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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 11

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज की लीला अपरमपार है। वे अपने हर भक्त के मन की बात को अपनी अलौकिक शक्ति से जान जाते थे और यथासमय उसकी मदद भी करवा दिया करते थे।
एक दिन कैंची आश्रम में महाराज के दरबार में श्री गंगा दत्त पढालिनी नामक व्यक्ति उपस्थित हुए। श्री पढालिनी पर्वतीय भू भाग के ही थे। परन्तु उनकी पत्नी केरल की थी। वे उत्तर प्रदेश रोडवेज में कार्यरत थे। अपने घर के खर्चो को पूरा ना कर पाने के कारण मन ही मन दुखी रहते थे। महाराज ने उपस्थित एक दर्शनार्थी से पाँच रूपये दिलाते हुए कहा,‘‘इससे अपनी पत्नी के नाम से लाटरी का टिकट ले आना।’’
यद्यपि उन्होंने पैसों के बारे में महाराज जी से कुछ भी नहीं कहा था। श्री पढालिनी ने अपनी दुखद स्थिति में महाराज जी की आज्ञानुसार ही कार्य किया और लाॅटरी का टिकट खरीदा।कुछ समय बाद महाराज जी की ड्डपा से उन्हें पाँच लाख की लाॅटरी लगी। श्री पढालिनी जी ने नैनीताल में ही उस धन से बहुत ज्यादा सम्पत्ति खरीदी और कुछ समय तक सुख पूर्वक रहे। नैनीताल जैसे शहर में पाँच लाख की लाॅटरी शायद पहली बार ही श्रीमती पढालिनी के नाम ही निकली थी और पढालिनी नैनीताल में लखपतिया नाम से प्रसिð हुए। श्री पढालिनी जी की फिजूल खर्ची के
कारण उनकी पत्नी कुछ समय बाद उन्हें छोड़कर केरल चली गयी।
इस तरह से महाराज दीन दुखियों की मदद करते थे। उनकी महिमा अपरमपार है। उनकी दया, प्रेम और ड्डपा का कोई पार नहीं है।