हमारे लेखक

सामिष-निरामिष के बहाने ..........

सामिष-निरामिष के बहाने ..........
राजेशखर पंत-
हम इंसानों का भोजन VEGETARIAN होना चहिये या फिर NON. VEGETARIAN इस पर बहस की जा सकती है, इस विवाद में पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से जोरदार तर्क दिए जा सकते हैं। दिए भी जाते हैं, स्थितियां शायद तब उलझ जाती हैं जब कोई भी पक्ष भोजन की आदतों के आधार पर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ ठहराने लगता है, छोटा-बड़ा, दयावान-निर्दयी, अच्छा या गन्दा बताने लगता है, अपवाद हो सकते हैं पर हर मांसाहारी निर्दयी हो यह जरूरी तो नहीं है, वैसे ही जैसे कि शाकाहरी भर हो जाना दयावान या फिर ज्यादा करुणामय हो जाने की गारंटी नहीं हो सकता, यूरोप, खासकर इंग्लैंड में, जहाँ मुझे कुछ समय रहने का मौका मिला था, मेरा अनुभव रहा है कि ज्यादातर लोगों के अन्दर, कम से कम आज के जमाने में, प्राणी मात्र के लिए फिर वह चाहे जंगली परिंदा हो या पालतू कुत्ता-बिल्ली-करुणा की भावना बहुत अधिक होती है, वहां के नामचीन शिकारी भी, चाहे वो कोर्बेट हो या एंडरसन, अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत दयावान रहे हैं और ये सब तब है जब कि वहां मांसाहार एक सामान्य सी चीज है, हमारे देश में जहाँ दया-करुणा की बातें आम हैं, सड़क के किनारे बैठे कुत्ते को लतियाना या बोझ से लदी गाड़ी को खींचने वाले झाग उगलते भैंसे को लगातार पिटते हुए देखना तो दरकिनार, ऐसे लोग भी मिल ही जाते हैं जिन्हें नव-विवाहिता को जलाने या नवजात बेटी को मार डालने में भी ज्यादा तकलीफ नहीं होती, कभी-कभी लगता है कि मांस खाने या न खाने से ज्यादा आपके चारों ओर का माहौल आपके अन्दर की दया-करुणा को ज्यादा कंडीशन करता है, पश्चिम में जानवरों को स्लाटर करने के तरीकों के पीछे यह सोच जरूर दिखाए देती है कि उन्हें तकलीफ कम से कम हो, स्लाटर की प्रक्रिया भी वहां एक नुमाइश नहीं बनती, इन चीजों का हमारे देश में कभी संज्ञान लिया जाता हो। कम से कम मेरा अनुभव ऐसा नहीं है, इस पृष्ठभूमि में गो-वध को ले कर मचा हुआ बवाल मुझे निहायत ही बेतुका और छिछली भावुकता को भुनाने का एक प्रायोजित षड्यंत्र सा लगता है, किसी की भोजन की आदतों को अच्छा या बुरा कहने का अधिकार किसने दिया है हमें, किसी जानवर को स्लाटर करने के तरीकों पर कोई बौ(िक बहस हो तो बात फिर भी समझ में आती है, समाज का एक वर्ग अगर गाय को पूजनीय मानता है तो एक अच्छी बात है, पर किसी को इसके लिया बाध्य करना कि वह भी ऐसा ही करे, कुछ अजीब सा लगता है, जोर- जबरदस्ती, मार-पीट, दंगा-फसाद की शुरुआत इसी तरह की बेतुकी कोशिशों से होती है और फिर सोशल मीडिया में बाढ़ आ जाती है निहायत ही भद्दी डराने वाली और अशोभनीय टिप्पणियों की, अपनी बात कहिये जरूर, पर उसे जबरदस्ती थोपिएं नहीं, दूसरे को भी उसका स्पेस सम्मान के साथ दीजिये, क्या हासिल होगा अगर हम खुद अपने समाज को बहुत से खांचों में बाँट देंगे, ऐसे खांचे जिनके आर-पार देखना भी नामुमकिन हो जाये।
राह चलते मुझे एक विजुअल मिला था। कैमरे में कैद कर लिया था उसे, यह चित्र हमारी प्राथमिकताओं की दिशाहीनता परए कम से कम मुझे तो एक सशक्त फुटनोट सा प्रतीत होता है।