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‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 4

संस्मरण:
अनिल पंत, नैनीताल - ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’ वाले महाराज की लीलायें भी अपार रही हैं। उन्होंने हमेशा अपने भक्तों की पीड़ाओं को दूर किया है और उनका कल्याण किया है। विदित और अविदित कथाओं का तो अन्त ही नहीं है। उनकी ऐसी वृहद लीलाऐं हैं जिन्हें भक्तगण समय-समय पर विभिन्न पुस्तकों में महाराज की इच्छानुसार प्राप्त करते रहेंगे।
ऐसी ही कथा ‘प्रेमावतार’ में प्रकाशित है जिसे पाठकों के पुनः स्मरण हेतु दिया जा रहा है।
पूर्णानन्द तिवारी जी (कैंचीवासी) महाराज जी के भक्त थे, पर उनके बड़े सुपुत्र (तब) किसी और गुरू को मानते थे। माह मार्च वर्ष 1984 में वे अपने निर्माणाधीन मकान के लिये हल्द्वानी से रात में सीमेंट, बालू, लोहा आदि ट्रक में लदवा कर ला रहे थे कि दो गाँव के आगे ट्रक गड्ड में गिर गया। तिवारी जी का लड़का इस दुर्घटना में चोट खाकर बेहोश हो गया। अर्ध चेतना में उसने देखा कि बाबा जी वहाँ प्रकट होकर लालटेन लेकर खड़े हैं और तभी उसका हाथ पकड़ उसे सहारा दे ऊपर सड़क में लाकर पुनः अन्तध्र्यान हो गये। वह किसी तरह दूसरे ट्रक में कैंची पहुँच गया। दूसरे दिन बालू छोड़ सभी सामान भी उसके घर पहुँच गया। भक्त का हाथ पकड़ा था, पर भक्त के पुत्र को भी हाथ पकड़ कर बचा लिया।
वर्ष 1990 में 15 जून के समारोह के अवसर पर भागवद् सप्ताह का आयोजन मद्रास निवासिनी एक महिला श्रीमती पुष्पा ने किया जिसमें उन्होंने स्वयं परीक्षित बन कर भागवत् सुना। उनके साथ उनके भाई अमरलाल भी आये थे जो कि कुछ अस्वस्थ थे। उन्होंने भी पूरे सप्ताह (7 जून से 14 जून तक)भागवत् की पूजा तथा कथा में उत्साह से भाग लिया और 16 जून को लौटते समय अपने को पहले से अधिक स्वस्थ महसूस करने लगे थे। मद्रास पहुँचने के उपरान्त उनके मित्रों एवं सम्बन्धियों द्वारा उनके स्वास्थ्य में आए हुए सुधार के बारे में पूछने पर उन्होंने कैंची आश्रम में प्राप्त हुए आनन्द को इस का कारण बताया और कहा कि वह आने वाले वर्षाें में 15-20 दिन के लिए कैंची अवश्य जाया करेंगे।
4 जुलाई 1990 को अचानक उनका स्वास्थ्य फिर से गिर जाने के कारण उन्हें ‘नर्सिंग होम’ में भर्ती करना पड़ा और वे ‘कोमा’ में आ गये। उनकी इस हालात को देखकर उनके ज्येष्ठ पुत्र ने उनकी जन्मपत्री एक प्रकाण्ड ज्योतिष को दिखाई, ज्योतिष को उनके नर्सिंग होम में भरती होने और ‘कोमा’ में होने के सम्बन्ध में बिना कुछ बताए हुए उनके स्वास्थ्य में सुधार के लिए पूछा गया। उसने ज्योतिष गणना से अमरलाल जी को ‘कोमा’ की स्थिति के बारे में बता दिया और कहा कि इनकी मृत्यु का योग 14 जून 1990 को था परन्तु उस समय में ये किसी ऐसे स्थान में थे जहाँ पर मुख्य रूप से श्री हनुमान जी का पूजा-पाठ होता है और किसी बड़ी शक्ति का प्रभाव है। जिस कारण इनका मृत्यु-योग एक माह टल गया। अब यदि 14 जुलाई 1990 सकुशल बीत जाती है तब शायद इनका जीवन बच जाये। परन्तु उनकी जीवन-लीला 14 जुलाई 1990 को ही समाप्त हो गई।
स्पष्ट है कि आज भी उस आश्रम में एक ऐसी शक्ति विद्यमान है जिसने आश्रम में भागवद् सप्ताह एवं भण्डारे के निर्विघ्न समाप्ति हेतु श्री अमरलाल जी को एक माह की आयु-वृद्धि प्रदान की।
इस तरह महाराज ने अपनी शरीर लीला के बाद भी अपने भक्तों को नहीं छोड़ा है और उनकी करूणा पुकार को सुनकर भयमुक्त किया।

‘‘बाबा तेरे लीला गुन, जानि नहीं पायो कोउ,
जानो है वहि जाकूँ, तैने ही जनायो है।’’
क्रमशः