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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 23

‘मेरे गुरूदेव’
बाबा नीब करौरी ‘महाराज’
अनिल पंत, नैनीताल -
दया के अवतार महाराज जी अपने भक्तों के मन की बात को सहज ही जान लिया करते थे। इसका आभास तब होता जब वे स्वयं या किसी के द्वारा उस बात को प्रकट कर देते जो भक्त के मन में होता। ऐसा ही वाक्या नैनीताल निवासी पुष्पा साह बताती हैं।
मुझे जब मालूम हुआ कि पूज्य बाबा जी महाराज बजरंगगढ़ (नैनीताल) में पधारे हैं तो मैं भी उनके दर्शनों को चल पड़ी। साथ में अपनी सहेली, चम्पा को भी ले लिया। मैंने सुन रखा था कि जब किसी संत के पास या मंदिर-दर्शन को जायें तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य ले जाना चाहिए। पर तब मेरे पास केवल एक दुन्नी थी। मैंने उसी का एक संतरा ले लिया पर मार्ग में ही मुझे संकोच होने लगा कि महाराज जी को तो मनों की मात्रा में मिठाइयाँ, ढेरों फल अर्पण होते है और मेरे पास तो केवल एक संतरा है। कैसे दूँगी उन्हें यह संतरा? तब मैंने चम्पा से कहा,‘‘मुझे इस संतरे को महाराज जी को देने में शर्म आ रही है। ले, तू ही दे देना।’’ पर वह बोली, ‘‘क्या मुझे नहीं आयेगी शरम (शर्म) एक ही संतरा देने में?’’ तब यही तय हुआ कि ‘‘महाराज जी तो स्वयं हनुमान जी ही हैं अतएव यह संतरा हनुमान जी को ही अर्पण कर देंगे।’’
हमने यही किया। चुपचाप संतरे को हनुमान जी के मंदिर की रेलिंग पर रख दिया और महाराज जी का स्मरण कर आँखें बन्द कर अर्पण कर दिया। तभी मुझे वहाँ दूसरी सहेली, मुन्नी (रजनी जोशी) दिखाई दी। उससे हमने पूछा,‘‘महाराज जी कहाँ है?’’ तब उसने बताया कि ‘‘महाराज जी तो वहाँ (कुटी की तरफ इशारा कर) बैठे हैं। मुझसे कहा जा हनुमान मंदिर में एक संतरा रखा है, उसे उठा ला। मैं पहले आई तो संतरा नहीं था तब, पर अब मुझे फिर से भेजा संतरा लाने को तो देखती हूँ सचमुच रखा है संतरा।’’
मैं तो यह सब सुनकर स्तब्ध भी रह गई और आनन्द में भी डूब गई कि श्रधा -प्रेम की इस छोटी-सी भेंट को भी महाराज जी ने किस उदारता से स्वीकार कर लिया और महाराज जी ने वहीं बैठे हमारी सारी बातें कैसे जान लीं कि मुन्नी का प्रथम बार तब भेजा जब हम मंदिर नहीं पहुँचे थे (पर हनुमान जी को भाव में संतरा अर्पण कर चुके थे) और दूसरी बार फिर भेजा जब सचमुच अर्पण हो चुका था!! साथ ही हमारी इस धारणा की कि - बाबा जी स्वयं ही हनुमान जी हैं- कैसे इस लीला द्वारा  पुष्टि कर दी!!
अनन्त कथामृत से।