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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 2

अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज की लीला अपरम्पार रही है। महाराज ने कभी भी अपने उस भक्त को अकेला नहीं छोड़ा जो उनकी शरण में आया। उन्होंने उसकी जिन्दगी अपने हाथों में ले ली और सब दुख- चिन्ताओं को दूर कर दिया। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को अपनाया चाहे वे हिन्दू हों, मुस्लमान हांे, सिख या इसाई हों। जो भी उनकी शरण में गया उसका बेड़ा पार हुआ। उन्होंने दीन-दुखी, निर्धन को अपनाया और अपने भक्तों की करूणा पुकार को सुनकर उबारा और भयहीन किया। ऐसा ही एक वाक्या नैनीताल निवासी श्री नर सिंह जी के साथ हुआ। श्री नर सिंह जी पेशे से ड्राइवर थे और महाराज पर उनकी पूर्ण आस्था थी। जब भी महाराज के कैंची या नैनीताल आने की सूचना होती वो दर्शन हेतु पहुँच जाते थे। एक दिन वे महाराज के दर्शन हेतु कैंची मन्दिर आये हुए थे और महाराज के पास ही बैठे रह गये। रात काफी हो चुकी थी। अंधेरा घना छाया हुआ था। मंदिर से बाहर आकर उन्होंने सोचा कि जंगल के रास्ते चला जाता हूँ। जो कि लगभग 8-9 मील ही था। लम्बे रास्ते से जाना उन्हें पसन्द नहीं था। अकेले जंगल मार्ग से जाने में डर भी लग रहा था। वे जल्दी-जल्दी लम्बे-लम्बे पग रखते हुए चले जा रहे थे। कुछ दूर चलने पर पीछे एक काला कुत्ता आता दिखाई दिया। जिसे देखकर उन्हें भय भी हो रहा था। वे तेजी से आगे बढ़ रहे थे और पीछे भी देखते जा रहे थे। उनका ध्यान बराबर उस कुत्ते पर ही लगा हुआ था। जो बराबर कुछ दूरी पर उनके साथ चल रहा था। नैनीताल पहुँचने से पूर्व उन्होंने एक बार पुनः मुड़कर पीछे देखा परंतु वह कुत्ता नहीं था। बाद में वे जब पुनः महाराज जी के दर्शन करने कैंची गये तो महाराज ने उनसे कहा, ‘वो कुत्ता तो भैरव का वाहन था। तू बेकार उससे डर रहा था। वो तेरी रक्षा के लिए आया था।’ इस तरह हम देखते हैं कि महाराज अपने भक्तों के डर को किस तरह दूर करते हैं। महाराज ने स्वयं भैरव के वाहन के रूप में प्रकट होकर श्री नरसिंह ड्राइवर की सहायता की और उन्हें भयमुक्त किया। इसी तरह मैं और मेरी पत्नि भी प्रतिदिन भोर मेें जब हनुमान गढ़ मंदिर को जाते हैं, घने अंधेरे में जब कभी भी थोड़ा भय होता है तो हम देखते हैं 2 कुत्ते अक्सरतः हमारे आगे पीछे भागते हुए हमें लगभग 2 किमी0 का अंधेरा और सूनसान रास्ता पार करा देते हैं और प्रातः की आरती से पूर्व मंदिर के पास तक पहुंचा देते हैं। कई बार हमें रास्ते में तेंदुए दिखाई दिये पर महाराज की कृपा से आजतक वे भी रास्ता छोड़ कर जंगल को चले जाते हैं। ऐसा ही प्रातः सभी भक्तों के साथ होता है। महाराज की लीला अपरम्पार है। वे सदा अपने भक्तों की सहायता करते हैं और उन्हें भयमुक्त करते हैं।