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सीज़न नही देख पाने का मलाल नहीं

‘सीज़न’ नही देख पाने का मलाल नहीं
प्रो. मधु जोशी, नैनीताल
सुना इस बार नैनीताल में अभूतपूर्व ‘सीज़न’ हुआ। नैनीताल में होने के बावजूद मैं इस ‘सीजन’ को नहीें देख पायी। शीतकालीन मुम्बई प्रवास से वापिस आते समय मैं चिकुनगुनिया के वायरस को भी अपने साथ ले आयी। अपने इस वफ़ादार साथी के कारण, जिसने पिछले कुछ महीनों से मेरा साथ एक पल के लिए भी नहीं छोड़ा है, मेरे घूमने-फिरने पर फिलहाल लगाम लग गयी है। इसलिए मैं इस बार के ‘सीज़न’ को नहीं देख पायी। लेकिन इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है।
अपने ‘रूम विद अ व्यू’ की खिड़की से हल्द्वानी रोड पर रेंगती गाड़ियों को देखकर मैं अन्दाज़ लगा लेती हूँ कि शहर में कितनी भीड़ हो रही होगी। शहर में दाखिल होने वाली छोटी-मंझली-बड़ी गाड़ियों को देखकर यह विचार भी मन में उपजता है कि आखिरकार यह वाहन शहर में खड़े कहाँ होंगे, इनमें बैठे लोग रहेंगे कहाँ और इन सभी के लिए यह छोटा सा कटोरानुमा शहर मूलभूत सुविधाएँ कहाँ से जुटाएगा। ऐसे ही कई सवाल प्रतिदिन स्थानीय समाचार पत्रों में छपते रहते हैं। कोई समाचार माल रोड में कन्धे से कन्धे छीलती भीड़ पर केन्द्रित है तो कोई होटलों के आसमान छूते किराय®ं के कारण पर्यटकों को होने वाली असुविधा का अफ़़़साना सुना रहा है। अपने फ्लैट के सामने स्थित होटल में पर्यटकों और टैक्सी चालकों की अनवरत रेलमपेल को देखकर अहसास होता है कि (नैनीताल के स्थानीय लोगों की भाषा में) ‘इस बार बम्पर सीज़न पीक पर है’। दशकों पुरानी, आँख¨ं-देखी तो नहीं किन्तु कानों-सुनी प्रथा भी याद आती है जब पर्यटकों को काठगोदाम के पास बोर्ड लगाकर सूचित कर दिया जाता था कि नैनीताल ‘फुल’ है और अब वहाँ पर्यटकों के लिए जगह नहीं
है। और फिर हमारी सिमटती- सिकुड़ती झील भी तो है। दशकों तक हमारी ज्यादती सहने के उपरान्त अन्ततः यह बेचारी लाचार होकर मरणासन्न हो गयी है और हम नाशुक्रगुज़ार और स्वार्थी लोग हैं कि अपनी जीवनदायिनी की इस दुर्दशा पर सोशल मीडिया पर इसकी विभिन्न कोणों से खींची फोटो डालकर और दुःख अथवा रोष प्रदर्शित करके, नुक्कड़ों और चैराहों पर अपनी राय व्यक्त करके, सभा-सेमिनार करके तथा जुलूस निकालकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। गुस्ताखी के लिए अग्रिम माफी चाहूँगी लेकिन ऐसे प्रयासों को देखकर कुछ यँू लगता है कि जैसे मृत्यु-शय्या पर लेटे किसी निढाल रोगी की विशेषज्ञ चिकित्सकों से शल्य-चिकित्सा कराने और गहन चिकित्सा कक्ष में सेवा सुश्रुशा करने के स्थान पर अस्पताल का वाॅर्ड-बाॅय उसे बोरोलीन और बैण्ड-एड थमा कर कहे कि आवश्यकता पड़ने पर लगा लेना।
ऊबड़-खाबड़ मैदान और टापुओं में तब्दील होती जा रही झील की स्थिति से द्रवित होकर स्थानीय नागरिकों और कुछ पर्यटकों ने नंगे पैर माल रोड पर मार्च भी किया। इसमें शामिल भद्रजनों की नेक-नीयत तथा प्रतिबद्धता पर किसी भी रूप में अंगुली उठाने की न तो मेरी मंशा है और न ही मेरी योग्यता। फिर भी यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ कि नैनी झील अब ऐसी स्थिति में पहुँच चुकी है कि महज़ चिंता, आक्रोश अथवा एकजुटता प्रकट करना सागर से मात्र एक गागर पानी निकालकर उसे खाली करने के प्रयास सरीखा लगने लगा है। सीमित गतिशीतला के कारण न तो मैं इस ‘बैयर-फुट मार्च’ को देख पायी और न ही इसमें शामिल हो पायी लेकिन इस बात का मुझे कोई मलाल नहीं है। हाँ, इस जुलूस के अगले दिन एक धार्मिक-सामाजिक संगठन द्वारा श्रमदान करके झील से मलवा निकालने की जानकारी मिली तो मन में यह विचार स्वतः ही कौंध उठा, ”काश, मैं भी इसमें शामिल होने की स्थिति में होती।’’
फिलहाल, मानसून के आगमन के साथ और मैदानी इलाकों में स्कूल-काॅलेज खुलने के कारण पर्यटकों की भीड़ में कुछ कमी आयी है। मेरी खिड़की से दिखने वाली, शहर को रौंदने को आतुर गाड़ियों की संख्या भी कुछ घटी हुई लग रही है। इधर हम शहरवासियों द्वारा अपनी बड़ी-बड़ी टंकियों में भरपूर जल संचय करना, अपने फूल-पौधों को लबालब सींचना, अपने बरामदों और गाड़ियों को पाइप लगाकर रगड़-रगड़ कर धोना, वाॅशिंग मशीनों और डिश वाॅशरों से स्वच्छ भारत अभियान में योगदान देना और शहर के प्रत्येक नाले और खुले स्थान (वैसे यह इस शहर में कम ही बचे हंैं) को कूड़े-करकट से सुसज्जित करना बदस्तूर जारी है।
कभी-कभार मेरे मन में यह ख्याल तो आता है कि अब कैमैल्स बैक के रास्ते मंे काफी घास उग आयी होगी किन्तु टिफिन टाॅप से लैण्ड्स ऐण्ड जाने वाले मार्ग की मिट्टी मानसून पूर्व की वर्षा के कारण बैठ गयी होगी। और, हाँ, झूठ नहीं बोलूँगी, बादलों के साये में चीना पीक न जा पाने का अफ़सोस भी यदा-कदा, मेरे भरसक प्रयासों के बावजूद, मन में चोर दरवाजे से घुस ही जाता है। लेकिन मैं इतनी निर्मोही हूँ कि ‘सीज़न’ को नहीं देख पाने का मलाल मुझे एक बार भी नहीं हुआ है।