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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 20

‘मेरे गुरूदेव’
बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल -
श्री केहर सिंह आइ.ए.एस. ने एक बार महाराज को अपने घर इलाहाबाद में भोजन के लिये आमन्त्रित किया। यह घटना सन 1936 की है। बाबा ने उनका आग्रह स्वीकार करते हुए कहा,‘‘कल शाम तेरे घर खायेंगे।’’ घर आकर पत्नी को सूचना देते हुए आपने दूसरे दिन शाम को दो आदमियों के लिये भोजन तैयार करने को कहा, यह सोच कर कि बाबा के साथ कोई परिकर भी आ सकता है। पत्नी ने समय से पूर्व थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दो सब्जियाँ बना दीं और गरम-गरम पूरियाँ खिलाने के लिये आटा तैयार कर दिया। सिंह साहब ने बाजार से थोड़ी मिठाई भी मँगवा दी और आप बाबा को लिवा लाने कर्नलगंज में श्री सुधीर मुखर्जी के घर गये। बाबा के साथ दो कारों में दस लोग आपके घर पधारे।
बाबा ने घर में आते ही खाना माँगा। सिंह साहब ने एक थाल में दो नरम पूरी, सब्जी और मिठाई ले जाकर बाबा के आगे रखी। वे बोले,‘‘सब को भोजन करा।’’ आप चिन्तित हो गये। आपने नौ थालियाँ और कटोरे पत्नी के पास रख कर उन्हें बाबा का आदेश सुनाया। वे खिन्न हो गयीं, उनके सामने घर की लाज का सवाल था। सिंह साहब ने दो आदमियों के लिये खाना बनवाया था, अब समय था नहीं कि इतनी जल्दी सब्जी और पूरी का आटा तैयार किया जा सके। स्थिति को अपने काबू से बाहर देख उन्हें अत्यधिक घबराहट हो गयी और वे रसोई घर से बाहर चली आयीं। आपने लाचार हो यह काम अपने चपरासी से करवाया। वह भी क्या कर सकता था, कुछ करने को समय था नहीं। वह केवल उस तैयार आटे की पूरियाँ उतारने लगा। सिंह साहब बाहर कमरे में भाग-भाग कर सबको खिलाते रहे। खाद्य सामग्री स्वतः इस खूबसूरती से बढ़ती गयी कि सब लोगों ने भर पेट प्रसाद पाया और उनके जाने के बाद उसी सामग्री से नौ-दस प्राणियों के लिये पर्याप्त भोजन बचा रहा। वास्तव में गृहस्थ की लाज बाबा ही रखते थे।