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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 3

संस्मरण:
अनिल पंत, नैनीताल -
महाराज का अपने भक्तों के प्रति अपार स्नेह था। भक्त को उनसे बहस करने की, जिद करने की, रूठने की और मनाने की छूट थी।
नैनीताल में हनुमानगढ़ की बात है एक विशेष अवसर पर अपने घर चलने का अनुग्रह महाराज द्वारा टाल सा देने पर भक्त के. के. साह जिन्हें उनके प्रति सहज स्नेह के वशीभूत महाराज जी किलास (कैलास) कहकर सम्बोधित करते थे, महाराज से अत्यन्त क्षुब्ध से हो गये और संकल्प ले बैठे कि ‘‘अब जब तक फक्कड़ (महाराज) स्वयं नहीं आयेंगे मैं उनके पास नहीं जाऊँगा, परन्तु अन्तर में तो अनन्य प्रेम था (है) ही के. के. साह को महाराज के प्रति फिर भी अपने प्रेम भरे आग्रह की अवहेलना ने उनके अन्तर के अहं का उकसा दिया किन्तु भीतर ही भीतर वे महाराज जी के दर्शन को साथ-साथ तड़पते भी रहे। कई दिन बीत गये। उधर अन्तर्यामी ने भी भक्त के अन्तर की टीस महसूस कर ली। अपने भक्तों के द्वारा सन्देश भी भिजवा दिया कि ‘‘कल हम शहर आयेंगे जिसे हमारा दर्शन करना हो कर ले।’’ पर फिर भी के. के. साह मन ही मन अपनी बात पर अड़े रहे कि जब तक महाराज स्वयं मेरे पास नहीं आयेंगे मैं भी नहीं जाऊँगा। उनके दर्शन को उस दिन, महाराज नैनीताल में कई घरों में घूमते रहे। आस-पास के घरों में भी। फिर भी के. के. साह जानते हुए भी अपने घर से नहीं निकले। दिल की धुक-धुकी को दबाए रहे। किन्तु अपने प्रियजन प्रेमी के प्रेम भरे मान ने अन्ततोगत्वा महाराज जी को भी हिला दिया और वे स्वयं के. के. साह के मकान के नीचे सड़क पर आकर जोर से पुकार उठे किलास, किलास! लो हम आ गये!!
जिस किलास शब्द को श्री मुख से सुनने के लिये के. के. कई दिन से तड़प रहे थे, आज उसे सुनकर तथा महाराज जी के प्रति ममत्व की पराकाष्ठा की ऐसी अभिव्यक्ति समझकर उनके अन्तर का इतने दिनों से अवरूद्ध प्रेम प्रवाह फूटकर आँखों से बह निकला और वे धड़ाधड़ सीढि़यों से सड़क पर उतरकर बच्चे की तरह फफक कर रोते हुए महाराज के श्री चरणों पर लिपट गये। मान-मनोबल लीला पूरी हो गयी ऐसे। हम भक्तन के भक्त हमारे।
(अनन्त कथामृर्त )