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हंगरी के दिव्य चित्रकार - ब्रूनर्स

हंगरी के दिव्य चित्रकार - ब्रूनर्स
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

नैनीताल को अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने का अतिरिक्त श्रेय हंगरी की प्रसिद्ध चित्रकार एवं महान आत्मा एलिजाबेथ सास ब्रूनर को भगवान शिव की बनाई गयी चित्रकारी के लिए जाता है। इनका जन्म 14 जून 1889 को हंगरी के नागयकनिजस कस्बे में हुआ था। बचपन से यह असाधारण प्रतिभा की धनी और साथ-साथ अपनी प्रतिभा में रचनात्मकता को संजोये हुए थी। इनके भीतर सांसारिकता को कैनवास पर जीवन के दिव्य आश्चर्य में बदलने की शक्ति थी। सन 1927 के ईस्टर के आसपास, अपने ‘विजन‘ श्रृंखला को उन्होंने बस पूरा ही किया था कि एक आकाशवाणी से वह ठहर गयी, ”जो आप यहाँ प्राप्त कर सकते थे आपने किया, अब जिस चीज को आप ढूँढ रहे हो वो सिर्फ आपको भारत में मिलेगी, इसलिए आपको भारत जाना चाहिए।” सास ब्रूनर इस दृष्टिगोचर को समझ अपनी अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार बेटी के साथ शांतिनिकेतन चली गयी।
17 फरवरी 1930 को वे शांतिनिकेतन पहुँची। शांतिनिकेतन में गुरुदेव ने नंद लाल बोस, एक प्रसिद्ध चित्रकार को ब्रूनर्स की देखभाल का दायित्व सौंपा। वहाँ एलिजाबेथ सास ब्रूनर ने ज्यादातर समय ध्यान और चित्रकारी में बिताया। शांतिनिकेतन में उन्होंने अपनी पहली आकर्षक चित्रकारी भगवान शिव की बनाई। चित्रकारी देख नंद लाल बोस मंत्र-मुग्ध हो गए और टिप्पणी की कि ”मैंने शिव की पेंटिंग में अपने पूरा जीवन बिता दिया, लेकिन सफल न हो सका अब आपने इसे साकार कर दिखाया”। प्रख्यात पत्रकार आरके राजू के अनुसार, तब से सास स्वतंत्र दिखीं और प्रदीप्त हो अपनी चित्रकारी में जुट गयीं। उनके लिए चित्रकारी एक सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति की तुलना से भी परे था, जो वास्तव में सत्य की खोज के लिए और लौकिक विचारों को वास्तविकता देने के जैसे था। उस अवधि के दौरान उनके द्वारा बनाये गये चित्र थे - मदर इंडिया, दी सोल आॅफ गैंजेस, होमवार्ड, दी गार्डनर, इन दी स्टाॅर्म, अंडरस्टैंडिंग और इन टी फारेस्ट। इन चित्रों से गुरुदेव के व्यक्तित्व और काव्य जीवन तथा शांतिनिकेतन के बनवासी वातावरण की झलक दिखती है जिसकी छाप अनन्त हैं। यद्यपि प्रकाश के इस्तेमाल से मन में पाश्चात्य चित्रकारों जैसे रेम्ब्रन्द्त की सूक्ष्म चमक बन जाती है, परन्तु इसका विषय हमेशा प्राच्य माना जाता है।

माँ और बेटी, दोनों दो वर्ष तक शांतिनिकेतन में रुके; जिसके बाद वे नए विषयों की खोज में भारत भर में इधर-उधर टहलते रहे। यद्यपि वे गुरुदेव के लगातार संपर्क में थे और सन 1941 में उनके निधन के समय वे मसूरी में थे पर वह अनजान थे कि गुरुदेव गंभीर रूप से बीमार थे। एलिजाबेथ ने लिखा कि उनके कमरे में ”उस दिन उनकी उपस्थिति को हर जगह मैंने महसूस किया और देखा”। तीन दिन बाद 6 अगस्त 1941 को एक दिव्य रहस्य महसूस किया तथा सास ने गुरुदेव की वही आकृति जो उन्होंने सिसिली में सपने में देखी थी और जो उन्हें शांतिनिकेतन खींच लाई, बनाने का निर्णय किया। बाद में उन्हें पता चला कि उस रात गुरुदेव स्वर्ग को सिधार गए।

अगले वर्ष 1942 में, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी और कांग्रेस के कई अन्य नेताओं को गिरफ्तार किया गया। उसी वर्ष ईस्टर सोमवार के दिन, गांधी जी के साथ निकटता के कारण माँ और बेटी दोनों के नाम गिरफ्तारी के वारंट जारी कर उन्हें नैनीताल भेजा दिया गया। यहाँ आकर माँ के भीतर नैनीताल के लिए एक विशेष लगाव बना, जिसका कारण वहाँ का बनवासी परिवेश, पर्वतों में शांति, पन्नारूपी झील के चारों ओर झालदार विलो, सर्दियों की बर्फ और नैनीताल की पर्वत चोटियों से दिखती हुई हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता की विशाल महिमा का होना था। शुरुआत में वे सेंट क्लाउड नाम के बंगले में रुके और बाद में देवदार काॅटेज में स्थानांतरित हो गए। वे असाधारण प्रतिभा और अद्वितीय आध्यात्मिक दृष्टि के कलाकार थे। वहीं नैनीताल में प्रवास उनके लिए एक आध्यात्मिक आश्रय था जिसने उन्हें भारतीय संस्कृति और स्वभाव के उच्च वास्तविकता से आत्मसात कराया। वहाँ रहकर माँ ने त्रिशूल और नंदा देवी और पर्वतों के मध्य होते हुए सूर्योदय, और कचनार, बाँज, बुराँश जैसे पेड़ों के समस्त स्वभावों जैसे विषयों पर चित्रण किया। उनके द्वारा बनाया गया आखिरी चित्र ‘दी लास्ट विंटर‘ सास ब्रूनर की रचनात्मकता से ओत-प्रोत भावना और उनके बंगले के सामने सम्मोहित करने वाले दृश्य को परिभाषित करता है। जिसमे उन्होंने बर्फ से आछादित ग्राॅसमेरे बंगले और खुद को ठंड में होने का चित्रण किया। सन 1950 के नए साल की यह उनकी पहली और अफसोस से आखिरी तस्वीर थी। तथा 61 वर्ष की आयु के समीप पहुँचते हुए 19 जनवरी 1950 को वे अपनी स्वर्ग यात्रा को चल पड़ी। उनको अपनी मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था और स्वर्ग सिधारने से एक दिन पहले अपनी बेटी एलिजाबेथ ब्रूनर को इच्छा जताई कि उन्हें सेंट जाॅन चर्च के कब्रिस्तान में देवदार के पेड़ों की छाया में दफना दिया जाये जो पहाड़ी लोगों द्वारा भी बहुत ही पवित्र माना जाता है। उनकी माँ ने उन्हें बताया था कि ”यह एक खूबसूरत जगह है और उन्हें वहाँ रखा जाये”। एक प्रख्यात पत्रकार आरके राजू, जिन्होंने ब्रूनर्स पर एक किताब लिखी है, उल्लेख करते हैं कि ”एलिजाबेथ को ये याद नहीं था कि अंतिम संस्कार में कौन सम्मिलित हुए थे। याद बस इतना था कि जिस समय उनकी माँ को दफनाया गया उस जगह सूर्य की किरणें कब्र पर पड़ रही थीं, जबकि दूसरी ओर नैनीताल बर्फ की एक सफेद चादर से बिछा हुआ था।”
अपनी माँ के निधन के बाद, दिल्ली में स्थानांतरित होने के बावजूद एलिजाबेथ की स्मृति में नैनीताल बस जैसा गया था। वह खुद एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जानी- मानी चित्रकार थीं जिन्हें भारत की हंगरी बेटी के रूप में प्रसिद्द जाना जाता था। उन्हें कई पुरस्कारों से अलंकृत भी किया गया जैसे यूनिटी इंटरनेशनल अवार्ड 1983, हजाफीअस नेप्फ्रोंट अवार्ड 1983, हंगरी और भारत के बीच दोस्ती को बढ़ावा देने का अवार्ड 1984 और उसी वर्ष कोरोसी क्सोमा सनडोर शताब्दी पुरस्कार। सन 1985 में एक कलाकार के रूप में अपने समर्पण और भारत के लिए उनकी भक्ति के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया। 2 मई 2001 के कयामत के दिन मृत्यु ने अपनी ठंडी चादर से इस महान भारतीय बेटी को ओढकर सुला दिया। अपनी माँ की भाँति उन्होंने भी यह इच्छा जताई थी कि मरने के बाद उन्हें सेंट जाॅन के ही कब्रिस्तान में है दफना दिया जाए जहाँ आज माँ और बेटी दोनों एक ही कब्रिस्तान में शाश्वत शांति में विश्राम कर रहे हैं।

लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित