्टा का रस सेहत के लिए बहुत पौष्टिक और हितकारी है और यह किसी भी समय पिया जा सकता है। सर्दियों में प्रतिदिन एक गिलास माल्टा का जूस पीने की सलाह दी जाती है। इस जूस के सेवन से चयापचय दर और कैलोरी जलाने की क्षमता बढ़ जाती है। माल्टा एक एंटीसेप्टिक, एंटीआॅक्सीडेंट, खुशबूदार और उत्तेजक फल है। औषध विज्ञान के अध्ययन के अनुसार माल्टा का रस गुर्दे की पथरी, उच्च कोलेस्ट्राॅल, उच्च रक्तचाप, प्रोस्टेट कैंसर और दिल के दौरे के इलाज के प्रयोग में लिया जाता है। माल्टा स्क्वैश भी बहुत लोकप्रिय है। इसमें 32.96 मिलीग्राम विटामिन-सी, कैल्शियम 8.60 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 43.91 ग्राम, विटामिन-ए 7.22 ग्राम, प्रोटीन 0.33 ग्राम प्रति 100 ग्राम रहता है। यह पेड़ उत्तराखण्ड में सबसे अधिक उगाया जाता है और सर्दियों के दौरान सीमांत किसानों के लिए अच्छी आय का उत्पादक है। यह हिमालय क्षेत्र का अनोखा पेड़ है। इसके फल, छिलके, रस व बीज के कई मेडिसिनल फायदे हैं। डाॅ॰ ललित रावत, उत्तराखण्ड चिकित्सा सेवा के संयुक्त निदेशक बताते हैं, इसके छिलके का इस्तेमाल भूख बढ़ाने, कफ को कम करने, खांसी-जुखाम, अपच और स्तन कैंसर के घाव को कम करने के लिए किया जाता है। यह एक टाॅनिक के रुप में भी प्रयोग में लिया जाता है। छिलके के पाउडर से तैयार किया गया पेस्ट त्वचा के लिए बहुत प्रभावशाली और गुणकारी होता है, इसके इस्तेमाल से त्वचा में चमक बढ़ती है। इसका नियमित उपयोग मुंह में झुर्रियां और त्वचा में पढ़ने वाली झाइयों को दूर करने के लिए किया जाता है। इसका पेस्ट बालों में लगाने से वह चमकदार और नरम बनते हैं। इसकी छाल से निकाला गया तेल शरीर को डिटाॅक्सिफाइ करता है और लसिका प्रणाली को बढ़ाता है। साथ ही साथ यह त्वचा में कोलेजन गठन का भी ख्याल रखता है।
माल्टा के बीज बहुत उपयोगी होते हैं और पौंध तैयार करने के इस्तेमाल में लिए जाते हैं। बीज और फली आहार सीने में दर्द और खांसी के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। बीज का इस्तेमाल मवेशियों को खिलाने और ऊर्वरकों के उत्पादन करने के प्रयोग में भी किया जाता है।
लेकिन दुर्भाग्यवश पहाड़ी इलाकों में किसानों को उनकी स्वयं की उपज बाजार में बेचने के लिए कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिलती। अंततः वह दलालों के शिकार हो जाते हैं। तिमला कफलती गांव के पवन कुमार का कहना है, बागवानी विभाग सफलतापूर्वक गांव की महिलाओं के विपणन सहकारी समितियों की स्थापना में अहम भूमिका निभा सकता है और उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है। सहयोगी के सभी सदस्यों को विपणन में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
माल्टा अपनी कई उपयोगों के कारण आय का एक अच्छा स्त्रोत हो सकता है। ग्रामीण महिलाओं को मुरब्बा, विभिन्न तरह के रस आदि तैयार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। अच्छे नेतृत्व और मार्गदर्शन के साथ अपने उत्पादों को एक ब्रांड नाम बनाया जा सकता है, हिमाचल प्रदेश के भूइरा गांव की तरह। इससे सतत विकास के लिए कई हितधारकों के नजरिए और क्षमता में वृद्धि होगी। सन 1991 में भूइरा में जैम, जैली आदि के उद्यम की शुरुआत लैनिट और उसके पति विनय मुशरान द्वारा गांव की महिलाओं की मदद से की गई थी। आज गांव की महिलाएं और सभी ग्रामीणों को अपने उत्पाद को एक बड़ा ब्रांड नाम बनता देख खुद पर गर्व है और फैब इन्डिया जैसी बड़ी ब्रांड द्वारा इसका भूइरा जैम के नाम से विपणन किया जा रहा है।