हमारे लेखक

‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 4

‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’

अनिल पंत, नैनीताल-

महाराज जी के भक्त, दया पात्र भारतवर्ष में ही नहीं वरन् देश विदेशों में भी अनगिनत रहे हैं। कुछ भक्त यहाँ तक कहते हैं कि बाबा जी का आकाश तत्व पर भी अधिकार था। वे कहीं भी चले जाते थे और अपने भक्तों के मन की बात भी जान जाते थे कि वह क्या सोच रहा है या क्या कहने वाला है। उन पर अपने भक्तों के प्रति अपार स्नेह था। मुसीबत में पड़े हुए भक्त के लिए अपार दया थी। वे किसी के द्वारा की गई प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करते थे। उनके पास प्रेमपूर्ण दया रहती थी और वे उनके कष्टों को और उन पर पड़ी मुसीबतों को प्रभावशाली लोगों के द्वारा दूर कर देते थे।

ऐसी ही एक घटना नित्यानन्द मिश्र जी ने अपने संस्करण लेख में लिखी है । बात उन दिनों की है जब मेरे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मेरी रूग्ण विवाहिता भगिनी की देहरादून में मृत्यु हो गयी। उसकी एक मात्र पुत्री की भी दो तीन महीने में मृत्यु हो गयी। हमारा सारा परिवार उन दोनों को बहुत प्यार करता था। पिता जी विशेषकर बहुत दुःखी हुए। इसके तीन वर्ष बाद मेरा एक मात्र जवान भाई बाईस वर्ष की अवस्था में मियादी बुखार का शिकार हो गया। उसके जाने से पिता जी को इतना गहरा आघात लगा कि वे स्वयं मियादी बुखार से ग्रसित हो गये। पर दृढ़ इच्छा शक्ति एवं मनोबल से शीघ्र स्वस्थ हो गये। भाई के निधन के बाद मेरी छोटी पुत्री 1948 में चल बसी। इस घटना के एक वर्ष बाद मेरी पत्नी, एक पुत्री और तीन पुत्रों को छोड़ कर केवल दो दिन की बीमारी में चल बसी। घर में बीमारी एवं मृत्यु का ऐसा क्रम चला कि पिता जी तथा मैं मानसिक सन्तुलन लगभग खो बैठे। एक सुखी परिवार उजड़ गया था। द्वितीय महायुद्ध के बाद महंगाई बढ़नी शुरू हो गई थी। बीमारों की सेवा शुश्रुषा में ही वेतन का बड़ा भाग खर्च हो जाता था। पत्नी की मृत्यु के समय सबसे छोटा पुत्र दो तीन वर्ष का था। घर में छोटे बच्चों की देखभाल करने वाली कोई स्त्री नहीं थी। वृद्ध पिता जी स्वयं दोनों जून खाना बनाते थे। बर्तन मलते थे। मेरी माँ बचपन में मर गई थी।

हम छोटे बच्चों को कष्ट न हो ऐसा सोचकर पिता जी ने अवस्था होते हुए भी दूसरा विवाह नहीं किया था। सारा जीवन अपनी सुख सुविधा त्याग बच्चों के सुख के लिए समर्पित कर दिया। पचहत्तर वर्ष की अवस्था में जब एक मात्र पुत्रवधू भी पोते पोती को छोड़कर चल बसी तो उनका कष्ट बढ़ गया। जब कष्ट असाध्य हो गया तो मुझे दूसरा विवाह करने का आदेश दिया। पिता पुत्र के बीच तर्क-वितर्क हुए। पर पिताजी का आदेश सर्वोपरि रहा। प्रथम पत्नी की संतान को किसी प्रकार कष्ट न हो ऐसा दृढ़ संकल्प ले कर दूसरा विवाह किया। विवाह के आठ महीने बाद ही नैनीताल के बिड़ला विद्या मंदिर में मेरी नियुक्ति हो गयी। वेतन अच्छा मिलने लगा। रहने के लिए आवास वेल हेड नामक सुन्दर बंगले में मिला। पर विपत्तियों ने अभी पीछा नहीं छोड़ा। 1951 के अप्रैल महीने में द्वितीय पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। सारे परिवार ने खुशी मनाई। पर जन्म के पन्द्रह दिन बाद ही पत्नी गम्भीर रूप से बीमार हो गई। घर में इलाज से फायदा न होने पर स्थानीय बदरी दत्त पाण्डे चिकित्सालय में भरती कराना पड़ा। वहाँ उसे दो महीने रहना पड़ा। इस बीच पर्याप्त दूध तथा सेवा के अभाव में वह छोटा बालक भी चल बसा। सारा परिवार दुखी हो गया। उस दिन हम भूखे रहे।
दिन भर विद्यालय में काम करने के बाद शाम को अपर चीना माल में घूमने के लिए अकेले ही निकल पड़ा। तारा हाल बंगले के पास आकर ख्याल उठा कि अपने सहयोगी श्री कृष्ण चन्द्र तिवाड़ी के घर चलूँ। उनसे बातें कर मन बहल जायेगा। उन दिनों बिड़ला विद्या मंदिर के कुछ अध्यापक तारा हाल में रहते थे। उनके लिये नये आवास नहीं बने थे।

मैं तिवाड़ी जी के निवास स्थान की ओर बढ़ा। कमरे में झाँक कर देखा कि लोगों का जमघट लगा है। कमरे में महाराज नीब करौरी जी बैठे थे। उनकी आरती के बाद भक्तों को प्रसाद वितरित हो रहा था। मन में अचानक ख्याल आया कि यहाँ बुरा फँसा। उल्टे पैर अपने घर की ओर मुड़ा। महाराज जी ने मुझे नहीं देखा। कुछ दूर आगे बढ़ा ही था कि तिवाड़ी जी की आवाज सुनाई दी, ‘अरे मिश्रा जी, प्रसाद तो लेते जाओ।’ मैं लौटा। तिवाड़ी जी ने कहा, ‘प्रसाद पाने से पहले खाना खा लो। महाराज का आदेश है।’ महाराज ने मुझे देखा ही नहीं। यह आदेश कैसा? तिवाड़ी जी ने अपने साथ आये हुए एक सज्जन की ओर इंगित करते हुए कहा, ‘मेरा यकीन नहीं मानते हो तो इनसे पूछ लो।’ उन सज्जन ने कहा, ‘मेरे सामने महाराज ने कहा कि मिश्रा आया है। भूखा है। उसे खाना खिलाओ।’ मेरे लिए टालने का अब दूसरा कोई रास्ता नहीं था। तिवाड़ी जी के कमरे में गया। खाना खाया। जिस कमरे में महाराज विराजमान थे, वहाँ जाकर एक कोने में बैठ गया। शहर से काफी लोग आये थे। भाँति-भाँति की चर्चा भक्त लोग महाराज से कर रहे थे। पर मेरा ध्यान उस ओर नहीं था। मैं तो केवल मृत पुत्र तथा रूग्ण पत्नी केे विषय में ही सोच रहा था। जब भीड़ कम हुई महाराज ने मेरी ओर देखा और कहा,‘व्यर्थ मरे लड़के का ध्यान कर रहा है। होनी को कोई टाल नहीं सकता।’ मुझे आश्चर्य हुआ कि मैंने तो उन्हें अपनी वेदना बताई ही नहीं। कैसे उन्हें मेरे मन की बात मालूम हो गई। फिर महाराज बोले, ‘तू कल रात दस बजे मेरे पास यहीं आना। तब तुझसे बातें होंगी।’  मैं उठा और घर वापस आ गया।

दूसरा दिन कठिनाई से बीता। सारे दिन महाराज से मिलने की उत्कण्ठा रही। संध्या समय खा पीकर ठीक नौ बजे रात्रि को तारा हाल पहुँचा। भक्तों की भीड़ अभी छंटी नहीं थी। प्रणाम करके मैं एक ओर बैठ गया। महाराज ने एक एक कर सब भक्त विदा कर दिये। केवल रह गये हम तीन। एक थे राजकीय विद्यालय से अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य स्वर्गीय पं0 देवी दत्त जोशी। दूसरे थे मेरे सहयोगी श्री जयनारायण राय। वे अब अवकाश प्राप्त कर अपने ग्राम सुरही, जिला बलिया में रहते हैं और तीसरा था मैं।
महाराज ने मुझसे कहा, ‘क्यों रे मिश्रा जानता है तेरा लड़का क्यों मरा?’ मैंने कहा, ‘नहीं महाराज।’ महाराज ने फिर पूछा, ‘क्या तूने अपने पिता जी से कभी कोई कड़वी बात कही?’ ‘नहीं महाराज, मुझे ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं आता, मैंने उत्तर दिया। महाराज बोले, ‘याद कर तूने अवश्य उन के हृदय को कड़वी बात कह दुखाया है।’ मैंने कहा, महाराज, अब याद आता है कि एक दिन उन्हें मैंने रूखा प्रत्युत्तर दिया। इससे वे दुखी हुए।’ ‘ बस पकड़ अपने कान। प्रतिज्ञा कर। कल से जब कभी बाजार जाएगा उनके  लिए दो लड्डू लेते आना। उनका दिल किसी भाँति न दुखाना।’  महाराज ने डाँट कर कहा।

कान पकड़े। प्रतिज्ञा की। महाराज इस बीच भाव विहरल हो गये और कहने लगे, ‘लोग मेरे पास आते हैं दुख दर्द दूर करवाने, पर अपने कर्म ठीक नहीं करते।पुत्र का काम माता पिता की सेवा करना है। नहीं करे तो दुःख पाता है। तब मेरे पास आता है। हम कोई चमत्कार थोड़े ही कर सकते हैं। इतने लोग मेरे पास आते हैं अपना दुखड़ा ले कर। मैं उनके दुःखों को कैसे दूर कर सकता हूँ? लोगों के सत्कर्म ही उनके दुःखों को दूर कर सकते हैं। यदि लोग अपना कत्र्तव्य करें तो दुःख स्वयं मिट जाते हैं। जहाँ सुमति हो वहीं सम्पदा आती है। माता पिता की सेवा, पति भक्ति, भाईयों का पारस्परिक सौहार्द भाव ही घर के सुख का मूल कारण है। मिश्रा, फिकर मत कर। कल आगरा वाला डाक्टर आयेगा। तेरी औरत को देखेगा। वह ठीक हो जायेगी।’

फिर महाराज ने श्री जगदीश नारायण राय की ओर देखा और कहा, ‘बड़ा राम-राम करता है। घर में बूढ़ी माँ बैठी है। उनकी सेवा कर। तू भी पकड़ अपने कान।’ राय साहब से भी कान पकड़वाये गये। उनको आदेश मिला बलिया से अपनी माँ को बुलाओ और उनकी सेवा करो।
रात बहुत बीत चुकी थी। घर जाने का आदेश मिलने पर हम तीनों प्रणाम कर वापस लौटे। रास्ते में श्री देवी दत्त जी ने कहा, ‘भई मैंने महाराज की काफी संगति की पर इस प्रकार की चर्चा महाराज के भी मुख से आज ही सुनी।’

घर पहुंचा। इस घटना का जिक्र किसी से नहीं किया। पर जब भी बाजार गया सदा पिताजी के लिये लड्डू लाता रहा। कभी कोई कड़वी बात उनसे नहीं कही। दूसरे दिन सांयकाल रूग्ण पत्नी को देखने मल्लीताल में बद्री दत्त पाण्डे चिकित्सालय पहुंचा। पत्नी ने कहा, ‘आज प्रातः काल कोई बड़ा डाक्टर आया। उसने मुझे अच्छी तरह देखा और लेडी डाक्टर से दवा बदलने को कहा।’ दोपहर से दवाई बदल दी है। आज मुझे बहुत चैन है।’ पन्द्रह बीस दिन के अन्दर पत्नी स्वस्थ होकर घर आ गयी। तब उसे नवजात शिशु की मृत्यु का हाल मालूम हुआ।
क्रमशः


उक्त संस्मरण श्री नित्यानन्द मिश्रा जी के ‘पुरवासी’
पत्रिका में प्रकाशित लेख
से पाठकों की जानकारी हेतु लिया गया है।