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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 10

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी की इच्छा शक्ति मृत में प्राणों का संचार भी कर देती थी। कुमाऊँ के सन्त श्री ब्रहमचारी जी महाराज और मुरादाबाद-चन्दौसी के मौनी बाबा आप में प्राणों की सिद्धि बताते थे। अल्प मृत्यु किसी भी कारण से हो महाराज उसे जीवन दान दे दिया करते थे, पर महामृत्यु में वे व्यक्ति उसकी स्थिति को आनन्दमय बना देते थे। जिससे की अंतिम मुक्ति में संदेह नहीं रह जाता। हर प्रकार से महाराज शोक के निवारण में समर्थ रहे। महाराज के परम्भक्त युधिष्ठर जी एक दिन बरेली से अपनी कार में महाराज जी को लेकर भूमियाधार आश्रम लाये। जहाँ आने पर एक दिन बहुत दूर जंगल में दिशा मैदान के लिए गये। वहाँ एक सर्प ने उन्हें डस लिया। जिसका विष आपके सम्पूर्ण शरीर में फैलने लगा। आप गिर कर अचेत हो गये। उनका सारा शरीर काला पड़ गया था। जब तक लोगों को पता चला तब तक उनके प्राण-पखेरू उड़ गये थे। इतने में महाराज स्वयं वहाँ आ गये। उन्होंने अपना काला कम्बल उतार कर यूधिष्ठिर जी के ऊपर डाल दिया और कुछ समय में उन्हें बाँह पकड़ कर खड़ा कर दिया। वे झूम रहे थे। महाराज ने उन्हें डाँठते हुए कार चलाने को कहा और स्वयं उनकी बगल में बैठ गये। महाराज बराबर उनको डाँठते चले जा रहे थे और गाड़ी को तेज रफ्तार से चलाने को कहते रहे। महाराज आपको 60 कि॰मी॰ दूर रानीखेत ले गये। वहाँ महाराज ने आपको खाना खिलाया। इसके बाद वापसी में भूमियाधार तक आपसे गाड़ी चलवाई। आप पूर्ण रूप से चैतन्य हो गये थे। इन पर प्रत्यक्ष ड्डपा कर महाराज जी ने आपको जीवन दान दिया।
इस घटना के बाद कुछ दिनों तक महाराज किसी से नहीं मिले। उनके शिष्य ब्रहमचारी जी बतलाते हैं कि महाराज आश्रम के एक कमरे में अकेले पड़े रहते थे। उनके सारे शरीर कर रंग उन दिनों काला पड़ गया था क्योंकि महाराज ने सर्प का विष अपने ऊपर ले कर झेल लिया था। महाराज की शरण में जो भी आया महाराज ने उसके सारे कष्ट हर लिये। बड़े से बड़े रोग अपने ऊपर लेकर महाराज अपने भक्त को रोग-दुःख से मुक्ति देते। कितनों को जीवन दान देते जो केवल भगवान के सिवा कोई नहीं कर सकता।
तुम ही विष्णु राम श्री कृष्णा ..........
जा पर कृपा दृष्टि तुम करहो
रोग, शोक, दुख, दरिद्र हर हांे।