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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 14

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी की महिमा निराली रही है। जो भी उनकी शरण में आया उसे उन्होंने निराश नहीं किया। सोशल मीडिया में छपी एक घटना पुनः प्रकाशित है।
एक अमरीकी महिला भारत में गुरू की खोज में आयी थी। यहाँ कुछ साधुओं के चक्कर में पड़कर उसने अपना सब धन गवां दिया। उनकी संगति के प्रभाव से उसे चरस पीने की बुरी लत लग गयी। दर-दर भटकती हुई वृन्दावन में परिक्रमा मार्ग में एक दिन वो बाबा (महाराज) के आगे-आगे चल रही थी। बाबा जी को उस पर तरस आ गया। उन्होंने उसके रहने खाने की व्यवस्था आश्रम में कर दी। कुछ समय बाद बाबा जी ने उसको अमेरिका भेजने की व्यवस्था भी कर दी और जाते समय बोले,‘अब तू चरस नहीं लेगी।’ उसने बाबा जी की आज्ञा मान ली।
यह महिला दूसरी बार 1984 में अपने पुत्र को लेकर भारत आयी और कैंची आश्रम मंे कई दिन रही। उसने आश्रमवासियांे को बताया कि उसने चरस छोड़ी नहीं। ये बाबा की प्रेरणा शक्ति का प्रभाव था कि उस दिन से कभी उसे चरस लेने की इच्छा ही नहीं हुई और ये दुव्र्यसन उससे अनायास ही छूट गया।
इस बार वो अपने पुत्र को बाबा जी के विग्रह के दर्शन कराने लायी है जिससे उसका सार हीन जीवन सुधर जाये। वो अमेरिका में नशीली गोलियांे का शिकार हो गया था। सन् 1985 में वो महिला पुनः अकेली आयी और सुनाने लगी कि बाबा जी (महाराज) के विग्रह के दर्शन मात्र से उसके बेटे के जीवन में आशातीत परिवर्तन आ गया है। उसे नशीली गोेलियों में अरूचि हो गयी है और वो अपनी आजीविका में लग गया है। सच में बाबा (महाराज) तकदीर बदल देते हैं।
ध्यान मूलं गुर्राेमूर्ति, पूजा मूलं गुर्राेपदम्।
मंत्र मूलं गुर्रोवाक्यम्, मोक्ष मूलं गुर्रोकृपा।।