हमारे लेखक

सुनता ही रहता हूँ ............................

हेमन्त बिष्ट, खुर्पाताल -
‘‘आधी शताब्दी से अधिक समय हो गया है, हर बदलाव को मैंने देखा है। अच्छे और बुरे, उपयोगी और अनुपयोगी, वांछित और अवांछित ...। लेकिन अब तो आदत जैसी बन गई है तुम क्या कहोगे पौप? तुम तो मेरे सामने कल के ठहरे ...’’ ‘‘लेकिन लम्बाई में तो आपसे बड़ा हूँ मैं। दूर-दूर तक हर गतिविधि को देख सकता हूँ मैं। मिस्टर ऐस्कुलस! कल के ठहरे ... कल के ठहरे मत कहना आप’’ पौप ने कहा। ‘‘अरे सुनो ...! पौप ...।’’ एक्कुलस पौप को आवाज देता रह गया लेकिन पौप ने कह दिया, ‘‘फिर बात करते हैं, बैण्ड हाउस में बैण्ड वादन शुरू हो गया है।’’
‘‘अरे आज क्या बैण्ड वादन होता है, बैण्ड वादन तो होता था कैप्टन राम सिंह के जमाने में। कदम-कदम बढ़ाए जा ... या फिर नैनीतालो...नैनीतालो...। नैनीताल की दिनचर्या में शामिल था बैण्डवादन ... लोग बन-ठन कर आते और ठुमके भी लगा लिया करते... तल्लीताल के सरदारजी फिक्सर लगाकर, मूँछ खड़ी करके क्या नाचते थे...!’’ लेकिन मिस्टर ऐस्कूलस कैप्टन राम सिंह हमेशा के लिए तो रहते नहीं ... नई शुरूआत हो रही है तो उसका भी तो स्वागत होना ही चाहिए। ‘‘ठीक कहते हो तुम’’... बैण्डवादन प्रारम्भ हो चुका है।
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आज तेज हवाओं के झौंके चलने लगे हैं तेज हवा के झौंकों में झूलने लगा है पौप ... प्राणों का संकट ‘‘... क्या-ऽ-ऽ! ये विदेशी भी ... जान के लाले पड़ गए हैं ... हम ही हैं जो, कई दशकों से जमे हुए हैं। कुछ आदमी टहलते हुए मेरे समीप आ गए हैं, मेरे पास आकर रैलिंग में बैठ गए हैं।आज ठण्ड है। एक परिवार मेरे समीप पहुँच गया है। ‘‘अरे ! मिसेज एक्स आप यहाँ? हाउ स्वीट! हाउ ब्यूटीफुल?’’ मिसेज एक्स चकित होकर पूछने लगी। ‘‘योर जैकेट ...।’’ ‘‘ओ-ऽ-ब्रदर लण्डन में है ना, उसी ने भेजा है। मैंने गर्व से पौप की ओर देखा।’’ कितने संभ्रांत लोग बैठते हैं मेरे समीप ‘‘सांकेतिक भाषा में बातचीत’’ मुस्कराता हुआ बोला, ‘‘मेरे पास की खाट से ही खरीदी है इसने यह जैकेट, आई मीन फुटपाथ की खाट वाली ... हाँक रही है लण्डन और अमेरिका की। मैं कई दिनों से इसे नोटिस कर रहा हूँ।’’
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आज कुछ काॅलेज स्टूडैण्टस आए हैं, एक ने बढि़या जैकेट पहनी है ... दोस्त पूछ रहे हैं, ‘‘बता ! कहाँ से ली...?’’ युवक बता रहा है, ‘‘शो रूम से।’’ सभी कहने लगे हैं ‘‘हट ! फुटपाथ की खाट से खरीदी है ... सीधे क्यों नहीं कहता खाटमाण्डो से लाया हूँ ...’’ ‘‘नहीं ! बाई गाॅड, शो रूम की है।’’ ‘‘हठ ... झूठ मत बोल’’ ... कोई मानने को तैयार नहीं? ... मिसेज एक्स की याद आ गयी है, और याद आ रहा है गीता सार। ‘जो है वो नहीं है ... जो नहीं है वो है ...।’
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आप शरदोत्सव का मंच सजा है ... शाम हो चुकी है। ‘‘सुन ! और दिनों तू बैण्ड हाउस के समीप होने का रूआब दिखाता है, आज देख ! तू तो बस जेनरेटर, टैण्ट का सामान देखता रह, कार्यक्रम का आनन्द मैं ही लेता रहूँगा। जानता है? पहले इस कार्यक्रम का नाम वीकस और मीट्स हुआ करता था, शरदोत्सव नाम नामित होने के बाद सभी कार्यक्रम मैंने देखे हैं यहीं पर, मेरे समीप बैठकर संस्कृति प्रेमी, हर बरस आयोजन की समालोचना करते हैं।...’’ उस साल तमाम स्टार बुलाए गए, भारी भीड़ रही... यहीं पर बैठकर लोग बात कर रहे थे, ‘‘पहाड़ के कलाकारों को ये लोग सम्मान नहीं देते, इनको रूपया देने में इनके हाथ नहीं खुलते... कोई कम्पनियाँ इन्हें प्रायोजित नहीं करतीं...’’ दूसरे साल, आयोजकों ने उत्सव, केवल कुमाऊँनी-गढ़वाली संस्कृति को समर्पित कर दिया तो वही संस्ड्डति प्रेमी यहीं बैठकर बातें कर रहे थे, ‘‘यार हद हो गई ... बस हर ग्रुप वही गीत लेकर आ जाता है, वही गीत वहीं नाच ... कुछ नया देखने को नहीं मिला ... बोर हो गए इस साल ...’’ पण्डाल खाली-खाली रहा।
एक साल प्रख्यात नर्तक पं0 बिरजू महाराज, नलिनी कमलिनी सरीखे लब्ध प्रतिष्ठित कलाकर आए तो पण्डाल पर दर्शकों का अकाल रहा, अगले साल गायिकाएं बुलवाई गईं तो कुर्सियाँ टूटी, नृत्यांगनाओं की अभद्र पोशाकों पर कठोर टिप्पणियाँ हुई।
इस साल आयोजक भाषणों में कह रहे थे कि सरकारी अनुदान में मिले रूपयों से हम स्थानीय कलाकारों, पर्वतीय सस्कृति के कार्यक्रमों में खर्च करते हैं और स्टार नाईट प्रायोजित करते हैं बड़े-बड़े बिजनेस हाउस। तो दूसरा पक्ष भाषण दे रहा था,‘‘तो हमारे कलाकारों को ये कम्पनियाँ प्रायोजित क्यों नहीं करतीं। अब इन कम्पनियों को कौन समझाए ...’’ तीसरा पक्ष बोलता है...। इन्हीं आलोचनाओं - समालोचनाओं के बीच कार्यक्रम सम्पन्न हो जाते हैं। यह तो इस धरती का ही प्रताप है कि हर बरस कार्यक्रम कुशलता से निर्विघ्न सम्पन्न हो जाते हैं।
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सुबह - सुबह प्रक्टिस करके खिलाड़ी मेरे समीप रैलिंग में बैठ गए हैं ..... चाय पी रहे हैं..... एक बोलता है, ‘‘यार .... इस मैदान को खेल विभाग को देने की बात चल रही है, कह रहे हैं कि यहाँ कोच बैठेंगे ... कोचिंग करेंगे ....।’’ दूसरा टोकता है, ‘‘क्या बात करता है यार! यह संस्था स्थानीय लोगों के पास है तो मैन्टेन है, दखलन्दाजी नहीं है ... इसके प्रति मन में प्रेम है, अपनापन है ... साफ सफाई है ... साल भर गुलजार रहता है खेल गतिविधियों से ...।’’ सरकारी आदमी का क्या है? बेचारा आज यहाँ है तो कल कहाँ... कुछ सोचा करने को, तो ट्रान्सफर... मुश्किल से एक दो आयोजन हो पाएंगे साल में ... जबकि हमारी आँखों की खुराक है सालभर स्पोर्ट्स देखना ..।
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कल कई कलाकार किस्म के लोग मेरे पास रैलिंग में बैठकर फलां-फलां कलाकार की आलोचना कर रहे थे ... कल जिसकी आलोचना हो रही थी आज वह उन्हीं के साथ बैठकर किसी और की आलोचना कर रहा है। कल को शायद ... कई-कई आलोचक यहाँ बैठकर आलोचना समालोचना करते हैं, पालिका की आलोचना... डी॰एस॰ए॰ की आलोचना विद्यालयों की आलोचना, पर्यावरण की आलोचना, पर्यावरणविदों की आलोचना, नवीनता की आलोचना, प्राचीनता की आलोचना ... आलोचनाओं की आलोचना ... सुनता ही रहता हूँ।
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मिस्टर एस्कूलस अब तो बहुत बोल गए हो आप? कुछ मैं भी बोलू? ‘‘हाँ क्या कहते हो पौप?’’ मैंने तो हाल ही में अपनी समीप प्रीति झिंग्यानी, प्रीति जिंटा ... मौसमी चटर्जी ... और ... बात काटते हए एस्कूलस बोला, ‘‘तुम इसमें मुग्ध हो ठीक है, लेकिन जानते हो? प्रख्यात घुमंतू लेखक राहुल सांकृत्यायन मेरे समीप बैठेकर घंटों चिन्तन करते तो मुझमें भी ऊर्जा आती.... राजनीतिज्ञ सी0 बी0 गुप्ता भी मेरे समीप आकर घंटों बैठते ... और ... अच्छा और बताता हूँ हाँ, यहाँ कुछ लोग और बैठ गए हैं लेकिन ये लोग तो ...’’
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मेरे पास रैलिंग में बैठकर चाय पी जा रही है। गिलासों में बची हुई चाय मेरी ओर फैंक दी जा रही है। आलोचक किसी बात में मत भिन्न हो गए हैं ...... एक ने आवेश में आकर गरम चाय मेरे ऊपर फैंक दी है ...... मैं जल गया हूँ। दर्द से चीखने लगा हूँ .... मेरे ऊपर चाय गिर चुकी है। पत्नी घबराई हुई खड़ी है। इतने हाथ पैर मार रहे हो ........ चाय गिरा ली है अपने ऊपर। अरे ये पौप कौन है जिससे नींद में बातें कर रहे हो .............?
मैं सकपका कर बैठ चुका हूँ -‘‘अरे सपनों में, मैं एस्कूलस अर्थात् पांगर का पेड़ बन गया था, खड़ा था रिक्शा स्टैण्ड फव्वारे के नजदीक रैलिंग के पास ....... और बात कर रहा था बैण्ड हाउस के सामने खड़े लम्बे पौपुलस के पेड़ पौप से। पत्नी मेरा जले हुए हाथ से गिरी हुई चाय पोछते हुए खिलखिला पड़ी’’, अभी तो पांगर के ही पेड़ बने हो, ये ही हाल रहे तो न जाने आगे ........।