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‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 5

‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल-

पिछले अंक में आप पढ़ चुके हैं कि किस तरह से महाराज ने मिश्रा जी के दुख-दर्द मिटाये और उन पर अपनी कृपा का हाथ रखा।
‘‘काहू कौ धरायो धीर, काहू कौ मिटायौ पीर,
भक्तन कू हीर-हीर, प्रेम-नीर प्यायौ है।’’
दो तीन महीने बीत गये। एक दिन दोपहर के समय पिता जी बिना किसी को बतलाये तल्लीताल में हनुमानगढ़ दर्शन करने गये। यह मंदिर नीब करौरी महाराज के आदेश पर भक्तों ने बनवाया था। मंदिर बिड़ला विद्या मंदिर से काफी दूर है। दोपहर की कड़ी धूप में हनुमान जी के दर्शन कर पिता जी लौटे। मार्ग में उन्हें थकान लगी और प्यास भी। सोचा पास ही कृष्णापुर मुहल्ले में श्री शिवदत्त पेशकार जी का घर है । वहाँ जा कर चाय पी कर थकान मिटायेंगे। पेशकार जी की पत्नी पद्मा से पिता जी का बड़ा स्नेह था। उनके घर पहँचने पर पिता जी ने देखा कि कमरे के बाहर बहुत सी जूतियाँ और चप्पलें पड़ी हैं। दरवाजे के भीतर झाँका तो देखा कमरा लोगों से भरा है और एक महाराज बैठे हैं। पिताजी एकदम लौटे क्योंकि वे साधु संन्यासियों की संगति में कभी नहीं बैठते थे। जैसे ही पिता जी लौटे महाराज ने पूछा,‘‘अरे, तेरा लड़का तेरे लिए लडडू लाता है या नहीं?’’ प्रश्न करने पर पिता जी को आश्चर्य हुआ कि न उन्होंने कभी महाराज को देखा, न कभी महाराज ने उन्हें। लडडू वाली बात तो कतई समझ में नहीं आयी। पिता जी ने कहा, ‘‘कैसे लड्डू महाराज?’’ महाराज ने बताया, तेरा लड़का जो बिड़ला में मास्टर है वह शाम को लडडू लाता है या नहीं?’’, पिता जी ने कहा, ‘‘हाँ महाराज!’’ महाराज बोले, ‘तेरे पास रूपया है। तू अपने लड़के के लिए सूट बना दे।’
घर लौटने पर पिताजी ने मुझसे कहा, ‘‘आज एक विचित्र बात हुई। मैं आज हनुमान गढ़ गया। रास्ते में लौटते समय शिवदत्त जी के यहाँ चाय पीने गया। पर वहाँ बड़ी भीड़ थी। नीब करौरी महाराज वहाँ आये हुए थे। उन्होंने मुझे देखते ही कहा लड़का लडडू लाता है या नहीं? फिर कहने लगे कि तेरे पास बहुत रूपया है। तू उसके लिए सूट बना दें। कुछ समझ में नहीं आया।’’
मैंने पिता जी को दो महीने पहले तारा हाल में महाराज से हुई सब बातें बता दीं। पिता जी भाव विभोर हो गये। दूसरे दिन स्वयं मल्लीताल जा कर प्रसिद्ध कपड़े की दुकान ‘लंदन हाउस’ से बढि़या सर्ज का कपड़ा ले आये। आज भी उनका बनवाया सर्ज का कोट स्मृति स्वरूप मेरे पास है।
महाराज की स्मृति शक्ति अद्भुत थी। अन्तश्चेतना में छिपे हुए विचारों को पकड़ लेते थे। मन के भीतर उठने वाले द्वन्द्वों को समझ कर उसी के अनुसार जन साधारण का पथ प्रदर्शन करते थे। बिना कहे मन की बात जानकर उसका समाधान कर डालते थे। उनके प्रत्येक कार्य में लोक मंगल की भावना रहती थी।
दिन बीतते गये। सुमति का वरदान मिलने पर पदवृद्धि हुई। आर्थिक दशा में सुधार हुआ। बड़ी पुत्री का अच्छे घर में विवाह हो गया। महाराज के आदेशानुसार चलने पर सुमति आयी। संपदा, सुख, श्री भी स्वयं चली आयीं। कष्टों का अन्त हुआ। चारों पुत्र उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरियों में लग गये।
क्रमशः

उक्त संस्मरण श्री नित्यानन्द मिश्रा जी के ‘पुरवासी’ पत्रिका में प्रकाशित लेख से पाठकों की जानकारी हेतु लिया गया है।