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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 22

‘मेरे गुरूदेव’
बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज जी के मुख मंडल में हमेशा प्रसन्नता छाई रहती थी और वे हास्य और विनोदपूर्ण बातें करते थे। उनकी दयालुता प्रेम और आत्मीयता सदा व्यवहार में निहित रहती थी। आप सबसे कुशल क्षेम पूछते, सबको प्रसाद देते और उनकी इच्छापूर्ति का आशिर्वाद देते जो हमेशा पूरा होता।
एक बार हाॅर्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर और उनकी पत्नी महाराज जी के दर्शन के लिए आए। उनकी पत्नी चित्रकार थीं। उन्होंने महाराज जी का चित्र बनाया। उस रात वे सख्त बीमार पड़ गयीं। ज्वर से काँपने लगीं और जब खाँसती तो मुख से खून आने लगता। यह बिल्कुल ही असाधारण बात थी क्योंकि वे एकदम स्वस्थ थीं। प्रोफेसर साहब का बहुत ही व्यस्त कार्यक्रम था। उन्हें उसी रात दिल्ली छोड़ना था। डाक्टर साहब ने कहा कि उनकी पत्नी को यात्रा करने लायक होने में एक सप्ताह का समय लगेगा। उन्होंने पत्नी को एक सुविधाजनक जगह पर छोड़ने की तैयारी कर ली। जब वे उसे छोड़ने जा रहे थे तो उसी समय मंदिर के समीप आकर कार रोक दी और पत्नी के साथ महाराज जी के दर्शन करने अंदर गए। उनकी पत्नी ज्यों-ज्यों महाराज जी के समीप पहुँचती त्यों त्यों वह अपने आपको स्वस्थ महसूस करने लगीं और जब वे महाराज जी के समक्ष पहुँची तो अपने आपको पूर्णतया स्वस्थ महसूस करने लगीं। महाराज जी उनकी ओर देख कर मुस्कुरा रहे थे। उस महिला ने जो महाराज जी का चित्र बनाया था निकाल कर महाराज जी के समक्ष रख दिया। महाराज जी ने उसके चारों ओर राम राम लिख दिया।
एक बार नेपाल की महारानी महाराज जी के दर्शन करने के लिए आयीं। उनके पति महाराज के काफी भक्त थे। उन्होंने महाराज जी को बहुत सारी वस्तुएं उपहार स्वरूप भेंट कीं। महाराज जी ने उन्हें स्वीकार न करते हुए सभी उपस्थित भक्तों में बाँट देने के लिए कहा। महाराज जी हँसते हुए रामदास से बोले उसके (महारानी) पास बहुत पैसा है क्या हमें कुछ ले लेना चाहिए?
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