युवा कलम

स्त्री .......... हार नहीं जीत हूँ मैं

स्त्री .......... हार नहीं जीत हूँ मैं
यशोदा बिष्ट, जलालगाँव, नैनीताल
स्त्री हूँ मैं, स्वाभिमान व आत्मसम्मान से भरा है मेरा जीवन। शक्ति व धैर्य का दूसरा रूप हूँ मैं। आज (8 मार्च) मेरे लिए अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है क्योंकि जीवन का भण्डारा हूँ मैं। मुझे धरती कहते हैं क्योंकि गुणों व विकृतियों को धारण किया है मैंने। मैं प्रड्डति हूँ क्योंकि बदलाव व नयापन है मुझमें। मैं धूप लाती हूँ तो छाँव भी देती हूँ। दिन का काम हूँ तो रात का आराम भी हूँ। मैं शान्त हूँ और अपनी गरिमा का भी ध्यान है मुझे। माँ बनकर प्रकृति को निरन्तरता भी मैं ही देती हूँ किसी की विरासत नहीं हूँ मैं। मेरा अपना अस्तित्व है और स्वाभिमान भी। आज जो लोग मेरी भूमिका को लेकर बातें करते हैं, मुझे कमजोर समझते हैं शायद उन्हें मेरे होने का कारण नहीं पता। मैं संघर्ष की साक्षात् मूर्ती हूँ। दुर्गा, चण्डी या काली भी हूँ मैं, उनके लिए जिनकी आँखों में चुभती हूँ। समाज..... क्या दिया इस समाज ने मुझे ‘‘अबला’’ होने का ताज? क्यांे? क्या जीवन को जन्म देने वाली स्वयं अपनी शक्ति को नहीं जानती? जिम्मेदारी, सीमा, संस्कार, गृहस्थी और भी ना जाने कितने भारी भरकम शब्द क्या सिर्फ मेरे लिए बनाए गए हैं? मैं यदि अपना हक माँगू, आवाज उठाऊँ तो बिगड़ेल व बदतमीज, व्यवहारिक वह मिलनसार हूँ तो चरित्रहीन हो जाती हूँ। पति भले लाख बुरा हो, मेरे सम्मान को कुचले या मेरे अस्तित्व को मिटाए, कोई बात नहीं लेकिन यदि मैंने उसके खिलाफ आवाज उठा दी तो मैं बाजारू कही जाती हूँ। हर प्रकार से मुझे डराने की, धमकाने की, चोट पहुँचाने की, गिराने की व तोड़ने की कोशिश की जाती है। कभी दहेज, तो कभी संस्कारों, कभी सम्मान तो कभी मर्यादा के नाम पर मेरी ही बली क्यांे दी जाती है?
मैं जब सीता थी मैंने अग्नि परीक्षा दी। जब द्रोपदी बनी तो मुझे दाँव पर लगाकर मेरा तमाशा बनाया गया। मैं देखती रही चींखती रही आखिर थक गई पर हारी नहीं और आज भी मुझे सरेआम घसीटा जाता है। मार-पीटकर जलाया जाता है। मेरे साथ गन्दा खेल खेला जाता है क्यों? क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ? क्या लगता है इन्हें टूट जाऊँगी मैं? नहीं मैं स्त्री हूँ लोहे से बनी हूँ, निर्भया हूँ मैं, मुझे तोड़ने वाले की जननी हूँ मैं। सहन करने की सीमा से भी आगे हूँ मैं। असीमित, अनन्त, अविरल, निर्भया हूँ मैं। मुझे तोड़ने वाले की जननी हूँ मैं। उड़ता हुआ बादल हूँ जहाँ बरसती हूँ हरियाली ही लाती हूँ क्योंकि स्त्री हूँ मैं हार नहीं जीत हूँ मैं।