युवा कलम

साहित्य और कला सौन्दर्य

मुकुल तिवारी, स्वतंत्र चित्रकार,
नैनीताल, उत्तराखण्ड
किसी भी कला का आधार उसमें सौन्दर्य बोध का प्रदर्शन होता है और सौन्दर्य हर किसी कलाकार को अवश्य ही पे्ररित करता है। आम जन भी इससे अछूता नहीं रह पाता, अर्थात् आम जन हो या कोई भी विधा का कलाकार ,जहाॅं उसे आनन्द प्राप्त होता है वहीं उसे सौन्दर्य की अनुभूति हो रही होती है। और उसी सौन्दर्य अनुभूति को कलाकार की संवेदना गहराई तक ले जाती है। क्योंकि कलाकार का हृदय गहराईयों में तैरने का, या सोचने का, अनुभूति करने का, रचना करने का होता है। साधारण आम आदमी की तरह वह ऊपरी सतह पर उक्त कार्य करने का आदी नहीं होता। ना ही उसे यह पसंद होता है।
सौन्दर्य से मानव प्राचीन काल से ही प्रभावित रहा है। किसी भी चित्र में सौन्दर्य के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करने में कलाकार अपनी पूर्ण रचनात्मकता और अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता रहा है। परन्तु भारतीय चित्रों में अधिकांशतः चित्रण देखकर लगता है कि वह भारतीय साहित्य से भी प्रेरित रहे हंै। और यह सत्य भी है कि भारतीय साहित्य में सदैव ही प्रकृति का बहुत ही सुन्दर और मनमोहक वर्णन किया गया है। जिससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि साहित्य का योगदान भारतीय चित्रकला के लिए अविस्मरणीय है।
तितली को देखकर पकड़ने दौड़ते हैं। लेकिन छिपकली को देखकर फौरन नज़र घुमा लेते हैं, है ना ! गुलाब के फूल को तोड़कर सीने से लगा लेते हैं, प्यारे नन्हे से बिल्ली के बच्चे को गोद में उठाकर पुचकारने लगते हैं लेकिन मेंढक की शक्ल देखते क्यों नाक-मुँह सिकोड़ने लगते हैं, सोचा आपने कभी ? अगर नहीं, तो अब सोचिये। व्यवहारिक रूप से सौन्दर्य-शास्त्र ‘एस्थेटिक्स‘ का उद्घाटन यहीं से शुरू हो जाता है। सौन्दर्य में प्रबल आकर्षण होता है, कुरूपता में विकर्षण ! ऐसा क्यों ? क्योंकि प्रकृति में वैषम्य है, सब कुछ द्वंद्व में है, कुरूपता भरी पड़ी है, इसलिए सौन्दर्य की कदर है, स्तुति-वन्दना है। सौन्दर्य का अस्तित्व ही हरगिज न होता यदि संसार में साथ-साथ कुरूपता न दिखती। दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का सह अस्तित्व ही हमें उनके निजस्व के प्रति जागरूक बनाता है।
सत्य है कि सौन्दर्य आकर्षण ही हमें लालायित करता है कि उसे भोगें, अपने मन और मस्तिष्क के माध्यम से इस परिप्रेक्ष्य में यह उचित प्रतीत होता है कि कोई भी कला में कलाकार अपनी सूक्ष्म दृष्टि व रचनात्मकता से किसी भी विषय में जब अपने भाव प्रदर्शित करता है तो सौन्दर्य बोध का विशेष ध्यान रखता है चाहे वह विषय सुखःद हो अथवा दुखःद।
डाॅ0 गिर्राज किशोर अग्रवाल ने सौंदर्य के चार सि(ान्त को खण्डों में विभाजित कर उस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। 1-यूरोपीय सौन्दर्य सि(ान्त, 2-इस्लामी कला सि(ान्त, 3-चीनी सौंदर्य सि(ान्त, 4-भारतीय सौंदर्य सि(ान्त। भारतीय परम्परा में इसका एक स्वरूप ‘रसशास्त्र’ अन्य देशों से पूर्णतः भिन्न, मौलिक और अद्वितीय है। कला में सुन्दर असुन्दर, अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी आदि का विचार चीनी तथा इस्लामी परम्पराओं में भी किया गया है।
भारत में सौन्दर्य के प्रति प्राचीन काल से ही आकर्षण रहा है। वैदिक युग के )षियों ने प्रकृति में असीम सौन्दर्य की झलक देखी और उसके प्रति अनेक उद्गार प्रकट किए हैं ;फिर भी सौन्दर्य सम्बन्धी शास्त्र के अन्तर्गत ही हुआ है और काव्येतर कला, उसी को स्वीकार करती रही हैं, विष्णुधर्माेत्तर पुराण के चित्रसूत्र में वे ही नव चित्र-रस माने गए हैं जो काव्य में प्रयुक्त होते हैं। इसका प्रधान कारण यही है कि शास्त्रीय दृष्टि से कलाओं में भाव-सौन्दर्य का ही अधिक विचार हुआ है और भावों की कलागत मान्यता काव्य तथा अन्य कलाओं में एक समान रही है। साहित्य में सौन्दर्य की जो चर्चा हुई है उसी को चित्रकला में यथावत् ग्रहण कर लिया है।
प्रागैतिहासिक चित्रों के विषय में अनेक विद्वानों की यह धारणा रही है कि उनमें उपयोगिता, अभिचारपरकता, अतिविश्वास आदि की भावनाएं प्रमुख रही है ;सौंदर्य-मूलक दृष्टि से उनकी रचना नहीं की गयी। किन्तु यह मत नितान्त भ्रामक है। सभी देशों की आदिम एवं प्रागैतिहासिक कलाड्डतियों को देखकर यह निर्विवाद रूप में कहा जा सकता है कि इस कला में भी सौन्दर्य-भावना है।
कला में सौन्दर्य के दृष्टिकोण से नारी व प्रड्डति दोनों को ही कलाकारों ने अनेकानेक बार अभिव्यक्त किया है। कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् में मानव-सौन्दर्य और प्रकृति सौन्दर्य के बड़े चित्ताकर्षक वर्णन प्रस्तुत किये हैं। मानव सौन्दर्य के अन्तर्गत शकुन्तला का सौन्दर्य वर्णन अभूतपूर्व है।
इतना निश्चित है कि चित्रविद्या की सृष्टि मानवता के सौख्य एवं भावनात्मक सौन्दर्य का कारण सि( हुई। उससे संसार में क्रूरता तथा निर्ममता की जगह समता तथा सहृदयता की स्थापना हुई। उसने मनष्ुय में अनुरागप्रियता और सौन्दर्य-जिज्ञासा का विकास किया। व्यष्टि और समष्टि की कल्याणमंगल कामना में चित्रविद्या का योग सदैव बना रहा। इसीलिए परम्परा से उसका आदर-सम्मान और संपूजन होता रहा।
भारतीय साहित्य में काव्य तथा कलाओं को एक ही धरातल प्रतिष्ठित करने की चष्ेटा भी की गयी है। ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जहाॅं साहित्य और कलाओं को साथ-साथ स्मरण किया गया है। भर्तृहरि ने साहित्य, संगीत तथा कला विहीन मनुष्य को पशु माना है। भरत ने नाटककार के हेतु समस्त शिल्पों, कलाओं तथा विद्याओं का ज्ञान आवश्यक माना है। जयदेव ने रस को कला तथा काव्य दोनों में अनिवार्य माना है। वामन ने कला और काव्य की समान रीतियों का उल्लेख किया है। चित्रसूत्र में साहित्य के ही नव रस कलाओं में व्यवहार्य माने गये हैं।
कवि कालीदास ने प्रड्डति प्रेम और उसके सौन्दर्य को जिस तरह प्रस्तुत किया वह विश्व प्रसि( है। उनके इस सौन्दर्य से प्रभावित होकर कलाकारों ने साहित्य से प्रेरणा लेकर या उसको आधार बनाकर कलाड्डतियों का निर्माण किया। अतः कहा जा सकता है कि कला और उसके सौन्दर्य को निखारने में साहित्य का बहुत योगदान है। भारतीय कला में सत्यं, शिवं और सुन्दरं की महती भावना ओतप्रोत है। उसके आधार सत्यमय, परिणाम शिवमय और स्वरूप सौन्दर्यमय है। इसी शाश्वत चित्व को लेकर भारतीय चित्रकला का विकास-विस्तार हुआ।
प्राड्डतिक सौंदर्य और कलात्मक सौंदर्य दोनों का ही सम्बन्ध हमारी ज्ञानेन्द्रियों से है और दोनों प्रकार का सौंदर्य हमारी कल्पना को जगाता है, तथापि कलात्मक सौंदर्य की प्राप्ति हेतु हम जो प्रयत्न करते हैं वह पुनः सृष्टि-मूलक होता है अर्थात् प्रड्डति द्वारा सृष्टि की हुई वस्तुओं से ही कलात्मक रूपों की पुनः सृष्टि करते हैं।
वेदों और उपनिषदों की अपेक्षा पुराणों में चित्रकला के सम्बन्ध में अधिक गंभीर और नये ढंग से कार्य हुआ। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में पुराण ही ऐसे ग्रन्थ हैं, जिनमें स्वतंत्र रूप और विस्तार से कलाओं एवं विशेष रूप से स्थापत्य और चित्रकला के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डाला गया। पुराणों की इस प्रामाणिक और विपुल सामग्री के आधार पर ग्रन्थकारों ने अनेक विषय के ग्रन्थों में कला के महत्व पर प्रकाश डाला।
कवि का क्षेत्र चित्रकार की अपेक्षा व्यापक हो सकता है। चित्रकार की अपनी सीमाएं होती हैं। चित्रकला में कथा-वस्तु की कुछ निश्चित सीमाएं होती हैं। परन्तु काव्य की कथा-वस्तु का को ई अन्त अंत नहीं। इसके विपरीत कई अर्थों में चित्रकार की स्थिति कवि से बढ़कर है।
अधिकांश चित्रकारों ने पौराणिक, धार्मिक, साहित्यिक ग्रन्थ रामायण, महाभारत, वेद, पुराण, समस्त साहित्यिक काव्य ग्रन्थ, गद्य, आदि.... चाहे जो भी हों उनसे, उनके काव्य सौन्दर्य और समाज में उनके आदर व प्रेम तथा ख्याति से प्रभावित होकर उन पर आधारित चित्रों को अवश्य ही बनाया। इससे स्पष्ट होता है कि साहित्य और कला दोनों आपस में एक दूसरे के सौन्दर्य से प्रेरणा लेते रहे और अपनाते भी रहे। जिससे चित्रकला को तत्कालीन समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती रही और आज भी वर्तमान में जो साहित्य सौन्दर्य से परिपूर्ण प्रतीत होता है उससे चित्रकार या कोई भी कलाकार अछूता नहीं रह पाता है।