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‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 6

‘जय गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल-

एक दिन 1963 ई0 में जनवरी के महीने नीब करौरी महाराज उत्तर प्रदेश के उच्च पदाधिकारियों के साथ कार में मोती महल, लखनऊ आये। उन दिनों मोती महल में बिड़ला विद्या मन्दिर, नैनीताल के विद्यार्थियों के लिये शीत कालीन कैम्प लगता था। बिड़ला विद्या मन्दिर के प्रधानाध्यापक स्वर्गीय श्री श्रवण नाथ संग ने इसकी व्यवस्था की थी। वे महाराज के अनन्य भक्त थे। उन्हीं से मिलने महाराज वहाँ आये थे।11 नम्बर के कमरे में महाराज दर्शनार्थियों से घिरे बैठे थे। कुछ छात्रों के साथ उनके दर्शन के निमित्त मैं वहाँ पहुँचा। महाराज से मैंने प्रणाम करने के अनन्तर कहा, ‘महाराज, आप कर्तव्य करने का आदेश देते हैं पर आपके प्रिय शिष्य श्री कृष्ण चन्द्र तिवाड़ी ;बिड़ला मंदिर में मेरे सहयोगीद्ध इसकी अवहेलना करते हैं। इस साल वे बिना छुट्टी लिये आप के पास भूमियाधार में रहे। इन्हें अपनी गृहस्थी की भी चिन्ता नहीं रहती।’ महाराज ने तुरन्त तिवाड़ी जी से कहा, ‘मिश्रा के पैर पकड़ो, क्षमा मांगो।’ तिवाड़ी जी ने तुरन्त आदेश का पालन किया। मैं सकुचा गया।
इस बीच बातें करते-करते महाराज अकेले ही चले गये। मैं घूमते हुए अपने कमरे में पहुँचा तो देखा तो महाराज मेरी पत्नी से बात कर रहे हैं। मुझे देखते ही कहने लगे, ‘मैं तेरे यहाँ बासी रोटी खाऊँगा।’ मैंने कहा,‘महाराज, ऐसा कैसे हो सकता है? प्रधानचार्य संग के यहाँ सभी के लिए खाना बना है।’ महाराज ने जिद की कि मैं तेरे यहां की बासी रोटी खाऊँगा। मैं बार-बार यही कहता कि आप संग साहब के यहाँ खायेंगे। इसी बीच संग साहब का नौकर बची सिंह महाराज को बुलाने आ गया और महाराज चले गये। आज भी मुझे बड़ा दुःख है कि मैं महाराज को अपने यहां बासी रोटी भी नहीं खिला सका।
दस वर्ष और बीते। 1973 में जून के अन्तिम सप्ताह में, मैं अपने ममेरे भाई दिनेश जोशी के विवाह में पीलीभीत गया। अपने आश्रम कैंची में महाराज विराजमान थे। हम सब बाराती उनके दर्शन के लिये आश्रम में गये। महाराज एक कमरे में से दूसरे कमरे की ओर जा रहे थे। मैंने प्रणाम किया। वे बोले,‘कौन है? मैंने कहा, महाराज पहचाना नहीं?’ वे बोले, ‘नहीं पहचाना।’सीधे अपने कमरे में चले गये। दो दिन बाद हम सब बहू के साथ उनके दर्शन के लिये फिर कैंची आश्रम गये। महाराज उस समय धूप में बैठे हुए थे। कुछ विदेशी दर्शनार्थियों तथा कुछ नैनीताल के उच्च पदाधिकारियों से घिरे थे। हम सबने दर्शन किया और प्रसाद पाया। दिनेश ने मुझसे कहा, ‘तुम महाराज से पूछो कि वे अल्मोड़ा कब आयेंगे।’ मैं पुनः महाराज के सामने खड़ा हुआ। पूछा,‘महाराज, आप अल्मोड़ा कब आयेंगे?’ महाराज ने कहा,‘हम अल्मोड़ा नहीं आयेंगे।’ मैंने जोर से कहा, ‘आप अवश्य सितम्बर-अक्टूबर में आयेंगे।’ महाराज ने झुँझलाकर कहा,‘तू झूठा है। हम अल्मोड़ा नहीं आयेंगे। भाग यहाँ से।’ एक सेब का दाना मेरी ओर फेंक दिया। मैं सेब लेकर अल्मोड़ा बारात के साथ आ गया। कौन जानता था कि यह उनका अन्तिम दर्शन था।
सितम्बर का महीना। गहरी नींद में सोया था। दो तीन बजे प्रातः काल मेरे दरवाजे के पास बड़ा कोलाहल हुआ। दरवाजा खोला। देखा महाराज बीस पच्चीस व्यक्तियों के साथ आये हुए हैं। आंगन होलडौल और अटेचियों से भरा है। महाराज सीधे बिना कुछ कहे मेरी बैठक में आये और सोफा पर पलथी मारकर बैठ गये। मैं भाव विभोर हो गया। उनके पैर पकड़ कर रोता रहा। वे बोले, ‘क्यों व्यर्थ रोता है? इन आदमियों के खाने का इन्तजाम कर।’
मैं उठा। आँखें खुली। न महाराज थे न आदमी । प्रातः काल हुआ। मन उदास था। ट्रांजिस्टर पर प्रातः काल के समाचार सुनने लगा। समाचार सुना कि कल रात कैंची के महान सन्त श्री नीब करौरी महाराज मथुरा में ब्रह्मलीन हो गये हैं। रात्रि में स्वप्न में आकर मेरी अन्तिम इच्छा पूरी कर गये। कितना विचित्र स्वप्न था।
कूर्मांचल में ही नहीं अपितु सारे देश में इस महान अवतारी पुरूष ने घर-घर में लोगों को सुख शान्ति प्रदान की। राम भक्ति हनुमद् भक्ति का प्रचार किया। नैनीताल, कैंची, काकड़ीघाट, लखनऊ, कानपुर, वृन्दावन और न जाने कितने स्थानों में हनुमान के मन्दिर बनवाये। कितने दीन दुःखियों के दुःख दर्द को दूर किया। घरों में सुन्दरकाण्ड का पाठ आज भी इन महान हनुमद् भक्त का स्मरण करवाता है।
अभी जब मैं नवम्बर 1974 में अन्तिम सप्ताह नैनीताल के प्रसिद्ध स्कूल शेरवुड कालेज से सीनीयर कैम्ब्रिज की परीक्षा लेकर बस से वापस अल्मोड़ा जा रहा था, छः सात अमरीकी युवक एवं युवतियों के मुँह से शुद्ध स्वर में हनुमान चालीसा स्वर सुना। गदगद हो गया।
क्रमशः

उक्त संस्मरण श्री नित्यानन्द मिश्रा जी के ‘पुरवासी’ पत्रिका में प्रकाशित लेख से पाठकों की जानकारी हेतु लिया गया है।’