हमारे लेखक

स्वामी विवेकानन्द की कुमाऊँ गाथाएं भाग 1

स्वामी विवेकानन्द की कुमाऊँ गाथाएं
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
यह सभी को विदित है कि कभी-कभी इतिहास एक गाथा की रचना के लिए शास्त्रीय ध्वनि की चरम सीमा में उत्कर्ष करता है, एक मानवीय व्यक्तित्व के लिए। स्वामी विवेकानन्द एक ऐसी ही गाथा थे, मानवीय संवेदना के प्रतीक थे और दार्शनिक महाक्रान्ति के महाकाव्य थे। भारतीयों की विचार, संस्कृति और संवेदना को जानने के लिए भारत की परिक्रमा के लिए वह स्वामी रामकृष्ण के आग्रह पर पश्चिम गए। सितम्बर 1893 में उन्होंने शिकागो में विश्व धर्म संसद में भाग लिया और अपने सार्वभौंम एकत्व से पूर्ण छोटे से संबोधन में इस एकत्व के लिए मौलिक उदारता, जागरूकता और उदार हृदय की आवश्यकता पर बल दिया। इस संबोधन ने संसद में उपस्थित सभी धर्माचार्यो का ध्यान आकर्षित किया।
रामकृष्ण कुटीर, अल्मोड़ा के स्वामी देवानन्द के अनुसार- उनका कुमाऊँ के साथ विशेष लगाव था और यहाँ की दिव्य अनुभूतियों ने स्वामी जी के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1890 में वह कुमाऊँ पहली बार आए और अपने गुरू भाई अखन्डानन्द के साथ अपने अच्छे मित्र महाराजा क्षैत्रिय से मिलने आए और यहाँ अपने सहयोगी के साथ बाबू रामप्रसन्त्रा भट्टाचार्य के साथ अतिथि के रूप में छः दिन रहे।
नैनीताल से बद्रीनाथ जाते हुए निगलाट भवाली से अल्मोड़ा की ओर प्रस्थान किया। इस यात्रा के तीसरे दिन काकड़ीघाट के एक पुराने पीपल वृक्ष के नीचे उन्होंने रात बिताई। काकड़ीघाट कोसी और सुयाल नदी के संगम में स्थित है। यह स्थान अल्मोड़ा राजमार्ग में नैनीताल से चालीस किलोमीटर है स्वामी जी ने अपने साथियों से कहा- यह स्थान बहुत रोचक है और ध्यान के लिए उत्कृष्ट और चमत्कारी स्थान है। दूसरे दिन नदी में स्नान कर स्वामी जी पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए। गहरी समाधि में लम्बे समय तक मग्न हो गए। बाद में सामान्य स्थिति आने पर उन्होंने अपने गुरु भाई से कहा- यह मेरे जीवन का सबसे बहुमूल्य क्षण था। इस पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर मेरे जीवन के कठिन जटिल समस्याओं का समाधान हुआ। मैंने अनुभव किया ब्रहा्रमाण्ड के सभी सूक्ष्म और स्थूल कणों में एकत्व है। ब्रह्माण्ड के अणुओं में छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कण एकत्व लिए है। यह अनुभूति पश्चिम में जब उन्होंने ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म और स्थूल कणों के सार्वभौमता और एकत्व पर संबोधन किया तो प्रकट हुई। काकड़ीघाट में जिस पीपल वृक्ष के नीचे स्वामी जी ने ध्यान किया वह अभी भी विद्यमान है। काकड़ीघाट प्राचीन काल से ही रहस्यवादियों, सन्तों-सूफियों और ईश्वर की प्राप्ति से लड़े महापुरुषों को आकर्षित करता रहा। नीब करौरी बाबा के भक्त मनोहरलाल साह के अनुसार गुदड़ी महाराज, सोमवारी महाराज, स्वामी विवेकानंद और बीसवीं शताब्दी के वलन्त मिथक नीब करौरी बाबा ने यहां पर कठोर तप किया। यहां के अनुपम सौंदर्य ने और अनुभव जनित दैवीय विचारों ने मानवता को प्रेरित किया जिससे अंतिम वास्तविकता के रहस्य को प्राप्त कर सकें। जीवन के इस चरम रहस्य को प्राप्त करना ही आत्मानंद है और यही मानव जीवन का लक्ष्य है। काकड़ीघाट में प्राचीन शिव और भैरव मन्दिर में भक्त पूर्ण समर्पण के साथ सर्व शक्तिमान की प्रार्थना करते हैं।
क्रमशः