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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 16

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी कहा करते थे जब मन अपना शरीर शान्त कर देता है तो उसका आश्रम ही उसका शरीर हो जाता है। एक बार वार्ता के बीच महाराज बोले हम नहीं मरेंगे। महाराज के निधन की घटना को अवास्तविक बताते हुए महान सन्त देवरहा बाबा ने कहा ‘‘ऐसा खिलवाड़ वे अनेक बार कर चुकेे हैं, वे जा कहाँ सकते हैं। वे जीवित हैं और सदा जीवित रहेंगे।’’ वास्तव में कैंची आश्रम में अभी भी महाराज अपने भक्तों को दर्शन दे दिया करते हैं भवाली निवासी एक महिला जो हर मंगलवार को कचैंड़ी बनाकर लाती थी और बाबा जी को भोग लगाती थी। बाबा जी इन कचैडि़यों को बड़े चाव से खाते थे और बाबा जी उन्हें कचैड़ी भाई कहा करते थे।
महाराज ;बाबाद्ध जी के महा प्रयाण के बाद आपने सोचा कि महाराज तो अब रहे नहीं और उन्होंने कचैड़ी ले जाने का नियम समाप्त कर दिया, फरवरी 1976 की एक रात में महाराज इस महिला के स्वप्न में प्रकट हुए। आप उस समय उनका खाली भोग पात्र लिये खड़ी थीं। महाराज उस खाली बर्तन को अपने हाथ में लेकर आपसे कहने लगे, ”तू कचैडियाँ“ लायी नहीं, तू समझती है हम नहीं रहे। हम अब भी कैंची में रहते हैं, तू कचैडियाँ लाया कर,” महिला की आँख खुल गयी। उसने अगले मंगलवार से अपना नियम फिर से बनाये रखने का संकल्प लिया।
इस बार मंगल के दिन पहाड़ में चारों ओर बर्फ गिर रही थी। आप इस सर्दी में कचैडि़याँ का भोग लेकर कैंची पहुँचीं। आश्रम के सभी कमरे बन्द थे। केवल मन्दिर खुले थे। महाराज की कुटिया का उत्तर-पूर्वी दरवाजा आपको कुछ खुला हुआ दिखाई दिया। आपने अपने हाथों से उन किवाड़ों को फैलाया। एक पैर आपका दहलीज के बाहर था और दूसरा भीतर। एकाएक आपकी नजर महाराज जी के तखत पर पड़ी। आप भयभीत हो उठीं। आपने महाराज को सशरीर तखत पर बैठे देखा। उनके दोनों हाथ तख्त पर थे और पैर नीचे लटक रहे थे, जैसे वे प्रतीक्षा कर रहे हों। आप घबराकर घर भाग आयीं और लगभग तीन महीने विक्षिप्त अवस्था में रहीं। श्री माँ के समझाने पर और उनके आदेश से आपने अपना नियम पुनः आरम्भ किया और धीरे-धीरे आप स्वस्थ्य हो गयीं।
अलौकिक यथार्थ से साभार।