विज्ञान जगत

स्पाई ग्लास से अंतरिक्ष दूरबीनों तक का सफर

विनोद बी. काम्बले,

पूर्व निदेशेक, विज्ञान प्रसार, नई दिल्ली

आज से करीब चार शताब्दी पूर्व, सर 1609 में गैलीलियो गैलेलाई ने तारों की ओर किया। और इस प्रेक्षण से ही खगोल विज्ञान की नींव पड़ी। लेकिन गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार नहीं किया था। इसका श्रेय एक नीदरलैंड जर्मवासी चश्मेकार हांस लिपरशे (या लिपरहे) को ही जाता है। रोचक तथ्य यह है कि लिपरशे ने कभी भी अपने द्वारा आविष्कृत दूरबीन का इस्तेमाल तारों को देखने के लिए नहीं किया। उनका मानना था कि उनके नए आविष्कार का इस्तेमाल मुख्यरुप से समुद्री यात्रियों तथा सैनिकों को लाभाविंत करने तथा जासूसी उद्येश्यों के लिए किया जाएगा। सन् 1608 मे लिपरशे ने यह पाया कि एक उत्तल और अवतल लेंस लगे लेंस समायोजन द्वारा किसी सुदूर पिंड को देखने पर वह पिंड निकट एवं आवर्धित दिखाई देता है। लेकिन इसके लिए दोनों लेंसों को एक दूसरे से उपयुक्त दूरी पर रखना जरुरी है। और इस तरह ही एक जासूसी यंत्र स्पाई ग्लास के रुप में दूरबीन का जन्म हुआ। लेकिन नीदरलैंड (डच) की सरकार ने लिपरशे के पेटेंट को मंजूरी नहीं दी क्योंकि कुछ अन्य व्यक्तियों, खासकर लिपरशे के प्रतिस्पर्धी सैरोरियास जैन्सेन ने भी इस आविष्कार को किए जाने का दावा पेश किया था। यह विवाद कभी न सुलझ सका और आज तक दूरबीन के आविष्कार का नाम रहस्य के अंधेरो में ही है। इस नए आविष्कार का नाम रहस्य के अंधेरे में ही है।
इस नए आविष्कार की खबर तेजी से यूरोप भर में फैल गई। इटली में गैलीलियों ने दूरबीन के बारे में सुना और उन्होंने स्वयं इसे बनाने का फैसला किया। अफवाहों के जरिए ही इस यंत्र दूरबीन का कैसे बनाया गया था। इसके बारे में उन्होंने अनुमान लगाया। और इसके आधार पर ही उन्होंने जून या जुलाई 1609 में एक दूरबीन बना डाली। यह दूरबीन किसी पिंड को तीन गुना (यानी इसकी आवर्धन क्षमता तीन थी) बड़ा बनाकर दिखा सकती थी। अगस्त (1609) में गैलीलियो ने बेनिसी सीने को 8 आवर्धन क्षमता वाली एक दूरबीन भेंट की। उनके द्वारा बनाई गई दूरबीनें उन दिनों व्यावसायिक रुप से उपलब्ध दूरबीनों की तुलना में कहीं बेहतर गुणवत्त्ता वाली थीं। अक्टूबर या नवंबर 1609 में गैलीलियों ने 20 आवर्धन क्षमता वाली अपनी बनाई दूरबीन को चंद्रमा, तारों आकाश गंगा तथा ग्रहों की ओर धुमाया और उन्होंने जो अवलोकित किया उसने सत्रहवीं सदी के यूरोप में एक गहरी उत्तेजना की सृष्टि कर दी।
यह सही है कि दूरबीन का निर्माण करने वाले गैलीलियों पहले व्यक्ति नहीं थे। लेकिन, महज समुद्री जहाजों या युद्ध में सैन्य टुकडि़यों के अवलोकन से दूर हटकर आकाश का क्रमबद्ध अवलोकन करने सोच सबसे पहले गैलीलियो को ही आई। गैलीलियो ने यह अवलोकित किया कि अरिस्टाॅटल के समय से ही अधिक्तर खगोलविदों एवं दार्शनिकों का जैसा मानना था उसके विपरीत चंद्रमा एक पूर्ण रुप से चिकना गोला नहीं। चंद्रमा पर विशाल पर्वतों एवं अंधेरे क्षेत्रों को गैलीलियो ने अवलोकित किया। इन अंधेरे या अदीप्त क्षेत्रों को उन्होंने मारिया या सागर नाम दिया। उन्होंने वृहस्पति के चार उपग्रहों को जिन्हें उनके सम्मान में गैलीलियन चंद्रमाओं की संज्ञा दी जाती है, को भी अवलोकित किया। इसके बाद जब गैलीलियों ने अपनी दूरबीन का रुख शुक्र की ओर किया तो उन्होंने पाया कि चंद्रमा की तरह शुक्र की कलाओं का प्रदर्शन करता है। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि चंद्रमा की तरह ही शुक्र भी अपनी रौशनी से न चमककर सूर्य से परावर्तित होकर आने वाली रोशनी से ही चमकता है। गैलीलियो के अवलोकन केप्लर द्वारा काॅपरनिकस संशोधित की क्रांतिकारी अवधारणा कि सूर्य न कि पृथ्वी सौर प्रणाली के केंद्र में है से मेल खाते प्रतीत होते थे। सन् 1610 में गैलीलियो ने अपने इन अवलोकनों को साइडरियस नन्सियस (द स्टारी प्रसंग यहां इसका उल्लेख प्रासंगिक होगा कि उसी समय ही प्रिंस फ्रेडरिक सेसी ने ही टेलीस्कोप जब गैलीलियो ने 1611 में वेनिस में अपनी दूरबीन का प्रदर्शन किया था, शब्द  को गढ़ा था।
सत्रहवीं सदी के शुरु होने तक लोग यही मानते थे कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है। वैज्ञानिकों ने इस धारणा पर संदेह व्यक्त करना प्रारंभ किया क्योंकि ग्रहों की कक्षाएं इन भूस्थिर सिद्धांतों के साथ संगतता नहीं रखती थीं। लेकिन सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में जाकर ही का परिक्रमण करती है। टेलीस्कोप के आविष्कार ने इस तथ्य को स्थापित करने में मदद की कि सूर्य हमारी  सौर प्रणाली के केंद्र में स्थित है। शुक्र के अर्धचंद्राकार (या चापाकार) स्वरुप का इसी आधार पर ही व्याख्या कर पाना संभव था कि ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते हैं। टेलीस्कोप का आविष्कार निश्चित रुप से इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे प्रौद्योगिकी घटनाओं के बारे में हमारी समझ में वृद्धि  करने में अपनी भूमिका निभाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि टेलीस्कोप के आविष्कार ने मानव जाति को बड़ी गहराई से प्रभावित किया है।
गैलीलियो द्वारा प्रयुक्त टेलीस्कोप मे लगे लेंसों का व्यास केवल 2.5 से0 मी0 (1 इंच) के करीब था। अगले 400 वर्षो में, प्रौद्योगिकीय विकास ने अधिक प्रकाश संग्रहण क्षमतायुक्त विशाल दूरबीनों जिनकी मदद से बहुत धुंधले  पिंडांे को भी अवलोकित किया जा सकता है का निर्माण संभव बनाया। टेली स्कोपों में मुख्य प्रकाशीय अवयवों में लेंसों की जगह दर्पणों ने ले ली। यहां इसका उल्लेख प्रासंगिक होगा कि प्रथम परावर्तक दूरबीन का निर्माण आइजेक न्यूटन द्वारा 1660 में किया गया था इसका उद्देश्य वर्ण-विपथन (क्रोमेटिक एबरेशन) को दूर करना था। उल्लेखनीय है कि किसी अपवर्तक दूरबीन के लेंसों से होकर श्वेत वस्तु से विभिन्न रंगों की किरणें गुजरती हैं तो विभिन्न बिन्दुओं पर इन किरणों के फोकसित होने के कारण ही प्रतिबिंब रंगीन एवं धुंधला बनता है जिसे वर्ण-विपथन कहते हैं। विलियम हर्शेल ने 1789 में झुके हुए दर्पण के प्रयोग द्वारा एक (48 इंच) टेलीस्कोप समेत अनेक विशाल दूरबीनों का भी निर्माण किया। दृश्य एवं अवरक्त (इंफ्रा रेड) प्रकाश में ला पाया नामक स्थान पर स्थित है। इसके मुख्य दर्पण का व्यास 10.4 मी (410 इंच) है। इस निर्माण की योजना को अभी मूर्त रुप दिया जाना बाकी है।
सत्रहवीं सदी के प्रारंभ से उन्नीसवीं सदी तक दूरबीनों द्वारा हुई खोजों ने आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी। सन् 1781 ने विलियम हर्शेल ने यूरेनस की खोज की। नेप्च्यून की खोज 1846 में बिट्रिश खगोलविद जाॅन काउच एडम्स तथा फ्रांसीसी खगोलविद अर्बेन जीन जासेफ लेवेरियर द्वारा स्वतंत्र रुप से की गई। इसके बाद मंगल एवं वृहस्पति ग्रहों की कक्षाओं के बीच क्षुद्रग्रहों की खोज संपन्न हुई। न्यूटन  के समकालीन एडमंड हेली ने गुरुत्वाकर्षण के नए सिद्धांत का प्रयोग धूमकेतुओं की कक्षाओं की गणना के लिए किया। अपनी गणनाओं के आधार पर हेली ने यह पाया कि वर्ष 1531, 1607 तथा 1682 में प्रेक्षित किए गए चमकदार धूमकेतु वास्तव में एक ही धूमकेतु था जो हर 76  वर्षो में सूर्य का चक्कर काटता है। हेली ने यह पूर्वानुमानित किया कि यह धूमकेतु 1758 में दोबारा दिखाई देगा। हालाकि  1758 में, जब उनके पूर्वानुमान के अनुसार यह धूमकेतु दिखाई दिया तो उससे पहले ही हेली की मृत्यु हो चुकी थी इसे बाद में हेली के धूमकेतु का नाम दिया गया। युगल तारों, जिन्हें युगल तारक प्रणालियों (बाइनरी स्टार सिस्टम) की संज्ञा भी दी जाती है, के दूरबीन द्वारा किए गए अध्ययनांे से यह साक्ष्य सामने आया कि गुरुत्व सचमुच सार्वत्रिक है तथा जिन भौतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन हम पृथ्वी पर करते हैं। उन सभी का इस्तेमाल तारों समेत दूरस्थ पिंडों के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। सन् 1838 में टेलीस्कोपों द्वारा (पृथ्वी से) तारों की दूरियां मापने में हगिंस ने यह प्रदर्शित किया कि तारे के स्पेक्ट्रम में आने वाली अदीप्त रेखाओं का पैटर्न पृथ्वी पर ज्ञात तत्वों द्वारा उत्पन्न पैटर्नो के साथ मेल खाता था। इससे यह साबित हुआ कि  जिन, भौतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन हम पृथ्वी पर करते हैं उनका  इस्तेमाल समग्र ब्रह्मांड के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि तारों के स्पेक्ट्रम का अध्ययन हमें उनके तापमान, द्रव्यमान तथा अंतरिक्ष में उनकी गतियों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में आइंस्टाइन ने आपेक्षिकता के सामान्य सिद्धांत को हमारे सामने रखा जिसने गुरुत्व एवं ब्रह्मांड संबंधी हमारी समझ को मूलभूत रुप से बदल डाला। आइंस्टाइन ने गुरुत्व को दिक् एवं काल की वक्रता के रुप में वर्णित किया। उनके सिद्धांत के एक पूर्वानुमान के अनुसार प्रकाश को किसी तारे जैसे सहत पिंड के पास से गुजरते समय अपने पथ से मुड़ जाना चाहिए। सन् 1919 में बिट्रिश खगोलविद सर आर्थर स्टेनली एडिग्टन के नेतृत्व में खगोलविदों के एक दल ने पूर्ण सूर्य ग्रहण के अवसर का इस्तेमाल सूर्य के पास से गुजरते हुए तारक प्रकाश के विक्षेपण को मापने के लिए किया। इस प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष आइंस्टन के पूर्वानुमानों से मेल खाते थे।
सन् 1923 में अमेरिकी खगोलविद एडविन हब्बल ने माउंट विल्सन वेधशाला में स्थापित उस समय की सबसे बड़ी माउंट विल्सन वेधशाला में खोज की कि एंडोमीडा नीहारिका हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी से अत्यंत विशाल दूरी पर स्थित है तथा इसका व्यास करीब 100,000 प्रकाश वर्ष (वह दूरी जो प्रकाश एक वर्ष मे 300,000 किलोमीटर प्रतिसेकेंड के वेग से तय करती है) है। और इसीलिए यह एक अगल मंदाकिनी होनी चाहिए दूरस्थ मंदाकिनी पर उनके द्वारा किए गए अध्ययनों से यह बात सामने आई कि जैसा कि पहले माना जाता था, ब्रह्मांड स्थिर नहीं है। बल्कि यह फैलते हुए आकार में बढ़ रही है।