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हिमालय का ईडन गार्डन

प्रो॰ अजय सिंह रावत,
नैनीताल -
सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने तक बंद होने के बाद, हिमालय क्षेत्र में सबसे सुंदर घाटियों में से एक, फूलों की घाटी के लिए ट्रैकिंग सुचारू रूप से शुरू कर दी गयी है। इस घाटी में मार्च के अंत से अक्टूबर के आखिरी सप्ताह के मध्य पहुँचा जा सकता है। अप्रैल और मई के महीनों के दौरान, जमे हिमनदों के पिघलने से पौधों को सतह पर आने के लिए जगह मिल जाती है तथा मध्य मई से लगभग जून के अंत तक कलियों का आना शुरू हो जाता है। इस पवित्र स्थान की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय जुलाई के शुरू से अगस्त के तीसरे सप्ताह के मध्य जब फूल पूर्ण रूप से खिलते हैं, तब होता है। सितंबर तक फूलों में रंग बदलना शुरू हो जाता हैं तथा इसके बाद शरद ऋतु अपने आने पर उन्हें विदा कर देती है।
एक प्रख्यात पत्रकार चन्द्रेक बिष्ट कहते हैं ”वर्तमान में भी फूलों की घाटी एक वनस्पति चमत्कार और रहस्य का केंद्र है। यह 87.5 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है और अल्पाइन फूल पौधों की एक अद्वितीय विविधता का निवास स्थान है।” कोई भी इस खूबसूरत जगह का एकांत और वन में परमात्मा की उपस्थिति अनुभव कर सकता है। प्रकृति की सुंदरता हृदय में समाहित हो जाती है और ऐसा लगता है मानो प्रवाहमान होते हुए सुरम्य बादल धीरे से कहते हो की आकाश में धनुषाकार जीवन के गौरवशाली इंद्रधनुष का साक्ष्य बनने के लिए आप यहाँ चुने हुए दर्शक के तौर पर आये हैं।
पर्यावरणविद् डा॰ रितेश साह कहते हैं ”प्रकृति प्रेमियों, वनस्पतिज्ञ,पारिस्थितिकीविद्, प्राणिशास्त्री, पक्षीविज्ञानी और ट्रेकर्स के लिए यह आश्चर्य, भारत में सबसे प्रतिष्ठित नेशनल पार्क में से एक है।” वनस्पतियों अथवा फूल-पौधों की लगभग 499 प्रजातियों का यहाँ विवरण मिलता हैं। तथा फूलों के अलावा, तितलियों और जानवरों के कुछ दुर्लभ प्रजातियां जैसे कस्तूरी मृग, नीले भेड़ (भरल), हिमालयी भालू, हिमालय माउस खरगोश, कुछ दुर्लभ हिमालय पक्षियों की प्रजाति और मायावी हिम तेंदुए भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। सन 1982 में इसे एक राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया तथा 17 जुलाई 2005 को विश्व विरासत समिति ने इस घाटी को विश्व विरासत सूची पर अंकित कर दिया था। इस सूची पर अंकित होना ही सम्पूर्ण मानवता के संरक्षण के लिए इस घाटी का सांस्कृतिक अथवा प्राकृतिक स्थल ही इसकी असाधारण और सार्वभौमिक महत्वता की पुष्टि करता है।
मूल रूप से भुन्ड्यार घाटी के नाम से जाने जानी वाली फूलों की घाटी पर, सीमावर्ती शहर जोशीमठ से बद्रीनाथ मंदिर को जाने वाले मार्ग से पहुँचा जा सकता है। जोशीमठ से लगभग 25 किमी के सड़क मार्ग पर गोबिंद घाट स्थित है जिसके बाद गोबिंद घाट से फूलों की घाटी के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती है। गोबिंद घाट से घाटी के प्रवेश स्थान तक 19 किमी की दूरी तय कर पहुँचा जा सकता है तथा उच्चतम स्थान तक पहुँचने के लिए और 10 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यह घाटी समुद्रतल से 3352 मीटर एवं 3658 मीटर के बीच की ऊँचाई पर स्थित है। सन 1937 से पहले यह मनमोहक घाटी अछूती थी तथा सिर्फ भुन्ड्यार घाटी के कुछ उच्च स्थान पर रहने वाले निवासियों को ही इसके बारे में ज्ञात था। देवताओं, अप्सरा और परियों की आकाशीय खेलभूमि समझ वे वहां जाना टालते रहते थे। बाहरी दुनिया के लिए इस घाटी को प्रख्यात ब्रिटिश अन्वेषक, वनस्पति विज्ञानी और पर्वतारोही फ्रैंक स्मीथे द्वारा सन 1937 को खोजा गया। सन 1939 में ब्रिटिश वानस्पतिक एसोसिएशन ने घाटी की आगे की जांच के लिए वनस्पतिशास्त्री मार्गरेट लेग्गे को यहाँ भेजा परन्तु वह कभी नहीं लौटने के लिए यहाँ फिसल पड़ी और घाटी में अनंत काल में खो गयी।
उच्च स्थान पर ट्रैक करने वाले प्रख्यात पर्वतारोही दिनेश लोहनी कहते है कि ”फूलों की घाटी के निकट हेमकुंड साहिब का सिख मंदिर स्थित है। प्रत्येक वर्ष लगभग 4 से 5 लाख तीर्थयात्री हेमकुंड और घाटी की यात्रा पर आते हैं। पर्यटन यहाँ की

स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि आसपास के गांवों की आबादी का लगभग 95 प्रतिशत वर्ग जीवनयापन करने के लिए इस व्यवस्था पर निर्भर करता है। ”लेकिन अनियमित पर्यटन के कारण कचरे के बड़े ढेर, मुख्य रूप से प्लास्टिक और खच्चरों के गोबर वहाँ जमा हो जाते थे। इस समस्या से निपटने के लिए, भुन्ड्यार और गोविंदघाट में स्थानीय समुदायों को पारिस्थितिकी विकास समितियों (ईडीसी) में आयोजित किया गया। जल्द ही, वन विभाग के मार्गदर्शन तथा समर्थन से ईडीसी ने क्षेत्र में विभिन्न पर्यटन-संबंधी गतिविधियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली तथा तब से इस क्षेत्र के पर्यावरणीय मुद्दों का निवारण कर रहे हैं। इस सामूहिक प्रयास का परिणाम यह निकला कि जो कुछ वर्ष पहले अकल्पनीय था, वह 19 किमी चढ़ाई वाले मार्ग की फूलों की घाटी अब एक नए स्वच्छ रूप में दिख पड़ रही है। अकेले पिछले दो वर्षों में, सरकारी धन से एक रुपया भी खर्च किए बिना ईडीसी द्वारा इस क्षेत्र से कचरे का 90 टन से अधिक का ढेर हटा दिया गया।
ईडीसी, गाइड और फोटोग्राफर के रूप में भी स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहा हैं। लड़कियों को भी फूलों की घाटी के रास्ते में पड़ने वाले घांघरिया और भुन्ड्यार पर व्याख्यान केंद्रों में कार्यरत किया गया हैं। इसके साथ साथ लड़कियों को पर्यटकों के लिए घाटी का प्रेजेंटेशन तथा तस्वीरों और स्मृति चिन्ह की बिक्री के लिए भी रखा गया है।