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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 15

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज स्वभावतः बडे़ दयालु थे। वे प्रत्येक व्यक्ति पर अप्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ड्डपा करते ही रहते थे। वे अपना प्रचार नहीं कराना चाहते थे। महाराज ने गरीब अमीर छोटे-बड़े देशी विदेशी सभी को कुछ ना कुछ दिया। उनके समस्त कार्य मानव के कल्याण में ही निहित थे।
महाराज की ड्डपा पर आभार प्रकट करते हुए श्री हरीश चन्द्र ढौडि़याल एडवोकेट, नैनीताल बताते हैं कि राजनीतिक आन्दोलन के कारण सन 1958 से 68 तक मेरे और मेरे पाँच साथियों के ऊपर अदालत में मुकदमे चलते रहे। मैं उन दिनों काफी परेशान था। महाराज ने मुझे बता दिया था कि अन्त में सब ठीक हो जायेगा आरम्भ में अदालत ने हम लोगों को मुक्त कर दिया था, पर सरकार इस मामले को उच्च न्यायालय में ले गयी। जहाँ से हमें दो-दो साल की सजा हो गयी। हम लोगों ने अपील की। इस बीच मेरे कुछ रिश्तेदार कैंची में महाराज के दर्शन करने आये और उन्होंने मेरे बारे में उनसे पूछा। महाराज ने बताया कि अमुक जज के आने पर मामला ठीक हो जायेगा। उस समय जो जज थे उनकी बदली हो गयी और उनके स्थान पर जो दूसरे जज आये उनकी अदालत में हमारी अपील की सुनवाई हुई। पूरे दिन बहस हुई और शेष दूसरे दिन के लिए छोड़ दी गयी। मेरे मन में भय हुआ कि ये जज महोदय तो कोई और हैं, बाबा के बताये हुए नहीं और इन्हीं की अदालत में हमारी अपील की सुनवाई हो रही है। परन्तु दूसरे दिन कुछ ऐसा कारण बना कि अपील अनिश्चित काल के लिए मुल्तवी कर दी गयी और फिर तभी लगी जब महाराज द्वारा बताये जज साहब का आगमन हुआ इन्होंने फैसला हमारे हक में दिया। ऐसी है महाराज की लीला।
‘‘आलौकिक यथार्थ से’