हमारे लेखक

‘मेरे गुरूदेव’ बाबा नीब करौरी ‘महाराज’ भाग 5

संस्मरण:
अनिल पंत, नैनीताल -
यह महाराज की लीला ही थी कि वे अपने भक्त के मन की इच्छा को सहज जान लेेते थे और यथा समय उसकी पूर्ति भी कर देते थे। सरदार रणजीत सिंह उ॰प्र॰ परिवहन में चालक पद पर थे। वे अक्सर बरेली और गनाई, रानीखेत के मध्य बस चलाया करते। आप कहते हैं कि मेरी गाड़ी सदा कैंची होकर जाया करती। कैंची मन्दिर और आश्रम मेरे सामने ही बने। मैं हमेशा बस से यहाँ भीड़ ही देखा करता था। कभी बस रोककर महाराज के दर्शन करने नहीं गया। साथ ही भूमियाधार मन्दिर भी मेरे रास्ते में ही पड़ता था। एक दिन जब मैं भूमियाधार से बस लेकर गुजर रहा था तो मैंने वहाँ लोगों की भीड़ देखी। पूछने पर मालूम हुआ कि वहाँ बाबा नीब करौरी आये हुए हैं। जिन्हें कैंची में लोग घेरे रहते हैं। यात्रियों की असुविधा के विचार से यहाँ भी मैंने अपने को लाचार पाया। मैं स्वयं को समझाने लगा कि सि) महात्मा भगवान के ही रूप होते हैं और यदि बाबा सि) हैं तो वो मेरे मन की बात जान कर कभी न कभी अवश्य दर्शन देंगे। दूसरे दिन प्रातःकाल ही जब मेरी गाड़ी उस आश्रम के पास से वापस बरेली जा रही थी। महाराज वहीं एक मोड़ पर अकेले खड़े थे, जैसे मेरी राह देख रहे हों। मैंने तुरन्त गाड़ी से उतर कर उन्हें प्रणाम किया। वे बोले, ‘‘कहाँ जा रहा है?’’ और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये कहने लगे, ‘‘साधू लोगों को परेशान नहीं किया जाता समझे?’’ मैंने अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। इस दर्शन के बाद आपको एक विचित्र अनुभव हुआ। आप कहते हैं कि महाराज के दर्शन के उपरान्त जब मैंने बस आगे बढ़ाई तो कुछ दूर जाने के बाद मुझे महाराज बस के आगे जाते दिखाई दिये। मैं हैरान हो गया और सोचने लगा कि मुझे कुछ भ्रम हो रहा है। बस से तेज, आदमी पैदल नहीं जा सकता। फिर बहुत दूर जाने पर मेरी दृष्टि उन पर गई। इस बार वे पहाड़ के ऊपर चढ़ते दिखाई दिये। अब आगे संदेह का कोई मौका न रहा। इसके बाद भी चलती बस से वो लगातार कई स्थानों पर दिखाई दिये। जिससे मैं चकरा गया और मेरा मन यह स्वीकार करने लगा कि महाराज वास्तव में भगवान ही हैं। इस प्रकार उनकी अलौकिकता से प्रभावित होकर मैं हमेशा के लिये उनका दास हो गया। तब से मैं महाराज के आश्रम और भक्तों की सेवा करता आ रहा हूँ।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहीं सन्ता।
सो करि कृपा करहिं दुख अन्ता।
(अलोकिक यथार्थ से)