हमारे लेखक

स्वामी विवेकानन्द की कुमाऊँ गाथाएं भाग 2

स्वामी विवेकानन्द की कुमाऊँ गाथाएं
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
राजगुरु के. सी सुयाल के अनुसार-काकड़ीघाट अतुलनीय ईश्वरीय सौन्दर्य और अनुभूति का प्रतीक है और सकारात्मक मस्तिष्क की भौतिक सम्पत्ति है। यहां का सौन्दर्य अतुलनीय, शान्ति चिरन्तर शांति विशिष्ट और अनुपम है। यहां पर जो ध्यान करते हैं वह आध्यात्मिकता के उच्च स्तर की ओर अग्रसर होते हैं लेकिन इसके लिए पूर्ण नम्रता के साथ समर्पण आवश्यक है तभी दैवी कृपा और अनुभूति का अनुभव होता है।
काकड़ीघाट से स्वामी जी ने अल्मोड़ा की ओर प्रस्थान किया। जब ये साधु अल्मोड़ा से तीन किलोमीटर पर थे तो एक मुसलमान कब्रगाह के समीप चट्टान के नीचे बैठ गए। इन साधुओं ने कई घंटों से भोजन नहीं किया था। भूख के कारण स्वामी जी लगभग अचेत हो गए। अत्यधिक थकावट के कारण कब्रिस्तान के संरक्षक जुल्फीकार अली नामक फकीर ने उनको गहन कष्ट में देखा और खाने के लिए ककड़ी दी। इस ककड़ी को खाकर स्वामी जी ने ताजगी महसूस की।
स्वामी जी अल्मोड़ा पहुँच गए। 1893 में विश्व विख्यात स्वामी विवेकानन्द के रूप में पुनः अल्मोड़ा आये। वहाँ उनका अद्भुत स्वागत हुआ और उन्होंने जुलूस के रुप मंे बाहर भ्रमण किया। जब जुलूस आगे बढ़ रहा था, भीड़ में स्वामी जी ने जुल्फीकार अली को पहचान लिया और उन्होंने उसे गले लगा लिया और अपने रक्षक के रुप में लोगों से उसका परिचय कराया।
अल्मोड़ा में उस समय गर्मी बहुत थी इसलिये विवेकानन्द ने कुछ समय देवलधार में रुकना उचित समझा। यह स्थान ऊँचाई पर है। शारदा आश्रम पंगूट के परिवाचक प्रसन्ना ने कहा स्वामी जी देवलधार में एक महीना रुकने के बाद अल्मोड़ा लौट आए। वहाँ उन्होंने कई व्याख्यान दिए और कसारदेवी में ध्यान किया। 1898 में वह फिर अल्मोड़ा आए और थामसन हाउस में रहे। उनके कुछ पाश्चात्य शिष्य सिस्टर निवेदिता समेत ओकले हाउस में रहे। यह निवेदिता काॅटेज के नाम से प्रसिद्ध है। स्वामी जी अल्मोड़ा की पहाडि़यों में एक मठ का निर्माण करना चाहते थे। उनके जीवन काल में वह सम्भव नहीं हो सका। फिर भी उनके दो शिष्य स्वामी शिवानन्द और स्वामी तुरीयानन्द ने 1910 में एक विश्राम केन्द्र का निर्माण किया जो रामकृष्ण कुटीर के नाम से विख्यात है। अरविन्द आश्रम के नलिन डोलकिया के अनुसार- स्वामी जी की 1901 में कुमाऊँ पहाडि़यों की अंतिम यात्रा थी। यह यात्रा मिसेज सेवियर के पति कैप्टन सेवियर के आकस्मिक निधन पर उनके प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए थी। इन सेवियर दम्पति ने मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना की। यह आश्रम स्वामी विवेकानन्द का जाग्रत स्वरूप था ”स्वामी विवेकानन्द का हिमालय के प्रति विशेष आकर्षण था। हिमालय परिनिर्वाण की भूमि है और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए आदिकाल से प्रेरणा स्थल है, हिमालय की यात्रा केवल यात्रा ही नहीं है यह विश्वास और परम्पराओं को मनाने के लिए पवित्र स्थल है। स्वामी सर्वप्रियानन्द ने अनुभव किया कि धर्म का सत्य उच्च आध्यात्मिकता शहर के कोलाहलपूर्ण जीवन में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। मनुष्य को इसे प्राप्त करने के लिए गहन निर्जन एकान्त की आवश्यकता है। हजारों योगी और साधू हिमालय की एकान्तता की ओर आकर्षित हुए जहाँ चिर एकान्त का वास है। उन्होंने हिमालय की गोद में वास्तविक सत्यता को प्राप्त करने के लिए कठोर श्रम किया इसके अतिरिक्त हिमालय भगवान शिव का धाम है भगवान शिव महायोगी थे और हिमालय उनकी अर्धांगिनी पार्वती का जन्म स्थान है। स्कन्दपुराण के अनुसार हिमालय के समान कोई पर्वत नहीं है। उदित सूर्य की किरणों से जिस प्रकास ओस की बूंदें सूखती हैं उसी प्रकार मानव मात्र के पाप हिमालय के दर्शन से नष्ट हो जाते हैं और वह पुण्य जीवन का भागीदार बनता है।