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सार्थकता

सार्थकता
हेमंत बिष्ट, खुर्पाताल
मेरे घर में ,
एक हार्ड बोर्ड का,
टुकड़ा पड़ा है।
छोटा होता -
तो मेरी खिड़की के टूटे शीशे के,
स्थान पर होता
लेकिन वह बड़ा है।
इसीलिए आज तक
यूँ ही पड़ा है।
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टुकड़ा सोचता है। मेरा दुर्भाग्य...
कि कहाँ इस आदर्शवादी -
ईमानदार आदमी के घर पर पड़ा हूँ।
मेरे साथ ही का ही-
दूसरा टुकड़ा,
एक चर्चित कलाकार के घर गया,
उसमें अंकित चित्र कला से,
पूरे विश्व में चर्चित हो गया।
लेकिन मेरा दुर्भाग्य ! कि............।
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टुकड़ा कुछ भी सोचे .............
कि उसका दुरूपयोग हो रहा है।
लेकिन मेरे घर में-
उसका, बहुआयामी उपयोग हो रहा है।
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टुकड़ा कहता है-
कि इसकी बूढ़ी माँ,
अपने बूढे, झूर्रीदार हाथों से-
दालें पीस-पीस कर -
बडि़याँ बनाती है।
मुझमें सुखाती है
और अपने परिवार को खिलाती है।
इसका बूढा बाप-
बेटियों के ब्याह में,
लिये गये कर्ज की, किश्तों का हिसाब-
मुझमें लगाता-
मिटाता है।
इसकी अपंग बहन
मुझे ही बोर्ड बनाकर
बच्चों को, ट्यूशन पढाती है।
अपंग होने के बावजूद,
खुद्दारी से जीवन बिताती है।
मेरी देह पर -
इनके क्रियाकलापों के रंग - बिरंगे धब्बे बन गए हैं।
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एक दिन-
तंग आकर,
मैंने वह टुकड़ा फैंक दिया।
किसी कला के पारखी ने-
टुकड़ा देख लिया।
बोला, ‘वाह! यह तो माडर्न आर्ट है।’
मैंने कहा-
‘नहीं जानता, कला क्या बला है?’
‘जीवन की अनुभूतियों को -
ईमानदारी से व्यक्त करे
वही सच्ची कला है’, पारखी बोला।
मैंने कहा-
‘तब तो यह वास्तव में कला है-
इसमें, मेरी बूढी माँ के -
ममता के रंग रंजित हैं।
मेरी अपंग बहन की-
खुद्दारी की छाप अंकित है।
बेटियों के बूढे पिता की-
लाचारी के दाग अंकित हैं।’
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पहले तो टुकड़ा-
इन रंगों को देख, स्वयं रो गया,
फिर बोला-
‘‘मेरा जीवन सार्थक हो गया।
मैं धन्य हो गया।’’