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‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 2

संस्मरण - 2

‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल कुमार पंत, नैनीताल -
एक समय बाबा जी युवा अवस्था में अपनी मौज के चलते हुए हाथ में चिमटा व कमण्डल लिये हुए फरूखाबाद स्टेशन में  रेलगाड़ी के प्रथम डिब्बे में बैठ गये। कुछ दूर चलने पर एक अंग्रेज टिकर चेकर आया और एक साधु को प्रथम श्रेणी के डिब्बे पर बैठा हुआ देखकर टिकट माँगने लगा लेकिन नाकारात्मक उत्तर मिलने पर उन साधू को उतार दिया। बाबा जी ने एक वृक्ष के नीचे अपना चिमटा गाड़ा और बैठ गये। उधर गाड़ी चलने का नाम नहीं ले रही थी। उसमें कोई खराबी भी नहीं थी। तभी कुछ भारतीयों ने उन विदेशी अधिकारियों को राय दी कि आप उन साधु से छमा याचना कर उन्हें गाड़ी में बिठा लिजिये। उन्होंने सिधा महाराज को गाड़ी में बिठा लिया और गाड़ी चलने लग गई और सभी लोग उनकी शक्ति को जान गये। इसी से ‘नीब करौरी’ ग्राम विख्यात हो गया और यहीं से उनका नाम ‘नीब करौरी बाबा’ पड़ गया। कालान्तर में  नीब कारौरी नाम का स्टेशन भी बन गया है, और वहाँ पर हर गाढ़ी 1-2 मीनट के लिए रूकने लगी और अब तो गाँव के बीच में ‘ बाबा लक्षमनदास पुरी’ फ्लैग स्टेशन भी बन गया है।उत्तराखण्ड में बाबा जी नीब  करौरी बाबा को  नीम करोली  कहलाये । बाबा जी के बारे में लिखना, मतलब उनकी महिमा को कोई अपनी कलम से लिख ही नहीं सकता। मैं तो बाबा जी की प्रेरणा से ही कुछ सुनकर, कुछ उनके बारे में पढ़कर व कुछ अनुभव करके अपने भाव लिख रहा हूँ। ‘‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’’ वाले बाबा जी की कुछ लीलाऐं जो महाराज के भक्तों के द्वारा देखकर और सुनकर लिखी गई हैं उन्हें पुनः लिख रहा हूँ।

बाबा जी की प्रसिद्धि भारत में एक संत के रूप में थी जिन्हें  सारी सिद्धियां प्राप्त थी। आनन्द माँ के शिष्य स्वामी विजयानन्द ने उन्हें  कहा  वह  एक ऐसे  योगी थे जिनके चारों ओर रहस्यों और चमत्कारों का प्रकाश व्याप्त रहता है। ’’
सुधीर कुमार मुखर्जी ‘‘दादा’’ ने अपनी पुस्तक ‘‘पारस स्पर्श’’ में लिखा है कि बाबा जी के बारे में प्रत्येक भक्त का अनुभव अपने ढंग का है। तुलाराम साह जी ने कहा बाबा जी इस युग के महानतम सन्त हैं। ‘‘रामनारायण सिन्हा ने लिखा है वे हनुमान हैं।’’ अखबर अली खाँ (पूर्व राज्यपाल) ने कहा ‘वे भगवान हैं।’ के0 एम0 मूंशी भूतपूर्व (राज्यपाल उ0 प्र0) लिखते हैं नीब करौरी बाबा हमेशा एक कम्बल लपेटे रहते हैं। प्रायः नैनीताल में हनुमान गढ़ में ठहरते हैं। कोई नहीं जानता कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं।
नीम करौरी बाबा आखिर कौन थे? बाबा जी सन्तों के सन्त थे। आज भी सूक्ष्म रूप में उतने ही सक्रिय हैं। भक्तों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। दयालु प्रवृति के थे। भक्तों की पीड़ा दूर करना उनका ध्येय था। आज भी सच्चे भाव से उनसे कुछ भी माँगों इच्छा पूरी होती है।
बाबा जी के बारे सर्व प्रथम ग्रंथ मिरेकिल ऑफ लव डा0 रिचर्ड एलपर्ट (रामदास) द्वारा लिखी गई है। रामदास नाम बाबा जी का ही दिया हुआ  है। सुधीर मुखर्जी ‘दादा’  द्वारा लिखित ‘‘पारस स्पर्श’’  और ‘ संतकृपामृत’’  तथा रवि प्रकाश पाँडे द्वारा लिखित ‘‘अलौकिक यर्थाथ’’ एवं प्रकाश चन्द्र जोशी ‘‘मुकुन्दा ’’ द्वारा अनन्त कथामृत तथा रविन्द्र जोशी ‘रब्बूदा’ द्वारा लिखित सो जानहि जहु देह जनाई आदि पुस्तकों में मिलता है।
मुकुन्द दा लिखते हैं कि एक अमरीकन महिला भक्त अंजनी (ताओस न्यू मेकसिका) का कथन है कि ‘महाराज जी की कोई जीवनी उनका कोई भी वर्णन हो नहीं हो नहीं सकता है वर्णनातीत हैं  वे।’ वे (महाराज) कौन थे? कौन हैं? उनकी केवल अनुभूती भर की जा सकती है। अन्तर में उनके सम्मुख होने पर परम शान्ति की नैसर्गिक वर्षा होती रहती थी। आनन्दायक, अमृतमयी और अब उनकी (भौतिक) अनुपस्थिती लगती है। किन्तु उनकी प्रभा परिधि सभी को अपने साधारण से पट्टेदार कम्बल में समेट चुकी है, समेटती जा रही है। बाबा ने अपनी प्रकाशमयी लीलाओं से भक्त समुदाय एवं आश्रितों को ऐसा अवलम्बन दिया जिसके बल पर उनका अपना संस्कार ही नही परर्माथ भी निर्मित हो गया । बाबा मंत्र प्रदान कर किसी को अपना शिष्य नहीं बनाते थे। वे कहते थे कि मैं भक्त बनाता हूँ। मैंने भी महाराज जी को देखा है। उनमें एक भोलापन था और भक्तों के प्रति अपार स्नेह  रखते। उनके याद करते ही वे अचानक उपस्थित हो जाते । बाबा जी कहते हम कोई चमत्कार नहीं करते।
रामगढ़ (नैनीताल) के सेब के ठेकेदार श्री शिवसिंह अपना सेब का ठेका करने के पूर्व महाराजजी के दर्शन के हेतु इस विचार से आये कि दर्शनों के बाद ही कार्य प्रारम्भ करेंगे। लेकिन महाराज जी ने उनको अपने पास रोक लिया। उन्होंने सोचा कि अगले दिन रामगढ़ चले जायेंगे और दूसरे दिन भी महाराजजी ने उन्हें कैंची में रोक लिया, और इसी तरह लगातार 15 दिन तक उन्हें कैंची में ही रोकते रहे। शिवसिंह को इस बात का दुख और चिन्ता होती रही कि अबकी सेब के ठेके में बहुत नुकसान होगा क्यूंकि अब तक सेब काफी पक चुके होंगे जबकि उनका सेब का व्यापार अधिकतर दक्षिण भारत और बम्बई में हुआ था। पन्द्रहवें दिन महाराजजी ने उन्हें रामगढ़ यह कहकर भेज दिया ‘‘कि जाओ अपना काम नहीं देखोगे?’’ उन्होंने मन ही मन सोचा अब क्या देखना, अब तो नुकसान हो ही गया है। पर महाराजजी तो सब जानते थे। उस वर्ष मद्रास और बम्बई में सेब का दाम बहुत ही गिर गया था और इस कारण जबकि अन्य व्यापारियों को अपने माल का भाड़ा भी प्राप्त न हो सका, श्री शिवसिंह को अपने पक्के माल को केवल लखनऊ कानपुर आदि भेज कर ही दुगुना मूल्य प्राप्त हो गया जिस की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। इस प्रकार त्रिकालदर्शी महाराजजी ने अपने भक्त के व्यापार की रक्षा की।
कानपुर में नैनीताल के एक भक्त ने महाराजजी के दर्शन किये। लौटते वक्त महाराजजी ने नैनीताल मन्दिर के लिये एक सन्देश दिया था कि महाराजजी 15 दिन में नैनीताल पहुँच जायेंगे। दूसरे दिन नैनीताल पहुँचने पर वह सीधे मन्दिर पहुँचा कि महाराजजी का संदेश दे दूँ। वहां जब भीड़ देखी तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या बात है? तब उसे पता चला कि महाजजी तो यहीं हैं। वह अड़ गया कि महाराजजी के दर्शन तो मैं ने कल कानपुर में किये वे यहां कैसे हो सकते हैं  वे तो दो हफ्ते के बाद यहां आयेंगे और भीतर जाकर महाराजजी से बोला ’महाराजजी यह सब क्या लीला है।’ तब महाराजजी उस पर चिल्लाने लगे ‘‘चुप। बाहर निकल जाओ, चुप रहो, तुम झूठ बोल रहे हो।’’
एक भक्त नैनीताल से व्यापार हेतु मैदानी शहरों में जा रहा था। जाते समय उदास हो गया कि उसके लौटने पर महाजजी उसे नहीं मिलेंगे क्योंकि वह बहुत दिनों के बाद लौटेगा। जब उसकी ट्रेन एक छोटे स्टेशन में इंजन में पानी लेने हेतु रूकी तो उस के पहचान का एक व्यक्ति उसके पास आया और बोला ‘‘देखो वहां नीम करौली महराजजी बैठे हैं ’’ वह भक्त आश्चर्यचकित हो गया कि मैं महाराजजी को नैनीताल छोड़ आया हूँ, वे यहां कैसे । तब भक्त ने कुछ बातें की और तब महाराजजी ने कहा ‘‘कि जाओ, अब तुम्हारी गाड़ी छूटने वाली है। ’’  और लौटने पर पुनः आश्र्चय जब उसने महाराजजी को नैनीताल में हनुमान मन्दिर में ही देखा यह भी मालूम किया कि महाराजजी इस बीच कहीं गये ही नहीं थे और मन्दिर में ही विराजते रहे।
महाराजजी के भक्त पूरन चन्द जोशी बाबाजी के साथ फर्नीचर मार्ट हल्द्वानी में बैठे थे। एकाएक महाराजजी ने अत्यन्त गम्भीर मुद्रा बना ली और धीमी आवाज में बोले ‘‘पूरन उसे बहुत तकलीफ हो रही है एक चम्म्च पानी पिला दे’’। बाबाजी की यह बात और यह मुद्रा किसी के समझ में न आयी कि आखिर किसे तकलीफ हो रही है और किस को पानी पिलावें, और महाराजजी इतने गम्भीर क्यों हो रहे हैं। फिर भी पूरनदा ने दो चम्मच पानी बाबा जी के मुँह में डाल दिया। सभी अवाक् होकर बाबा जी का मुँह निहारते रहे और तब बाबाजी की आँखों में से दो बूंद आसुओं की टपक पड़ी और बाबा जी बोल उठे ‘‘रमण चला गया। भारत का एक महान सन्त चला गया’’। दूसरे दिन समाचार पत्र से पता चला कि उस दिन अरूणाचल के महर्षि रमण जी ने शरीर त्याग दिया है।
‘मसक समान रूप कपि धरी’। हनुमान के कथित अवतार समझे जाने वाले बाबाजी के प्रति नैनीताल के एक भक्त, साहजी , श्री तुलाराम का यही विशेष आग्रह हुआ करता था। वही भाव कि ‘‘मेरी छूँछ गगरिया जब छलके, गुन जानूं तब तेरे पनघट का’’।
लीलानायक ने इलाहाबाद दादा के घर एक बार इसके लिये नाटक कर ही डाला। बनावटी झुंझलाहट से कहा, ‘‘हमें तंग कर दिया। सब लोगों ने हम किसी से नहीं मिलेंगे अब। अब हम को बन्द कर दो कमरे में अकेले’’ । अतएव लाईबे्ररी के कमरे में आप बन्द हो गये। अन्दर के कमरे में ;जहां माइयाँ बैठी थींद्ध खुलने वाले दरवाजे में आपने स्वयं चटकनी चढ़ा दी और बाहर बरामदे की तरफ खुलने वाला दरवाजे पर (जहां पुरूष वर्ग बैठा था) ताला लगा कर चाबी साहजी को देने को कहा गया। ऐसा ही किया गया। अब रह गयी केवल एक खिड़की सघन ‘ग्रिल’ जाली युक्त। सभी बाबाजी के बाहर निकलने की प्रतीक्षा में आसन मारकर बैठे रहे। बाबाजी के बिना चैन कहाँ किसी को?
काफी देर हो गयी। तभी श्री माँ ने जो बाहर आँगन की तरफ गैलरी में गयी थीं, देखा बाबाजी लम्बे लम्बे डग भरते हुए पूर्व की ओर एलेनगंज मोहल्ले को चले जा रहे हैं अकेले!! उन्होंने आकर सबसे पहले कहा, ‘‘यहाँ क्या बैठे हो। महाराज तो उधर चले गये हैं - शायद मुकुन्दा के घर।’’ पर सभी ने इस पर शंका की कि दवाजे बन्द हैं तब बाबाजी बाहर कैसे आ सकते हैं बिना किसी की दृष्टि पड़े। राय हुई कि ताला खोला जाय। पर महाराजजी की आज्ञा भंग स्वरूप दण्ड का भय भी हुआ। फिर खिड़की की ओर से देखा गया तो बाबाजी नदारद!! ताला खोला गया तथा अन्दर की ओर से दरवाजे को देखा गया। चटकनी यथावत् चढ़ी हुई थी। अब बाबाजी के निकल पाने का एक ही रास्ता बचा - खिड़की की ग्रिल के बीच से , साधारण दृष्टि से अदृश्य अवस्था में ‘मसक समान रूप धर के’। तब तक बाबाजी मुकुन्द दा के घर पहंच गये थे। सभी भागकर वहीं आ गये और वहीं दरबार भी लग गया। तब साहजी बोल उठे  ‘‘अब कोई शंका नहीं रह गयी महाराज’’ ।