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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 21

‘मेरे गुरूदेव’
बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी की लीला अपरंपार रही है। अपने भक्तों पर ये सदा ही ड्डपा करते रहते हैं। महाराज का जहां भी दरबार लगता वहां भंडारा हो जाता, सबसे बड़ी बात यह होती कि यहां भोजन की कभी भी कमी न होती। एक बार बाबा की गाड़ी के चालक श्री हवीबुल्ला खाँ ने महाराज से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है। यदि आप को इस बीच कहीं जाना हो तो आज्ञा दें उसमें पैट्रोल भरवा लायें। बाबा बोले, ‘‘कहीं नहीं जाना है।’’ दूसरे ही दिन रात में बाबा गाड़ी में बैठ गये और उससे गाड़ी चलाने को कहने लगे। सर्दी बहुत थी। बाबा दो कम्बल ओढ़े थे। हवीबुल्ला के पास एक कम्बल था, उसे एक ओर रख कर वह गाड़ी चलाने लगा। उसने बाबा से कहा, ‘‘पैट्रोल तो आपने भरवाया नहीं, अब गाड़ी कैसे चलेगी? आपको कहाँ जाना है?’’ बाबा बोले, ‘‘अल्मोड़ा जाना है, गाड़ी चला।’’ गाड़ी चली पर पाँच किलोमीटर दूर रातीघाट के ढाल को पार करने के बाद रूक गयी। पैट्रोल खत्म हो चुका था। अब निर्जन जंगल में रात बितानी थी और कोई उपचार न था। चालक मन ही मन बहुत दुःखी हुआ और अपना कम्बल निकाल कर कार के एक कोने में बैठ गया। बाबा बोले, ‘‘पास के स्रोत से पानी लेकर पैट्रोल की टंकी में डाल दे।’’ यह शराबियों की सी बातें सुनकर उसने उत्तर दिया, ‘‘महाराज, गाड़ी चैपट हो जायेगी। आप जैसा कहें मैं वैसा करने को तैयार हूँ, पर कल सवेरा होते ही मैं आपकी नौकरी छोड़ दूंगा। अब मैं आपके साथ नहीं रहूँगा।’’ बाबा नम्रता से बोले, ‘‘बहुत नहीं, तीन कैन पानी डाल दे।’’ उसने वैसा ही किया। बाबा बोले, ‘‘गाड़ी चला।’’ वह बोला, ‘‘अब तो गाड़ी काम से गयी, अब क्या चलेगी!’’ अब महाराज और भी विनम्र भाव से गाड़ी चलाने को कहने लगे। हबीबुल्ला के स्टार्ट करते ही गाड़ी चल पड़ी। वह रात भर बाबा को घुमाकर सबेरे गाड़ी आश्रम में ले आया। इससेउसकी आस्था बाबा पर बहुत बढ़ गयी और उसने नौकरी छोड़ने की जो धमकी बाबा को दी थी उसके लिये उसे बड़ी शर्मिन्दगी हुई।