संस्कृति

हमारी लोक संस्कृति व सांस्कृतिक एकता

हमारी लोक संस्कृति व सांस्कृतिक एकता
डी एस कोटलिया, नैनीताल -

संस्कृति शब्द की पृथक्-पृथक् दृष्टिकोण से पृथक्-पृथक् परिभाषाएं दी जाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी समाज की संस्कृति इस बात का परिचय देती है कि जीवन के प्रश्नों के सम्बन्ध में उस समाज का दृष्टिकोण क्या है। संस्कृति की गोद में समाज की आशा, निराशा, इच्छा और इच्छाभिगत आकांक्षाएं खेलती हैं। संस्कृति इन सबको रंजित करती है, इन्हें संवारती है। समाज में स्त्री और पुरुष दोनों हैं, शिक्षित भी हैं और अशिक्षित भी हैं, भिन्न-भिन्न व्यवसाय करने वाले लोग हैं। भारत जैसे देश में विभिन्न वर्ण हैं, वर्णयुक्त और वर्णहीन, दोनों समाजों में विभिन्न वर्ग हैं। इन सब समुदायों की समस्याएं पृथक्-पृथक् हैं, अनुभूतियाँ पृथक्-पृथक् हैं। परन्तु जिस प्रकार मानव शरीर का प्रत्येक कोष्ट जीवन के पृथक् होते हुए भी एक सत्ता है जो सारे शरीर में व्याप्त है और जो पृथक्-पृथक् कोष्ट की सत्ताओं को एक दूसरे से सम्बद्ध करती है, इसी प्रकार सारे समाज की एक संस्ति होती है।
भारत के रहने वाले किसी एक जाति (अंगरेजी शब्द Race) के नहीं हैं। उनमें वर्ण, वर्ग, मत, व्यवसाय के मतभेद विद्यमान हैं। यह भेद आज से नहीं, प्राचीनकाल से चले आ रहे हैं। परन्तु आदिकाल से ही भारत की सांस्कृतिक एकता की धारणा भी चली आ रही है। हम जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं, वह अनेक धाराओं के मिलने से बनी है। परन्तु वह सब धाराएं इस प्रकार मिलकर एक हो गयी हैं कि उनकी पृथक् सत्ता का लोप हो गया है। सम्राट और चक्रवर्ती आए और गए, देश ने अनेक राजनीतिक उथल-पुथल देखे परन्तु उसने यह कभी नहीं माना कि उसकी एकता छिन्न हुई। आज हमारे सामने एक अविच्छिन्न, अविच्छेद्य भारतीय संस्कृति है। इस संस्कृति की आधारशिला क्या है, मूलमंत्र क्या है? अथर्ववेद का प्राचीन पृथ्वीसूक्त, जिसमें भारत के सम्बन्ध में कहा गया है कि इसमें ‘नाना धर्माणों विवाचसः’ अनेक धर्मों के मानने वाले व अनेक भाषाओं के बोलने वाले रहते हैं। भारत में धर्म शब्द मजहब अथवा Religion का पर्याय नहीं है। ऋषि जेमिनी ने धर्म की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् जिससे इस लोक में उन्नति और परलोक में सद्गति प्राप्त हो, उसको धर्म कहते हैं। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का सिद्धांत हमें यह स्मरण कराता है कि यदि सबके हित की बात की जाए तो व्यक्तिगत हित का प्रश्न स्वतः ही गौण हो जाता है। यजुर्वेद में ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथाः’ अर्थात् ‘उस (ईश्वर) के द्वारा त्यागे गए (पदार्थों अथवा जगत) का उपयोग करो’ के सन्देश के माध्यम से त्याग को भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र के रूप में स्वीकार किया गया है। त्याग के साथ मूल में दया का भाव विद्यमान रहता है।
प्रत्येक वस्तु में परमात्मा को देखना भारतीय संस्कृति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। गरीब से गरीब और अनपढ़ भारतीय भी ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ की धारणा पर विश्वास करता है। यह अलग बात है कि उसका आचरण वैसा शुद्ध और परिपक्व न हो जैसा कि इस विचार के अनुसार होना चाहिए। कर्म का सिद्धांत इन्हीं विचारों से सम्बद्ध है जिस पर हम भारतीयों का अटूट विश्वास है, ‘कर्मप्रधान विश्व करि राखा, जो जस करई, सो तस फल चाखा’, यहाँ सबकी जिह्वा पर रहता है। भारतीयों के लिए यह केवल मुख से दोहरा देने की बात नहीं है अपितु उनके व्यवहार में भी यह परिलक्षित होता है। आत्म-कल्याण व स्वदेश के विचार से ऊपर उठकर विश्व-बंधुत्व की बात करें तो हम देखते हैं कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ जैसे सर्वश्रेष्ठ विचार भी भारत की पवित्र भूमि पर ही अंकुरित होकर पूरे विश्व में फैले हैं।
ग्राम्य जीवन तो इसी संस्कृति की गोद में पल्लवित और पुष्पित होता है। वहाँ के लोकगीत, लोकनृत्य, त्योहारों आदि को देखने पर इन विचारों की झलक दिखाई पड़ती है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि ग्रामीण सब दोषों से मुक्त होता है तथापि उसका हृदय स्वयं को पद्य, गान और नृत्य में अधिक सच्चाई के साथ व्यक्त करता है। राग-द्वेष उसमें भी होता है परन्तु अपने उत्कर्ष के निमित्त दूसरे का अपकर्ष करने के लिए सरलता से प्रेरित नहीं हो जाता। मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति की ये प्रमुख व अद्वितीय विशेषताएं हैं।
लोकसंस्कृति वह जीती-जागती वस्तु है, जिसके द्वारा लोक की आत्मा बोलती है। समाज कोई जड़ वस्तु नहीं हैय उसकी अपनी एक आत्मा है। समाज एक अश्य सूत्र से बंधा हुआ है, कुछ अश्य शक्तियाँ उसे प्राणतत्व प्रदान करती हैं। उसकी एक विशेष संस्कृति है और वह संस्कृति ही उसकी विशेषता है। समाज में परिवर्तन होते रहते हैं और लोक संस्कृति में भी परिवर्तन होता है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के कारण वह परिस्थितियाँ बदल जाती हैं जिनमें पहली संस्कृति पनपती थी। लोकगीतों और लोकनृत्यों ने हजारों वर्षों के हमारे इतिहास की रक्षा की है।
यह दुःख की बात है कि आज का शिक्षित भारतीय, पुरुष या स्त्री, लोकसंस्कृति से दूर जा रहा है। वह अपने को ऊंचे सांस्कृतिक स्तर पर स्थित हुआ देखता है। यह उसका भ्रम है। लोकसंस्कृति में हमारी सहस्रों वर्षों की अनुभूतियाँ सुरक्षित हैं। लोकगान और नृत्य उन प्रवृत्तियों को व्यक्त होने का अवसर देते हैं जो प्रायः कालांतर में दब जाती हैं। उनमें परिष्कार की कमी से उनकी अभिव्यक्ति के स्वरुप में परिवर्तन आ सकता है जो लोकप्रियता के मापदंडों पर कदाचित् संतोषप्रद न हों, परन्तु हैं तो वह हृदय का उद्गार ही, इसलिए हृदय को स्पर्श करती हैं। फिर हम उनसे स्वयं को कैसे पृथक् कर सकते हैं? अपनी संस्कृति से दूर हुए मनुष्य की गति ‘डोर से अलग हुई पतंग’ जैसी हो जाती है। सिर का आकाश में होना अच्छा हो सकता है परन्तु पाँव का पृथ्वी पर ही रहना सर्वथा उचित होता है।