हमारे लेखक

‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 19

‘मेरे गुरूदेव’
बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी की पहुँच प्रत्येक व्यक्ति के हदय तक थी, परन्तु प्रत्येक के लिये वह रास्ता भिन्न था। प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव भी अलग थे। महाराज जी की उपस्थिति में उनके सानिध्य में रहने वाले आनन्द को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता यह केवल अपने हदय में अनुभव करने की बात थी।
एक बार महाराज ने मुझसे एल. एस. डी. के सम्बन्ध में वार्ता करते हुए तीन सौ माइक्रोग्राम की तीन विशुद्ध गोलियां मुझसे लेकर अपने मुँह में डाल लीं। जबकि तीन सौ माइक्रोग्राम एक वयस्क के लिए अधिक होती हैं, महाराज का इस प्रकार नौ सौ माइक्रोग्राम खा जाना और फिर उनमें किसी प्रकार की प्रतिक्रिया का ना होना एक महान आश्चर्य की बात बन गयी। मैं इस विषय में बहुत सोचते रहा और अन्त में मुझे अपनी दृष्टि पर सन्देह होने लगा और विचारने लगा कि बाबा ने अवश्य वे गोलियां खाई ही नहीं होंगी अन्यथा उनकी स्थिति सामान्य नहीं रह सकती थी।
इस घटना के तीन वर्ष बाद जब मैं बाबा जी से पुनः मिला तो इस बार उन्होंने स्वतः मुझसे तीन सौ माइक्रोग्राम की विशुद्ध एल.एस.डी. की चार गोलियाँ लेकर एक-एक कर मेरे सामने अपने मुँह में डाल लीं और ऊपर से पानी पी लिया। सम्भवतः बाबाजी का अभिप्राय मेरा संदेह दूर करने का रहा हो। इस बार बारह सौ माइक्रोग्राम खाकर वे मुझसे पूछने लगे, ”क्या हम पागल हो जायेंगे?“ मैं मन में घबराया हुआ तो था ही कहा ‘‘हो सकता है’’। एकाएक बाबा जी (महाराज जी) ने अपना चेहरा पागलों सा बना लिया और वैसा ही नाटक करने लगे। मैं सोचने लगा कि मैंने महाराज की सिद्धियों के बारे में गलत अनुमान लगाया। इतने में उन्होंने अपनी मुखाड्डति सामान्य कर दी और कहने लगे कि क्या इससे भी अधिक नशेदार कोई दवा होती है?
‘मिरेकिल आफलव’ में श्री रामदास जी द्वारा उक्त घटना का वर्णन किया गया है।
‘जय गुरूदेव’